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ख़ारू बंजारा_Kharu Banjara

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ख़ारू बंजारा ( भुवनेष्वर की कहानी ‘भेड़िये’ पर आधारित) नाट्य रूपांतरण एवं लेखन- अनन्त गौड़ भाषा - मारवाड़ी/हिंदी पात्र (Characters) इफ़्तेख़ार उर्फ़ ख़ारू (युवा) ख़ारू (वृद्ध / कथावाचक) बड़े मियाँ (ख़ारू का पिता) बादीं (लड़की 1) बेला (लड़की 2)  बिजली (लड़की 3) - (19 वर्ष) भेड़ियों का कोरस (6–10 कलाकार) संगीत मंडली (3 संगीतकार) मंच-सज्जा केंद्र में बंजारों का गड्डा (बैलगाड़ी) चलायमान संरचना में मौजूद है। पृष्ठभूमि खाली और धुंधली जो रेगिस्तान के बीच बीहड़ का अहसास कराती है। भेड़ियों का कोरस पूरे नाटक में छाया में मौजूद रहता है- कभी स्थिर, कभी धीमे-धीमे हिलता हुआ। (मंच पूर्ण अंधकार में डूबा हुआ है। कुछ क्षणों तक सिर्फ़ हवा की हल्की-सी आवाज सुनाई देती है- सूखी, रेगिस्तानी, जैसे रेत खुद साँस ले रही हो। मंच के एक कोने में संगीत मंडली पर रौशनी खुलती है जहाँ कुछ वादक बैठे हैं। धीरे-धीरे दूर से ढोलक की एक मद्धम थाप उभरती है। उसके साथ खड़ताल और बांसुरी जुड़ते हैं।) (वृद्ध ख़ारू ‘कथावाचक’ काँधे पर दुनाली लिए, मंडली के साथ आकर बैठता है और अपनी तैयारी में लग जाता है। अचा...