ख़ारू बंजारा_Kharu Banjara

ख़ारू बंजारा

(भुवनेष्वर की कहानी ‘भेड़िये’ पर आधारित)


नाट्य रूपांतरण एवं लेखन- अनन्त गौड़

भाषा - मारवाड़ी/हिंदी

पात्र (Characters)

  1. इफ़्तेख़ार उर्फ़ ख़ारू (युवा)
  2. ख़ारू (वृद्ध / कथावाचक)
  3. बड़े मियाँ (ख़ारू का पिता)
  4. बादीं (लड़की 1)
  5. बेला (लड़की 2) 
  6. बिजली (लड़की 3) - (19 वर्ष)
  7. भेड़ियों का कोरस (6–10 कलाकार)
  8. संगीत मंडली (3 संगीतकार)

मंच-सज्जा

केंद्र में बंजारों का गड्डा (बैलगाड़ी) चलायमान संरचना में मौजूद है। पृष्ठभूमि खाली और धुंधली जो रेगिस्तान के बीच बीहड़ का अहसास कराती है। भेड़ियों का कोरस पूरे नाटक में छाया में मौजूद रहता है- कभी स्थिर, कभी धीमे-धीमे हिलता हुआ।


(मंच पूर्ण अंधकार में डूबा हुआ है। कुछ क्षणों तक सिर्फ़ हवा की हल्की-सी आवाज सुनाई देती है- सूखी, रेगिस्तानी, जैसे रेत खुद साँस ले रही हो। मंच के एक कोने में संगीत मंडली पर रौशनी खुलती है जहाँ कुछ वादक बैठे हैं। धीरे-धीरे दूर से ढोलक की एक मद्धम थाप उभरती है। उसके साथ खड़ताल और बांसुरी जुड़ते हैं।)


(वृद्ध ख़ारू ‘कथावाचक’ काँधे पर दुनाली लिए, मंडली के साथ आकर बैठता है और अपनी तैयारी में लग जाता है। अचानक सभागृह में कुछ हलचल से वो चौंककर दुनाली उठाता है और तान देता है।)


वादक: क्या हुआ काका? कैसे डर रहे हो?

॰ काई होयो काका? क्यूं डर रया हो?


वृद्ध ख़ारू: (खूब हँसकर) मैं नहीं डरता किसी से भी… अब नहीं। (खँखारता है) तू गाना शुरू कर।

॰ (खूब हँसकर) म्ह काई सूं भी नीं डरूं… अब नीं। (खँखारता है) तूँ गाणो चालू कर।


(रौशनी बहुत धीरे-धीरे खुलती है… पीली, मिट्टी जैसी। साँझ का समय।)


(एक राजस्थानी लोकगीत- ‘धीमेरा चालो’ शुरू होता है। मंच के केंद्र में कुछ नटनियाँ प्रकट होती हैं। उनके घाघरे घूमते हैं, पाँवों की थाप लय पकड़ती है। नृत्य जीवंत है- कच्चा, देहधर्मी, लेकिन उसमें कहीं एक बेचैनी भी है। जैसे वे सिर्फ़  नाच नहीं रहीं, बल्कि अपने को प्रदर्शित कर रहीं हैं पर उन्हीं में एक लड़की ‘बादीं’ को देख लगता है जैसे वो अपने भाग्य को टाल रही हो।)


गीत 1- 

केसरियो री बागो बनियो 

तुरि रै तार हज़ार

पशम धरा रा पातवी रामा राजकुंवार


म्होंरे लाडळले नों रे

खम्मा रे खम्मा

म्होंरे केसरिये नों रे

खम्मा रे खम्मा

थे तो धीमेरा रे धीमेरा चालो


कानां रा गजमोती

थांनां झीणिए रे घूंघट रे जोती

म्होंरे लाडळले नों रे

खम्मा रे खम्मा

म्होंरे केसरिये नों रे

खम्मा रे खम्मा

थे तो धीमेरा रे धीमेरा चालो


माताजी जुग जीवे

थांरा घोळ्या पाणी पीवे

म्होंरे लाडळले नों रे

खम्मा रे खम्मा

म्होंरे केसरिये नों रे

खम्मा रे खम्मा

थे तो धीमेरा रे धीमेरा चालो


(नृत्य बढ़ता है। तभी मंच के एक कोने से ख़ारू (युवा) प्रवेश करता है। वह पहले कुछ दूरी से देखता है।आँखों में एक अजीब-सी ठंडक। फिर धीरे-धीरे वह भी ताल पकड़ता है। उसके कदम पहले हिचकिचाते हैं, फिर वह नृत्य में घुल जाता है।)


(बादीं की नज़र ख़ारू से मिलती है। दोनों के बीच एक छोटा-सा ठहराव। मुस्कान-बहुत हल्की, लेकिन सच्ची। नृत्य अपने चरम पर पहुँचता है। ढोलक की थाप होती हुई अचानक पूरी तरह रुक जाती है।)


अंधकार।


(धीरे-धीरे रौशनी फिर खुलती है, इस बार साँझ की फीकी, मार्मिक रौशनी। मंच पर अब बंजारा गड्डा बीचों बीच है। लकड़ी की चरमराहट, रस्सियों की आवाज, बैलों की हल्की साँसें। पूरा वातावरण वास्तविक सा हो जाता है।)


(बैल अचानक हल्के से बिदकते हैं, एक पल को रुकते हैं, फिर बड़े मियाँ उन्हें हल्का-सा सहलाते हैं। फिर कुछ परेशान से आसमान की ओर देखते हैं।)


बड़े मियाँ: चलो-चलो रे! साँझ ढलने से पहले निकलना है!
॰ चालो-चालो रे! सिंझ्या ढळण सूं पहलां निकलणो है!


(लड़कियाँ एक-एक करके गड्डे में चढ़ती हैं। ख़ारू रस्सियाँ कस रहा है।)


बेला (हल्की हँसी के साथ, जैसे मज़ाक कर रही हो):

अरे… ऐसे मत देखो… हम खुद आए हैं। कोई बाँधकर तो नहीं लाया।

॰ अरे… अइयाँ मत देखो… हम खुद आईं हैं। कोई बाँध कै कोनीं लायो।


बिजली (धीरे, थोड़ा संकोच): जब मैं निकली थी ना दीदी… पड़ोस वाली चाची बोली,

“नाचने जा रही है… या बिकने?”

॰ जद म्ह निकळी ना जीजी… पड़ोस री चाची बोल्ली,

“नाचण जावे है… या बिकण?”


बेला(चौंककर): सच में!!

॰ साँची!!


(बादीं को गड्डे में चढ़ने में मुश्किल होती है। ख़ारू आकर बैठता है और अपने घुटने पर पैर रख कर उसे चढ़ने का इशारा देता है।)


(नेपथ्य में ‘नैन कटारी मत मारो’ गीत के बोल उठते हैं।)


गीत 2-

नैन कतारी मत मारो,

ओ मत मारो, मत मारो...

नैन कतारी मत मारो, मत मारो,

म्हारा साइला लागो कलेजे तीर 

म्हारा बादिला लागो कलेजे तीर


बिन धारी, बिन तलवार,

बिन धार, बिन तलवार,

बिन शस्तर, घायल कर दे ओ,

नैन कतारी मत मारो...


बादीं (धीमे, ख़ारू से): तुम हर जगह ऐसे ही नाचते हो?
॰ तूँ हर जगा अइयाँ ही नाचै है?


ख़ारू (हल्की मुस्कान, लेकिन नज़र टिकी हुई): नहीं… हर जगह तुम नहीं होती।
॰ ना… हर जगा तूँ कोनीं रहवै।


बादीं: अच्छा! हमें कहाँ ले जा रहे हो?
॰ अच्छो! म्हाने कठै/कद ले जा रया हो?


ख़ारू: जहाँ तेरी सही रक़म मिल जाए तुझे।
॰ जिथै तेरी साचीं रक़म मिल जावे तन्ने।


(एक छोटा-सा मौन)


बादीं: और तुम? तुम्हें नहीं चाहिए कुछ?
॰ अर तूँ? तन्ने कछ कोनीं चहिये?


ख़ारू: मैं? मैं तो पहले ही बिक चुका हूँ।
॰ म्ह? म्ह तो पहलां सूं बिक गयो।


(बादीं शरमा कर अपनी नथ ठीक करती है। ख़ारू कस के उसकी कलाई पकड़ लेता है।)


ख़ारू (मुस्कुराते हुए): मैं तो नथनी सिंगार ला सकता हूँ बस। ला दूं? बोल?
॰ म्ह तो नथनी सिंगार ल्या सकूं बस। ल्या द्यूँ? बोळ?”


(ख़ारू बादीं के क़रीब जाता है।)


बादीं: तू नहीं दे सकता कुछ भी। हट पीछे!
॰ तूँ कोनीं दे सके कुछ! पिच्छअ हट!


(बादीं ख़ारू को एक हल्का सा चाटा मार कर गड्डे में अंदर जाकर बैठ जाती है।)


बिजली: मुझे ला दो! मैं ले लूंगी।

॰ म्हने ल्या दो जी! म्ह ले ल्यूँगी।


(ख़ारू मुस्कुराकर बादीं को देखता रहता है। अचानक बड़े मियाँ बोल पड़ते हैं।)


बड़े मियाँ (कड़क): ख़ारू! चल!
॰ ख़ारा! चाळ!

(ख़ारू फिर रस्सी कसने लगता है।)

बड़े मियाँ: ढीली छोड़ेगा तो रास्ते में खोल देगी। कस के…
॰ कस कै… ढीली छोड़ेगो तो रस्ता म खोल देवेगी।


ख़ारू (हल्का-सा मुस्कुराकर): इतनी भी ढीली नहीं है बापू।

॰ इत्ती भी ढीली कोनीं बापू।

(गड्डा चल पड़ता है। गायक मंडली ‘लहरियो’ गीत गाना शुरू करते हैं। ख़ारू और बड़े मियाँ भी गीत में शामिल होते हैं। बिजली गड्डे में पीछे नाचने लगती है। मंच पर रौशनी , ध्वनि और शरीर के संतुलन से यात्रा का आभास।)

गीत 3-

म्हारो लहरियो, लहरियो रे, 900 रुपए

रोकड़ा रे, लेहरियो लेहरियो 

म्हारो लहरियो रे, 900 रुपए रोकड़ा रे

म्हाने लैड्यो लैड्यो,

म्हाने लैड्यो रे गोरीरा ढोला लेहरियो सा


सजना थे तो रात दिन 

घणो रात दिन कमावो सा

जद पाछे मारे घाघरो 

म्हारो लहरियो नी लावो सा


थोडो चांदी सु लड़ा दे

थोड़ा सोना सु सजा दे 

फिर तो छोड़

थाने कड़ी कोनीं जौं सा

हो जी थारा गाया

रहनो ही चाहूँ सा


जरा… लैड्यो सा, म्हाने लैड्यो सा

लागा लहरियो रे, 

लहरियो रे 900 रुपिया रोकड़ा रे

लागा लहरियो रे, लहरियो रे 900 रुपिया 

रोकड़ा रे

म्हाने लैड्यो लैड्यो, 

म्हाने लैड्यो रे गोरीरा ढोला लेहरियो सा


अंधकार।


(मंच के एक किनारे गायक मंडली के साथ हल्की रौशनी  में वृद्ध ख़ारू खड़ा होता है, जैसे स्मृति को खुद आकार लेते देख रहा हो।)


वादक: क्या दिख गया काका? ऊपर चाँद तक नहीं है! सब सूना पड़ा है।

॰ के दिख गो काका? ऊपर चंदा तक कोनीं! सगळो सूनो पड़्यो है।


वृद्ध ख़ारू: रेगिस्तान कभी खाली नहीं होता… कोई न कोई हमेशा देख रहा होता है…

॰ मरुधर कदे सूनो कोनीं होवे… कोई न कोई देखतो रहवे है…


(हवा ठंडी होती है। ध्वनि बदलती है। रौशनी बदलती है। बैल हल्के-हल्के बेचैन होने लगते हैं। गड्डे पर रौशनी आती है।)


(गड्डा हौले-हौले डोल रहा है। बैलों की घंटियाँ। बादीं बाक़ी दोनों लड़कियों से थोड़ी दूरी बनाकर बैठी हैं। एक-दूसरे को परखती हुई।)


बिजली (आस-पास देखते हुए, हल्की हँसी के साथ): अरे… इतना लंबा सफर पहली बार कर रही हूँ… मेरे तो पाँव दुखने लगे। घाघरा भी भारी लग रहा है।

॰ अरे… इत्तो लम्बो सफर पैल्ली वार करूं हूँ… म्हारा तो पाँव दुखण लाग्या… घाघरो भी भारी लागे है…


बेला (संकोच से): तुम कहाँ की हो?

॰ तूँ कठे री है?


बिजली (थोड़ा उत्साह से): वो… जोधपुर के पास एक छोटा-सा गाँव है… वहीं से। (मुस्कुराकर) मेले में पहली बार नाची थी… सब मुझे ही देख रहे थे।

॰ वो… जोधपुर पाछै एक नानको-सा गाँव है… उंठै री हूँ। (मुस्कुराकर) मेलै में पैल्ली वार नाची थी… सगळा म्हने ही देख रया था।


बेला (हल्की मुस्कान): मैं नागौर तरफ़ की हूँ। मेले में ही… वहीं बात बनी।

॰ म्ह नागौर कानी री हूँ। मेलै में ही… वठै ई बात बनी।


बिजली (सर हिलाते हुए, जैसे कुछ समझ रही हो): हाँ दीदी… मेला ही तो होता है एक दिन… जी भर कर नाच लो, फिर… (रुककर) दूसरे दिन उठाओ गड्डा और निकलो नई जगह को।

॰ हाँ जीजी… यो मेला को ही तो एक दिन होवै… जी भर क नाच ल्यो, फेर… (रुककर) बीजा दिन उठावो गड्डो अर निकलो नई जगा।


(हल्की-सी चुप्पी। गड्डा हिचकोले लेता है।)


बेला (धीमे): तुम्हें कभी डर नहीं लगता… कि कहाँ ले जा रहे हैं?

॰ थे लोग न कदे डर कोनीं लागे… के कठे/कद ले जा रया है?


बिजली (थोड़ी देर सोचकर, फिर हल्केपन से): डर…? (हल्का सा हँसती है) पता नहीं… पर मेरी माँ कहती थी…“जहाँ काम मिले, वही ठीक।” और हमारा काम तो… नाचना ही है ना? बस जहाँ इज़्ज़त बची रहे…

॰ डर…? (हल्की हँसी) बेरो कोनीं… पर माँ बोल्या करती… ‘जठे काम मिलै, उंठै ठीक।’ अर म्हारो काम तो… नाचणो ही है न? बस जठे इज्जत बची रहवे…


बेला (काटते हुए): इज़्ज़त…? इज़्ज़त तो घर में भी नहीं बचती… और अगर पेट खाली हो तो..

॰ इज्जत…? इज्जत तो घर में भी कोनीं बचै… ओर जद पेट खाली होवे…


(वो जैसे खुद को समझा रही हो। दूसरी ओर, बादीं चुप बैठी है। वो दोनों की बात सुन रही है, पर शामिल नहीं होती।)


बेला (बादीं की तरफ़ देखकर): गूँगी हो?

॰ गूंगी है?


बादीं (सीधे, बिना मुस्कान): हाँ।

॰ हाँ।


(फिर चुप।)


बेला: तू खुद आई है… या लाए हैं?

॰ तू खुद आई है… या लायो गयो है?


बादीं (सीधे):

चलकर आई हूँ।

॰ चाल कै आई हूँ।


बेला: फिर ऐसी क्यों बैठी है?

॰ फिर अइयाँ क्यों बैठी है?


बिजली (थोड़ा आगे झुककर, बच्चे जैसी जिज्ञासा से): इतना चुप क्यूँ रहती हो दीदी। नाचते वक्त भी ऐसी ही रहती हो क्या?

॰ इत्ती चुप क्यूं रहो हो जीजी? नाचता वखत भी अइयाँ ही रहो हो के?”


बादीं (थोड़ा देखते हुए, फिर नज़र हटा लेती है): बात बड़ी करूँ या छोटी… फर्क क्या पड़ेगा।

॰ बात मोटी करूं या नानी… काई फरक पड़सी।


(एक पल को खामोशी। बिजली हल्की-सी हँसी में बात टाल देती है।)


बिजली: जी तो लगा रहेगा दीदी।

॰ जी तो लाग्योड़ो रहसी जीजी।


(तीनों फिर अलग-अलग तरफ़ देखने लगती हैं।)


बेला (धीमे, खुद से): मेरी माँ कहती थी… “जहाँ जाओ, सिर ऊँचा रखना…”

॰ म्हारी माँ कहती थी… ‘जठे भी जाओ, माथो ऊँचो राखियो…’


बिजली (धीरे से, जैसे सीख दोहरा रही हो): हाँ… सिर ऊँचा… (रुककर, मासूमियत से) पर आँखें तो… नीचे ही रखनी पड़ती हैं ना?

॰ हाँ… माथो ऊँचो… (रुककर, मासूमियत से) पर आँख्या तो… नींचै ही राखणी पड़ै है न?


(हल्की-सी कड़वी मुस्कान तीनों के बीच फैलती है। एक साझा समझ। तीनों कुछ पल चुप। गड्डे की आवाज़ तेज़ सुनाई देती है।)


(तभी अचानक बैल रुक जाते हैं। सभी लड़कियाँ चौंक जाती हैं। गड़बड़ का अंदेशा होने पर इशारों में बात करने लगती हैं।)


(बड़े मियाँ धीरे-धीरे नीचे उतरते हैं। रेत उठाकर सूँघते हैं। फिर हवा।)


ख़ारू: क्या हुआ?

॰ के होया?


बड़े मियाँ: गंध बदल गई है।

॰ बू बदल गी है।


(बड़े मियाँ बैलों को ज़ोर से हाँकते हैं। सफ़र फिर शुरू हो जाता है।)


बादीं (धीमे, फुसफुसाहट): कभी-कभी लगता है… कोई पीछे-पीछे ही चल रहा है…

॰ कदे-कदे लाग्ग कोई पिच्छअ-पिच्छअ ई चाल रयो ह…


बिजली (हल्का डर छुपाते हुए): पीछे देखोगी तो दिख जाएगा दीदी… मत देखो।

॰ पिच्छअ देखगी तो दीख जासी जीजी… मत देखियो।


बादीं (हल्की मुस्कान, हाथ दबाते हुए): हम्म …

॰ हम्म…


(गड्डा थोड़ा तेज़ हिलता है। दूर कहीं हवा की आवाज़ बदलती है। जैसे कोई साथ चल रहा हो।)


बादीं (बहुत धीमे, लगभग अपने आप से): रात जल्दी पड़ेगी आज…

॰ आज सुदियाँ रात हो जासी…


(कोई जवाब नहीं देता। ख़ारू पलट कर एक बार बादीं को देखता है। बादीं भी एक पल के लिए नज़र उठाती है। दोनों तुरंत नज़र हटा लेते हैं।)


(एक लंबा मौन। सिर्फ़ गड्डे की आवाज़… और दूर कहीं हवा का एक अजीब-सा स्वर।)


बड़े मियाँ (पीछे मुड़कर): ख़ारू… भेड़िये हैं क्या?
॰ ख़ारा… भेड़िया है के?


ख़ारू: क्या? होते तो बैल न चौंकते?
॰ के बोल्या? होता तो बैल कोनीं चौंकता।


बड़े मियाँ (धीरे, पक्का): नहीं… भेड़िये जरूर हैं… तू हट। बैलों को मैं देखूँगा।’
॰ ना… है तो सही… तूँ हट परे। म्ह बैल न सम्भालूँ।


(दूर से आवाज़ आती है-धीमी, लंबी, रूह कंपा देने वाली)
“ह्वा आ आ आ…”


(भेड़ियों का कोरस धीरे-धीरे अंधेरे से उभरता है। उनके शरीर झुके हुए, चाल समन्वित, आँखें चमकती हुई। लड़कियाँ चीख़ने और रोने लगतीं हैं।)


ख़ारू(ग़ुस्से में): अरे चुप! नहीं तो ढकेलूँ अभी!… मेरी सुसरी…

॰ रे सांत! नीं द्यूँ धक्को अभी!… राम्म्यारी…”


(ख़ारू एक पुरानी सी बन्दूक उठाता है और दाग़ देता है। धाँय! बंदूक की आवाज़। बादीं बंदूक भरती है, ख़ारू निशाना मारता है - अचूक। धाँय-धाँय-धाँय!)


(दूसरी ओर वृद्ध ख़ारू भी बन्दूक ताने ज़ोरों से दहाड़ने लगता है।)


वृद्ध ख़ारू: भेड़िया क्या होता है… मैं अकेला पनेठी से एक भेड़िया मार सकता हूँ… मैं किसी चीज़ से नहीं डरता… पर कभी-कभी भेड़िये बाहर नहीं … भीतर जागते हैं…

॰ भेड़ियो काई होवे… म्ह एकलो लाठी/डांगरी सूं एक भेड़ियो मार सकूं… म्ह काई सूं नीं डरूं… काई सूं… पर कदे-कदे भेड़िया बाहर नीं… माईन जाग्ग है…


(धाँय! बंदूक की आवाज़)


बड़े मियाँ(ख़ुशी से): आगे वाला गिर गया!
॰ आग्ग आलो गो!


(कोरस गिरे हुए भेड़िए पर खाने के लिए टूट पड़ता है। “चट-चट” की ध्वनि।)


(संघर्ष, बंदूक की ध्वनि, दौड़ता गड्डा।)


बड़े मियाँ (गर्व से): सात मुल्क के बंजारों में ख़ारू जैसा निशानेबाज नहीं!
॰ सात देसाँ रा बंजारां में खारे जिसो सांचो निशानेबाज कोनीं!


(तभी भेड़ियों कि आवाज़ तीव्र और गहरी होती सुनाई देती है।)


बड़े मियाँ(चिल्लाकर): सामान फेंको! गड्डा हल्का करो!
॰ सामान फैंको रे! गड्डो हळको करो!


(सामान फेंका जाता है। गठरियाँ गिरती हैं। भेड़ियों का कोरस उन पर टूट पड़ता है। गड्डा हिल रहा है।)


बड़े मियाँ (बिना देखे, झुंझलाकर): खारे नई पोंगली निकाल!

॰ ख़ारा नई पोंगली काढ़!


(ख़ारू जल्दी-जल्दी गड्डा टटोलता है।)


ख़ारू (चकित): नई पोंगली…? बापू, मेरे पास तो पुरानी है!

॰ नई पोंगली…? बापू, मेरअ कन्न तो पुराणी है!


(एक पल। जैसे समय अटक गया हो।)


बड़े मियाँ (पलटकर, तेज़): क्या! नई वाली कहाँ गई?! मैंने तुझे दी थी!

॰ के?! नई आली कठे गई?! तन्न ई दियो थो!


(गड्डा झटका खाता है। ख़ारू पूरा सामान उलटने लगता है।  अब जो बचा है वो भी।)


ख़ारू: मैं झूट नहीं बोल रहा! यह देख! कहीं नहीं है!

॰ म्ह झूठ कोनीं बोल रयो! आके देख ले। कोनीं!


(और सामान गिरता है। भेड़िए टूट पड़ते हैं।)


बड़े मियाँ (अब गुस्से में फटकर): हरामखोर! कुछ संभाला नहीं जाता तेरे से!

॰ हरामखोर! कुछ कोनीं संभाळयो जावअ तेरे स!


(ख़ारू और बेतहाशा खोजता है। कुछ नहीं मिलता।)


ख़ारू (लगभग चिल्लाकर): अरे कहीं नहीं है, मैं कह रहा हूँ!

॰ रे बोल रयो हूँ न, कठे ई कोनीं!


(बड़े मियाँ उसकी पीठ पर कुहनी मारते हैं।)


बड़े मियाँ: झूट बोलता है! भेड़िए की औलाद! कहाँ चली गई फिर?!

॰ झूठ बोल्लअ! भेड़िया री औलाद! कठे चली गी फेर?!


(ख़ारू कसमसाता है।)


 बड़े मियाँ (दाँत भींचकर): शहर पहुँचने दे… तेरी खाल उधेड़ दूँगा… समझा?!

॰ शहर पहुँचण दे… तेरी खाल उधेड़ द्यूंगा… समझ्यो?! 


ख़ारू: हाँ उधेड़ लियो।

॰ हाँ उधेड़ लीये।


(बैल बुरी तरह बिदकते हैं। गड्डा डगमगाता है। ख़ारू एक दो बार और बन्दूक दाग़ता है।)


ख़ारू (अब डर पहली बार झलकता है): बापू… बारूद बहुत कम है…

॰ बापू… बारूद भौत कम है…


(मौन। सिर्फ़ आवाज़ें। बड़े मियाँ ख़ारू को देखते हैं। कुछ हिसाब लगाते हुए।)


बड़े मियाँ (बहुत ठंडा, फुसफुसाता हुए): कोई भी नहीं बचेगा।

॰ कोई ना बचेगो…


(एक पल रुककर अचानक फटते हुए।)


बड़े मियाँ (निर्दय): ख़ारू! एक लड़की फेंक दे!
॰ ख़ारा! एक छोरी गेर दे!


ख़ारू (तेज़, दबे गुस्से में): क्या बोल रहा है बापू? होश में है?

॰ काई बोल रयो बापू? होस म तो है?


बड़े मियाँ (कड़क, बिना देखे): होश में ही बोल रहा हूँ।

॰ होस में ही बोल रयो हूँ।


ख़ारू: ये कोई सामान है… जो यूँ ही फेंक देंगे?

॰ यो कोई सामाण है… जिना ने अइयाँ ही गेर द्यां?


बड़े मियाँ (अब उसकी तरफ़ देखकर): सामान नहीं है… पर गड्डा डूबेगा तो सब डूबेंगे।

॰ सामाण कोनीं… पर गड्डो डूबसी तो सगळा डूबंगा।


ख़ारू (दाँत भींचकर): कोई और तरीका भी होगा…

॰ और भी तो कोई रास्तो होसी…


बड़े मियाँ (काटते हुए): है… (एक पल) मरने का।

॰ है… (एक पल) मरण रो।


(एक छोटा-सा मौन। भेड़ियों की आवाज़ और करीब।)


बड़े मियाँ (धीमे, लेकिन और सख्त): सोच मत इतना… निशाना चूक जाएगा।

॰ घणो मत सोच्च… निशानो चूक जासे।


(ख़ारू जड़ हो जाता है। हाथ हवा में ही ठहर जाता है। गड्डा हिल रहा है, पर वह नहीं हिलता।)


(भेड़ियों की आवाज़ पास आती है। धीमी, मगर साफ़)

“ह्वा… आ… आ…”


(बेला, बिजली और बादीं तीनों ख़ारू को देख रही हैं। पहली बार। तीनों की नज़रें एक ही जगह टिकती हैं।)


बेला (रोते हुए, बहुत धीरे): मत… मत करो…

॰ मत… मत करो…


बिजली (हँसी और डर के बीच अटकी): मज़ाक कर रहे हो ना…?

॰ मजाक कर रया हो न…?


(बादीं कुछ नहीं बोलती। बस ख़ारू को देखती है, सीधे बिना पलक झपकाए।)


(ख़ारू की उँगलियाँ काँप रही हैं। वह एक कदम पीछे हटता है।)


ख़ारू (बहुत धीमे, खुद से): नहीं…

॰ नीं…


बड़े मियाँ (गरजकर): ख़ारू!

॰ ख़ारा!


(ख़ारू चौंकता है।)


बड़े मियाँ: सोच मत! वरना सब मरेंगे!

॰ घणो मत सोच! नइ त सगळा मर जासां!


(एक पल। ख़ारू बादीं की तरफ़ देखता है। बादीं की आँखों में डर नहीं। एक अजीब-सी समझ है।)


(ख़ारू की साँस तेज़ हो जाती है। अचानक वो चीखता हुआ,  हिंसक गति से बेला की तरफ़ बढ़ता है।)


(भेड़ियों की आवाज़ पास आ रही है। “ह्वा आ आ आ…”)


बेला (चीखकर): मुझे मत फेंको! (बादीं कि ओर इशारा करते हुए) इसे फेंक दो जी, ये मुझसे भारी है। पैर लग रही हूँ ।
॰ म्हने मत गेरो सा!! (बादीं कि ओर इशारा करते हुए) ईन्ने गेर ड्यो, या म्हारै सूं भारी है। थारअ पाँव लागूं।


(ख़ारू फिर भी जी पक्का कर के उसे फेंक देता है। कोरस उसे घेर लेता है और वो निगली जाती है।)


(मौन। कुछ देर रुककर ख़ारू बड़े मियाँ के पास वापस जाता है।)


ख़ारू: बापू! एक बैल खोल दे !
॰ बापू! एक बैल न खोल दे!


(बड़े मियाँ गुस्से में देखते हैं।)


(कुछ क्षण राहत, फिर वही आवाज़ लौटती है। “ह्वा आ आ आ…”)


ख़ारू: आज तो कयामत का दिन है…
॰ आज तो कयामत रो दिन लाग्ग…


बड़े मियाँ(बहुत सोच कर): दूसरी लड़की भी फेंक दो!
॰ दूजी छोरी भी गेर दे!


ख़ारू (कठोर, टूटता हुआ): तुझे अक्ल है? बैल खोल दे!
॰ तन्ने अकळ है के? बैल खोल दे!


बड़े मियाँ(चिल्लाता है): असल बैल हैं ये… बच्चे हैं मेरे! तू कूद जा! भेड़िए की औलाद…
॰ असल बैल है आ… टाब्बर है मेरा! तूँ कूद जा! भेड़िया री औलाद…


(ख़ारू और बड़े मियाँ एक दूसरे को घूर के देखते हैं। कोई निगाह नीची नहीं करता। भेड़ियों कि आवाज़ और पास आती है।)

“ह्वा आ आ आ…”


(मजबूरन ख़ारू दूसरी लड़की की तरफ़ बढ़ता है।)


(बिजली निश्चिंत बैठी है। ख़ारू उसकी तरफ़ बढ़ता है और रुक जाता है।)


(दोनों एक-दूसरे को घूरते हैं।)


(बादीं चुप बैठी है। बिजली दोनों को देख रही है, जैसे अभी भी उसे पूरा यक़ीन नहीं हुआ।)


बिजली (हल्की हँसी दबाकर): अच्छा… अब मेरी बारी है?

॰ अच्छो… अब म्हारी बारी है?


(कोई जवाब नहीं देता।)


बिजली (ख़ारू की तरफ़ देखकर, जैसे मज़ाक खींच रही हो): अरे… ऐसे क्यों देख रहे हो? डराने में बड़े तेज़ हो तुम लोग।

॰ अरे… अइयाँ क्यूँ देख रया हो? डरावण में घणा तेज हो थां लोग।


(ख़ारू उसकी तरफ़ बढ़ता है।)


(बिजली मुस्कुराने की कोशिश करती है… पर मुस्कान हल्की पड़ने लगती है।)


बिजली: मैं चुप बैठूँगी अब… देखो… बिल्कुल चुप।

॰ म्ह चुप बैठ जासूं अब… देखो… बिलकुल चुप।


(वह सचमुच अपने घाघरे को समेटकर कोने में सिमटकर बैठ जाती है। जैसे कोई बच्ची डाँट खाने के बाद बैठती है।)


बिजली (धीमे, जल्दी-जल्दी):

मैं वजन भी कम हूँ… उतनी भारी भी नहीं…

॰ म्हारो वजन भी कम है… उत्ती भारी भी कोनीं…


(ख़ारू रुक जाता है। भेड़ियों की आवाज़ पास आती है।)

“ह्वा… आ… आ…”


(बड़े मियाँ बंदूक भरते हैं। हाथ काँप रहे हैं।)


(बिजली अब पहली बार सचमुच डरती है।)


बिजली: अरे… सच में…?

॰ अरे… साचीं…?


(ख़ारू उसकी तरफ़ देख नहीं पा रहा।)


बिजली (धीमे): तुम… सच में मुझे फेंकोगे?

॰ तूँ… साचीं म्हने गेर देगो?


(बिजली की साँसें तेज़ हो जाती हैं।)


बिजली: मैं नीचे नहीं देखूँगी… मैं आँख बंद कर लूँगी…

॰ म्ह नींचै कोनीं देखूं… आँख्या मींच ल्यूँ…


(ख़ारू एक कदम आगे बढ़ता है।)


(बिजली पीछे हटती है। अब उसकी हँसी पूरी तरह टूट चुकी है।)


बिजली: नहीं… नहीं… रुक जाओ…

॰ नीं… नीं… रुक जाओ…


(वह बादीं का हाथ पकड़ लेती है।)


बिजली (लगभग बच्चे की तरह): जीजी…

॰ जीजी…


(बादीं उसकी तरफ़ देखती है। कुछ नहीं बोलती। सिर्फ़ उसका हाथ कसकर पकड़ लेती है।)


(भेड़ियों की आवाज़ अब बहुत पास। बैल बुरी तरह बिदकते हैं।)


बड़े मियाँ (गरजकर): ख़ारू!

॰ ख़ारा!


(ख़ारू काँपते हुए बिजली की तरफ़ बढ़ता है।)


बिजली (रोते-रोते, जल्दी-जल्दी): मैं नाचूँगी… जहाँ बोलोगे नाचूँगी… मैं भागूँगी भी नहीं…

॰ म्ह नाचूं… जठे बोलोगा उंठै नाचूं… म्ह भागूं भी कोनीं…


(ख़ारू आँखें बंद कर लेता है।)


बिजली (टूटती आवाज़ में): माँ के पास भी नहीं गई अभी…

॰ माँ कन्न भी कोनीं गई अभी…


(एक पल।)


(बिजली पूरी ताकत से गड्डे की लकड़ी पकड़ लेती है।)


बिजली (चीखते हुए): नहीं!!

॰ नीं!!


(भेड़ियों की आवाज़ चरम पर।)

“ह्वा आ आ आ…”


(तभी बिजली अचानक ख़ारू की आँखों में देखती है।)


(एक लंबा पल।)


ख़ारू (धीमे, भारी): तु खुद कूदेगी या मैं धक्का दूँ?
॰ तूँ आप कूदसी, कि म्ह धक्को द्यूँ?


(बिजली मज़ाकिया ढंग से रोने लगती है।)


बिजली (बहुत धीमे, टूटी मुस्कान के साथ): करो फिर जल्दी कर दो… तुम्हारे भी मन की हो जाएगी…

॰ करो फेर, कर ई द्यो… थारा मन री भी हो जासी।


(ख़ारू डराते हुए एक डग आगे भरता है तो बिजली डर कर ख़ुद ही नीचे कूद जाती है। वह निष्क्रिय गिरती है और निगली जाती है।)


(मंच पर भयानक मौन।)


(बड़े मियाँ गहरी साँस लेकर कराहते हैं, माथा पीटते हैं। ख़ारू जड़ खड़ा है। बादीं उसे देख रही है। डर से नहीं, समझ से।)

(बड़े मियाँ कुछ कहने ही वाले होते हैं… ख़ारू उन्हें बीच में काट देता है।)

ख़ारू(चिल्लाकर): रहने दे बापू।
॰ रहण दे बापू!

(रौशनी धीमे से वृद्ध ख़ारू पर खुलती है, जो अब सभागृह में प्रेक्षकों के बीच घूम रहा है।)

वृद्ध ख़ारू: एक भेड़िया नहीं, दो-चार नहीं। भेड़ियों का झुंड - 200-300 जो जाड़े की रातों में निकलते हैं और सारी दुनिया की चीजें जिनकी भूख नहीं बुझा सकतीं, उनका - उन शैतानों की फौज का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता। लोग कहते हैं, अकेला भेड़िया कायर होता है। यह झूठ है। भेड़िया कायर नहीं होता, अकेला भी वह सिर्फ़  चौकन्ना होता है। तुम कहते हो लोमड़ी चालाक होती है, तो तुम भेड़ियों को जानते ही नहीं। तुमने कभी भेड़िये को शिकार करते देखा है किसी का - बारहसिंगे का? वह शेर की तरह नाटक नहीं करता, भालू की तरह शेखी नहीं दिखाता। एक मर्तबा, सिर्फ़  एक मर्तबा - गेंद-सा कूदकर उसकी जाँघ में गहरा जख्म कर देता है - बस। फिर पीछे, बहुत पीछे रहकर टपकते हुए खून की लकीर पर चलकर वहाँ पहुँच जाता है। जहाँ वह बारहसिंगा कमजोर होकर गिर पड़ा है। या, उचककर एक क्षण मैं अपने से तिगुने जानवर का पेट चाक कर देता है और वहीं चिपक जाता है। भेड़िया बला का चालाक और बहादुर जानवर है। वह थकना तो जानता ही नहीं। अच्छे पछैयाँ बैल हमारे बंजारी गड्डों को घोड़ों से तेज ले जाते हैं और जब उन्हें भेड़िया की बू आती है, तो भागते नहीं, उड़ते हैं। लेकिन भेड़िये से तेज कोई चार पैर का जानवर नहीं दौड़ सकता।]

॰ एक भेड़ियो नइ… दो-चार नइ… भेड़िया रो झुंड। दो-सो, तीन-सो, जाड्डा री रातां में निकळअ है… अर दुनिया री कोई चीज बिना री भूख कोनीं मिटा सकै… बे शैतानां री फौज रो मुकाबलो कोनीं कर सकै। लोग कहवे हैं, एकलो भेड़ियो कायर होवअ। झूठ है यो। भेड़ियो कायर कोनीं होवे… एकलो होके भी बस सतर्क रहवे है। तूँ कहे है लोमड़ी चालाक होवे है… तो तूँ भेड़ियां ने जाणे कोनीं। कदे देख्या हो भेड़िया न सिकार करता? बारहसिंगा रो? बे सेर (शेर) कि तरियाँ नाटक कोनीं करै… भालू कि तरियाँ ढिंढोरो कोनीं पीटै। एक बार… बस एक बार गेंद कि तरियाँ उछळ कै… जाँघ में गहरो घाव कर देवे… बस।
फेर पिच्छअ… घणो पिच्छअ रह कै… टपकता खून री लकीर न पकड़ के वठै तक पिच्छअ पिच्छअ चालतो रहवे… जठे जाके बारहसिंगो कमजोर पड़ कै गिर जावे। या फेर… एक झटके म… आप स तिगुनअ जानवर रो पेट फाड़ देवे… अर वठै ई चिपक जावै। भेड़ियो घणो चालाक ओर बहादुर जानवर होवे है… थकणो तो जाणै ही कोनीं। अच्छा तकड़ा बैल… म्हारा बंजारा गड्डा ने घोड़ां स बेसी तेज खिच्च… ओर जद भेड़िया री बू आवे… तो भागे कोनीं… उड़न लाग जावे। पर भेड़िया सूं तेज कोई चार पगां रो जानवर भाग ही कोनीं सके।

अंधकार।


(गड्डा आगे भागता है। तभी एक भेड़िया बड़े मियाँ की सीधी बाँह पर काट लेता है। बड़े मियाँ दर्द से चीख़ उठते हैं। ख़ारू गोली दाग़ता है। गड्डा अपना संतुलन खोए उससे पहले ही बड़े मियाँ ख़ारू को लगाम सौंपते हैं।)


(अब ख़ारू गड्डा हाँक रहा है और बड़े मियाँ एक तरफ़ घाव पर एक पुराना कपड़ा बाँधते हैं।)


(मौन।)


(बड़े मियाँ अचानक एक भजन गाने लगते हैं - ‘मान ले कियो रे मनड़ा’।)


गीत 4-

मान ले कियो रे मनड़ा,

मानले कियो रे,

उमर सारी बीती रे मनड़ा,

मानले कियो रे।।


जवानी रे धोरे बन्दा,

धुन में रियो रे,

धर्म ने डिगाय मनड़ा,

पाप ने लियो रे,

मानले कियो रे,

मानले कियो रे,

उमर सारी बीती रे मनड़ा,

मानले कियो रे।।


(पीछे बैठी बादीं धीमे धीमे सुबकने लगती है। अब सिर्फ़ वही बची है। समय जैसे ठहर जाता है।)


(तभी भेड़ियों की आवाज़ फिर उठती है। बड़े मियाँ गोलीयाँ दाग़ते हैं।)

“ह्वा आ आ आ…”


बड़े मियाँ: ख़ारू रे! कुछ करना होगा। ये मौत बनके आए हैं आज। ऐसे नहीं रुकेंगे ये।

॰ ख़ारा रे! कुछ करनो पड़सी। ये आज मौत बणकै आया है। आ अइयाँ ई कोनीं रुकअ।


(स्तिथि को भाँपकर बादीं धीमे से उठती है।)


बड़े मियाँ: ख़ारू।

॰ ख़ारा।


(ख़ारू पीछे पलटता है। बादीं की आँखें भरीं हैं। बड़े मियाँ वहीं बैठे लगाम अपने हाथ में लेते हैं।)


(ख़ारू उठकर बादीं के पास जाता है। रौशनी बदलती है। मंडली सारंगी का एक उदास स्वर उठाती है।)


(ख़ारू और बादीं पीछे गड्डे पर खड़े हैं। सिर्फ़ उन दोनों पर रौशनी गिरती है जो पूरे मंच पर उन दोनों के अकेले होने का एहसास कराती है।)


(बादीं काँपते हाथों से नथ उतारती है और ख़ारू को थमा देती है।)


बादीं: ये लो…
॰ या ले…


(ख़ारू कुछ नहीं कह पाता। दोनों एक आखिरी नज़र एक दूजे को देखते हैं, फिर धीमे से ख़ारू का हाथ थामे बादीं खुद ही नीचे उतर जाती है। धीमे से वो भी निगली जाती है।)


(ख़ारू पीछे देखने को मुड़ता है… फिर खुद को रोक लेता है। जबरन सामने देखने लगता है।)


अंधकार।


(इस बार रौशनी खुलने पर गड्डा हल्का और तेज़ दौड़ा चला जा रहा है लेकिन बैल थक चुके हैं। लगाम ख़ारू के हाथ में है और बड़े मियाँ पीछे लेटे हैं।)


बड़े मियाँ (टूटकर): बैल थक रहे हैं बेटा। अब क्या करें…
॰ बैल थक रया है छोरा… अब काई करां…


(मौन।)


बड़े मियाँ(सोचकर): हम दोनों नहीं बच पाएँगे… किसी एक का बचना ज़रूरी है…
॰ म्हां बणी (आप्पा दोनूँ) कोनीं बच सकांगा… कोई एक रो बचणो जरूरी है…


(लंबा मौन)


बड़े मियाँ: मैं तो बूढ़ा हो लिया बेटा… मेरी जिंदगी बीत गई… ख़ूब बढ़िया जी। मुझे जाने दे।
॰ म्ह तो बुड्ढो हो लियो बेटा… मेरी जिंदगाणी तो बीत गी… घणी बढ़िया जी… मन्ने जाण दे।


ख़ारू: क्या बोल रहा है बापू! ना!.. ना ना ना!

॰ के बोल रयो है बापू! ना!… ना ना ना!


(ख़ारू फूँट पड़ता है।)


बड़े मियाँ: मेरी बात समझ बेटा।

॰ मेरी बात समझ छोरा।


(बड़े मियाँ जूते उतारते हैं… धीरे, बहुत साधारण ढंग से।)


बड़े मियाँ: ये जूते… तू मत पहनना… मरे हुए आदमी के जूते नहीं पहने जाते… बेच देना…
॰ ये जुत्ता… तूँ मत पैरिये… मरेयोड़ा रा जुत्ता कोनीं पहरेया जावे… बेच दिये…


ख़ारू(सुबकते हुए): ना बापू!

॰ ना बापू!


बड़े मियाँ (शांत): ख़ारू… पाप हो गया हमसे बेटा… पर अब सौदा बराबर हो जाएगा…

॰ ख़ारा… पाप हो गयो म्हारै सूं छोरा… पण अब सौदो बराब्बर/सरखो होग्यो…


(बड़े मियाँ छूरियाँ उठाते हैं। गले में कपड़ा कसते हैं और कूद जाते हैं। अब मंच पर सिर्फ़ बड़े मियाँ पर रौशनी है। हाथ में छुरियाँ लिए वो मंच पर खड़े हैं और भेड़ियों का समूह धीरे धीरे उन्हें निगलने लगता है। धीमे से मरते हुए वो एक आख़िरी कविता पढ़ते हैं।) (‘भेड़िया’ कविता; सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)


(नोट: बड़े मियाँ के स्थान पर यह कविता नेपथ्य से किसी अन्य कलाकार से भी पढ़वाई जा सकती है।)


भेड़िए की आँखें सुर्ख़ हैं।

उसे तब तक घूरो

जब तक तुम्हारी आँखें

सुर्ख़ न हो जाएँ।

और तुम कर भी क्या सकते हो

जब वह तुम्हारे सामने हो?

यदि तुम मुँह छिपा भागोगे

तो भी तुम उसे

अपने भीतर इसी तरह खड़ा पाओगे

यदि बच रहे।

भेड़िए की आँखें सुर्ख़ हैं।

और तुम्हारी आँखें?


भेड़िया ग़ुर्राता है 

तुम मशाल जलाओ।

उसमें और तुममें

यही बुनियादी फ़र्क़ है

भेड़िया मशाल नहीं जला सकता।

अब तुम मशाल उठा

भेड़िए के क़रीब जाओ

भेड़िया भागेगा।

करोड़ों हाथों में मशाल लेकर

एक-एक झाड़ी की ओर बढ़ो

सब भेड़िए भागेंगे।

फिर उन्हें जंगल के बाहर निकाल

बर्फ़ में छोड़ दो

भूखे भेड़िए आपस में ग़ुर्राएँगे।  (बड़े मियाँ गुर्राते हैं, फिर कोरस को काटने लगते हैं।)

एक-दूसरे को चीथ खाएँगे।

भेड़िए मर चुके होंगे

और तुम?


भेड़िए फिर आएँगे।

अचानक

तुममें से ही कोई एक दिन

भेड़िया बन जाएगा

उसका वंश बढ़ने लगेगा।

भेड़िए का आना ज़रूरी है

तुम्हें ख़ुद को पहचानने के लिए

निर्भय होने का सुख जानने के लिए

मशाल उठाना सीखने के लिए।

इतिहास के जंगल में

हर बार भेड़िया माँद से निकाला जाएगा।

आदमी साहस से, एक होकर,

मशाल लिए खड़ा होगा।

इतिहास ज़िंदा रहेगा

और तुम भी

और भेड़िया?


बड़े मियाँ (चिल्लाते हुए): ले! ले! भेड़िये की औलाद!
॰ ले! ले! भेड़िया री औलाद!


(कोरस उन्हें निगल लेता है। आवाजें धीरे-धीरे खत्म होती हैं। रौशनी बदलती है।)


(ख़ारू पीछे मुड़ कर देखता है पर उसे कोई नहीं दीखता। इस बार वो वापस सामने पलटता है तो उसकी आँखें नम हैं। मंच पर अब सिर्फ़ ख़ारू है। अकेला-गड्डा हाँकता हुआ। भारी सन्नाटा।)


(धीरे-धीरे रौशनी फिर वृद्ध ख़ारू पर लौटती है।)


वृद्ध ख़ारू(आँसू पोंछता हुआ): बस मैं ही किसी तरह भेड़ियों से बचा। अगले साल मैंने… उनमें से साठ भेड़िये और मारे… मैं किसी चीज़ से नहीं डरता…

॰ बस म्ह किसी तरियाँ भेड़ियां स बच गो। आगली साल म्ह… उंना म स साठ भेड़िया ओर मार गिरायो… म्ह काई स कोनीं डरूं…


(वह हँसता है। खखारता हुआ ज़मीन पर थूकता है। फिर अचानक उसकी आँखें कठोर हो जाती हैं लेकिन हँसी पूरी तरह रुकती नहीं। रौशनी जाती है।)


(पहला गीत ‘धीमेरा चालो’ फिर से उठता है।)


गीत 5-

आंगणिये मों ऊभा

अै तो सोळह सूरज ऊगा

म्होंरे लाडळले नों रे

खम्मा रे खम्मा

म्होंरे केसरिये नों रे

खम्मा रे खम्मा

थे तो धीमेरा रे धीमेरा चालो

म्होंरे लाडळले नों रे

खम्मा रे खम्मा

म्होंरे केसरिये नों रे

खम्मा रे खम्मा

थे तो धीमेरा रे धीमेरा चालो


(रौशनी गड्डा हाँकते ख़ारू पर उभरती है। अचानक गड्डे के पीछे क्षणभर के लिए बादीं दिखाई देती है। वही शांत मुस्कान। वही नथ।)

(युवा ख़ारू उसे नहीं देखता। सिर्फ़ वृद्ध ख़ारू देखता है।)

(बादीं धीरे-धीरे अंधेरे में विलीन हो जाती है।)

(इस बार रौशनी आने पर वृद्ध ख़ारू गड्डे में युवा ख़ारू के पीछे खड़ा दिखता है। भेड़ियों का कोरस धीरे-धीरे उसके पीछे खड़ा हो जाता है। स्थिर-मौन, जैसे वे हमेशा से वहीं थे।)


वृद्ध ख़ारू(दहाड़ते हुए): मैं किसी चीज़ से नहीं डरता… सिवा भेड़िये के…
॰ म्ह काई स कोनीं डरूं… सिवाए… भेड़िया क…


(फिर वही दहाड़ धीरे-धीरे बदलने लगती है। वह खुद चौंक जाता है। हँसी रोकने की कोशिश करता है… पर आवाज़ निकलती रहती है।)


“ह्वा… आ… आ…”


(पीछे खड़े भेड़ियों का कोरस बिल्कुल उसी लय में उसके साथ जुड़ जाता है।)


(गीत अपने चरम पर पहुँचता है।)


अंधकार।


अनन्त ♾️


[भेड़िये; अप्रैल 1938]

[खारु बंजारा; 8 मई 2026]


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