Ullu aur uska Pattha

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उल्लू और उसका पट्ठा

(प्रमोदजी और उनके बेटे की अनूठी दास्तां)

(अंतरालपुर क़िस्सा #2)

                                           

कामतानाथ की 'संक्रमण' पर आधारित                                                                    नाटककार अनन्त गौड़



एनाउंसर: तो लीजिये... आप लोगन को पेशकश है... हास्य एवं रोमांच से भरपूर। एक देहाती-स्लैपस्टिक। कामतानाथ जी की संक्रमण पर आधारित, बाप और बेटे के खट्टे मीठे रिश्ते की कहानी। अ हनी कोटेड पिल ऑफ़ रिलेशनशिप्स (a honey coated pill of relationships)। श्री प्रमोदजी शास्त्री और उनके बेटे निकेतन की अनूठी दास्तान। अन्तरालपुर का किस्सा नंबर 2।  उल्लू और उसका पट्ठा पट्ठा पट्ठा....

[ प्रमोदजी शास्त्री एक रिपोर्टर के साथ बाहर से घर में प्रवेश करते हैं।]
 
प्रमोदजी: आओ बेटा बैठो, चाय पिओगे... (आवाज़ लगाते हुए) बहू ज़रा चाय ले आना..

रिपोर्टर: अरे नहींं नहींं अंकल जी, उसकी कोई ज़रूरत...

प्रमोदजी: अच्छा... (आवाज़ लगाते हुए) बहू चाय ले आना ज़रा...

रिपोर्टर: नहींं अंकल जी,  मुझे नहींं पीनी है चाय।

प्रमोदजी: हम तो पी लें बेटा, अपने लिए मंगा रहा हूं।

रिपोर्टर: ओह.. सॉरी सॉरी, हाँ आप पीजिए।

प्रमोदजी: अच्छ बेटा टी-वी पर कब आएगी ये ख़बर..

रिपोर्टर: आज शाम तक आ जाएगी अंकल जी। 6 बजे वाली न्यूज़, ख़बर-पच्चिसी पर।

प्रमोदजी: अच्छा... चोरी चकारी इतनी बढ़ गई है आजकल बेटा। हद हो गई.. ट्रक भर कर चोरी तो पहली बार देख रहे हैं हम।

रिपोर्टर: अजी ये तो कुछ भी नहींं है अंकल जी, राजकुमार चोर तो दिन-दहाड़े दूध की डेरी लूट आया था एक हफ्ते पहले, पूरी डेरी खाली कर के ले गया टैंकर में। टोकन तक नहींं छोड़े सालों ने। ये भी राजकुमार की गैंग का काम लग रहा है मुझे तो।

प्रमोदजी: देखो बेटा.... पुलिस पकड़ेगी कभी तो इन नामुरादों को। ख़ैर हम तो बेटा सभी से परेशान हैं, चोर साले चोरी के नए नए तरीके इजाद कर रहे हैं और एक हमारा बेटा है वो कामचोरी में मरा जा रहा है।

रिपोर्टर: जी... पर अंकल जी एक बात मुझे समझ नहींं आई, अगर आपने रात को ही चोरी होते हुए देख लिया था तो पुलिस को क्यूं नहींं बुलाया?

प्रमोदजी: अम्म्... अरे वो... बेटा क्या है पहले तो काफ़ी  देर मुझे लगा कि गुप्ता जी घर बदल रहे हैं। फिर ये लोग ट्रक में गाने वाने लगा कर नाच भी तो रहे थे।

रिपोर्टर: कौन?? ये चोर लोग??

प्रमोदजी: हाँ हाँ... मुझे लगा कोई पार्टी वगहरा होगी, इसलिए... मैं जाकर सो गया।

रिपोर्टर: अच्छा... पर पुलिस को तो आपने पूरी चोरी का बयान दिया... ख़ैर....

प्रमोदजी: (बात काटते हुए) बहू चाय नहींं लाई... (आवाज़ लगाते हैं) साधना। बस एक इस बहू का सहारा है अब तो बेटा। बिलकुल मेरे अपने बेटे जैसी है, बल्कि उससे भी ज़्यादा। कभी कभी तो मेरे बेटे से ज़्यादा वो मुझे बेटा लगती है। यूं मान लो वो मेरा बेटा ही है।

रिपोर्टर: जी.... लकी हैं आप लोग। अच्छा अंकल जी मैं चलता हूँ, मुझे स्टूडियो जाना है। वरना आपकी फ़ूटेज नहींं आएगी शाम को टी-वी पर।

प्रमोदजी: हहाहाहह.... अच्छा ठीक है बेटा चलो। फिर आना कभी इंटरवियू लेने।

रिपोर्टर: ज़रूर... अच्छा नमस्ते जी।

प्रमोदजी: नमस्ते बेटा।

[प्रमोदजी बरामदे में खाट पर बैठे हैं। निकेतन अंदर से आता है और कुर्सी पर बैठ जाता है।] 

निकेतन: पापा मैं दफ़तर जा रहा हूँ।

प्रमोदजी: जाओ।

निकेतन: ठीक है.....

[ उठ कर जाने लगता है। फिर कुछ सोचकर रुक जाता है।]

निकेतन: पापा आज वो मेरे बॉस घर आएंगे डीनर पर...

प्रमोदजी: हाँ तो आने दो।

निकेतन: वो... मैं कह रहा थी कि अगर आज के लिए ये खाट अंदर लगा देते तो.. थोड़ा इम्प्रैशन खराब....

प्रमोदजी: (ऊंची अवा में) खाट से क्या दिक्कत है। हमारे बाप दादा सब खाट पर ही सोते थे.... खाट अंदर नहींं जाएगी।

निकेतन: पापा.........

प्रमोदजी: बोल दिया ना एकबार।

निकेतन: अच्छा आप कम से कम कपड़े पहन कर बैठिएगा शाम को, लोग आते है अपको यूं नंगे बदन बिना बिसतर कि चारपाई पर पड़े देखकर ,पता नहींं क्या क्या सोचते हैं। ऐसा लगता है हम आप पर ज़ुल्म करते हों मानो।

प्रमोदजी: हाँ तो करते ही हो वो तो...... क्यों नहींं करते?

निकेतन: क्या बोल रहें हैं पापा....

प्रमोदजी: हाँ तो जिस घर में बुढ्ढे बाप कि सुनी ना जाए वो ज़ुल्म ही है।

निकेतन: (खड़ा होते हुए) अच्छा पापा चलता हूँ।

प्रमोदजी: तीन दिनों से बाथरूम कि टंकी लीक हो रही है। 100 बार बता चुके हैं पर तुमसे तो होगा नहींं हम ही जाते हैं। 

[प्रमोदजी नंगे बदन बाहर जाते है। निकेतन प्रेक्षक-गण कि ओर मुड़ता है।]

निकेतन: नमस्कार... मैं निकेतन शास्त्री हूँ। और ये थे मेरे पिता जी, श्री प्रमोदजी शास्त्री। मुझे बहुत ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है पर मेरे पूजनीय पिता जी सठिया गये हैं। रिटायर होने के 6-8 महीने तक तो ठीक थे पर उसके बाद पता नहींं क्या हुआ। दिन-भर रात-भर बड़बड़ाते रहते हैं। ज़रा ज़रा सी बात पर गुस्सा हो जाते है। किसी को नहींं छोड़ते... और मुझे तो ऐसे नापसंद करते हैं मानो मैं सौतेली संतान हूँ इनकी। पर मजाल है जो मैंने आज तक पलट कर जवाब दिया हो। अब कोई पुछे ज़रा.... ये पर्सो की ही बात ले लिजीए। इस बात पर बिगड़ गए कि दफ़्तर से लेट क्यूं आते हो।

[प्रमोदजी एक पुराना सा बनियान पहन कर, चिल्लाते हुए प्रवेश करते है।]

प्रमोदजी: हाँ तो क्यूं ना बिगड़ूं, रात बेरात घर में आना ये कहाँ कि समझदारी है। हमें तो चिंता होने लगती है। सड़कों पर हर रोज़ लूटमार और कत्ल होते हैं। एक्सीडेण्ट हो रहे हैं.. सीधा घर आने में क्या परेशानी है।

निकेतन: पापा एक्सीडेण्ट होना होगा तो होकर रहेगा। उल्टा रात में तो फिर भी एक्सीडेण्ट कि सम्भावना कम हो जाती है। दफ़तर के ट्रैफ़िक का रश कम रहता है। और रही चोरी कि बात तो वो दिन दहाड़े हो रही है आजकल। रात में तो फिर लूटने वाला सोचेगा कि इतनी रात में बेफ़िक्री से जा रहा है, इसके पास क्या होगा, आधे चोर तो अपना ही भाई-बंध समझ कर नज़र नहींं डालते।

प्रमोदजी: ओहो..... क्या बात कही है शास्त्री जी, आप तो पण्डित निकले। घर में हज़ारो काम होते हैं.... इतनी बार कहा है आटा पिसवा लाओ, ये साला थैली का आटा आंतों में चिपकता है, पर तुम्हारे कान पर जूं नहींं रेंगती।

निकेतन: पापा आई.एस.आई ब्राण्ड का आटा है। पूरी दुनिया खाती है, कैसे चिपक सकता है आंतो में....... 

प्रमोदजी: अरे भाई हम कह रहे हैं जब, चिपकता है तो चिपकता है। तुम्हारे इस आटे कि रोटी और चमड़े की रोटी में कोई फ़र्क नहींं। हमारा गेहूँ असली है, कोई मिलावट नहींं। समझे।

निकेतन: पापा इतनी बड़ी कम्पनी है,सरकारी ठ्प्पा है। मिलावट करेंगे तो ठप्प हो जाएगी कम्पनी और जेल होगी सो अलग।

प्रमोदजी: अरे वो सब मुझे मत बता। मुझे सिर्फ मेरी.. अम्म... हमारी सेहत कि चिंता है... अब तुम्हें नहींं है तो ना सही। इसलिए ही सब्ज़ी के लिए भी बोलता हूँ.... ये साले रेहड़ी वाले 4-4 दिन पुरानी बासी सब्ज़ी रखते हैं। पेट ख़राब तो हमारा होगा ना, इनका क्या जाता है।

निकेतन: (व्यंग से) पापा आप खुद ही तो लाते हो सब्ज़ियां, बासी क्यूं लेकर आते हो फिर आप।

प्रमोदजी: मैं क्यूं बासी लाउंगा भई, हैं? मैं क्यों लाऊंगा बांसी सब्ज़ियां। बोल। वो होती ही हैं 4-5 दिन कि... पेट ख़राब हो जाता है। देखकर पता नहींं चलता ऐसे।

निकेतन: हम सब भी वही खाना खाते है पापा, हमें तो कुछ नहींं होता। आप मान क्यूं नहींं लेते आपका हाजमा अब ठीक नहींं रहता, बुढ्ढे हो चलें हैं आप।

प्रमोदजी: (गुस्से से पलटते हुए) हाँ.... बिगड़ा काम बाप के सर। हमें तो कुछ मालूम ही नहींं है ना। पाल पलोस के इतना बड़ा, घोड़े जैसा ऐसे ही कर दिया है तुम्हें।

निकेतन: अब क्या करें फिर आप ही बता दो पापा। अब डाएरेक्ट(direct) खेत से तोड़ कर तो ला नहींं सकता ना सब्ज़ीयां।

प्रमोदजी: वाह बेटा शाबाश.... शाबाश। क्या बात कही है........ की डायरेक्ट खेत से तोड़ कर तो नहीं ला सकता ना सब्ज़ियां। वाह.... अब बाप से ज़बान भी लड़ाओ। मुझे भी क्या फ़र्क पड़ता है, मरो सालो। जब कोई सुनता ही नहीं इस घर में.......

[ प्रमोदजी खिस्सीयाते हुए घर के भीतर चले जाता हैं।]

निकेतन: (आवाज़ लगाते हुए) अरे पापा, मेरा मतलब वो नहीं था, मैं बस...........
[प्रेक्षक गण को सम्बोधित करते हुए]
अब आप बताइये मुझे कि एक अबला बेटा करे तो क्या करे। अब इंस्टेंट(instant) ताज़ी सब्ज़ीयां कहाँ से निकालूं मैं। मुझे कहते हैं टाइम से घर आओ, खुद घंटो घंटो, 12-12 बजे तक शर्मा अंकल के घर शतरंज खेला करते थे, सो भूल गए। 3-4 बार बुलाने पर भी नहीं आते थे। बिगड़ते थे सो अलग। मां बताती थी एक ज़माने तो रात रात भर गायब रहते थे, किसी भाटिया साब के यहाँ देर तक पपलू फ़्लश खेलते थे। 2 3 महीने कि पूरी तनख्वाह हार आए। कितनी बार पीकर लौटते थे, बिस्तर पर उल्टी कर दिया करते थे। लेकिन अपना वक़्त किसे याद रहता है भाई। एक लड़की पसंद कि थी कॉलेज में पर नहीं, खुद कपूर अंकल के घर बैठे उनकी बीवी के हाथ के पकोड़े खाया करते थे वो कुछ नहीं। मां सब बताती थी मुझे।
और अपना struggle तो बता ही नहीं सकता इंसान इस घर में.... गल्ती से ज़िक्र कर दिया तो फिर ये होता है।

[प्रमोदजी पुराने से कुर्ते में अंदर से आकर खाट पर बैठ जाते हैं। हाथ में ग्लास लिए कुछ पी रहे हैं।]
प्रमोदजी  : 10...... 10 किलोमीटर पैदल चल कर जाते थे हम स्कूल। कभी जेब-ख़र्च नहीं मिला, बि.ए- एम.ए तक सूट टाई नहीं पहनी। (हाथ से ब्रेड पर जैम लगाने का इशारा कर कुछ याद करते हुए)

निकेतन: मक्खन??

प्रमोदजी: अम्म्म्महम... (गर्दन से ना का इशारा कर)

निकेतन: पॉलिश??

प्रमोदजी: अम्म्म्महम... (गर्दन से ना का इशारा कर)

निकेतन: ब्रैड??

प्रमोदजी: जैम। जैम-जैली का नाम तक नहीं सुना। नमक से रोटी देती थी तुम्हारी दादी, नमक से... वही खा कर चले जाते थे पढ़ने। सुबह नमक... सूखी रोटी। शाम को नमक.... सूखी रोटी। रात में नमक... सूखी रोटी.... प्याज़।

निकेतन: (पानी का गिलास देते हुए) पापा पर तब तो ऐसा ही होता था ना... सब ही लोग ऐसा करते थे। हमारी गलती है कि हमें सहुलियत दी आपने।

प्रमोदजी: वही बोल रहा हूँ उल्लू के पट्ठे। हमारे पास खाने के लिए रोटी तक नहीं थी....

निकेतन: सब्ज़ी नहीं थी पापा.... रोटी तो... नमक सुखी...

प्रमोदजी: हाँ वही, सब्ज़ी रोटी.......... पर तुम लोगों को उसकी क़द्र नहीं है। कितना परिश्रम लगा है तब जाकर कामयाबी मिली है, ये घर बना है। जीन्स डाले घुमते रहो बस, कल से बोल रहा हूँ अंदर वाले बाथरूम कि टन्की चू रही है, ठीक करा दे, ठीक करा दे, पर नहीं।

निकेतन: ठीक है 'बाबूजी' करा दूंगा वो तो पर अब कपड़े तो यही पहनुंगा ना। मिलते ही यहीं हैं अब, आपके ज़माने में सूट जींस पैण्ट मिलते ही नहीं थे, पतलून कमीज़ और कुर्ते होते थे। उससे कुछ साल पहले, धोती और कमण्डल लेकर फिरते थे लोग। फ़ैशन का जलवा है पापा ये सब।

प्रमोदजी: यही तो ले डूबा तुम्हारी पूरी पीढ़ी को। अपने हाथों से बनाया है यह घर, और मज़ाक नहीं सच में। ये फ़र्श जिसपर बैठे हो ना अपने हाथों से चिनाई कराई है इसकी। ईंटे तक उठाई हैं, और आज इसका पलस्तर झड़ता देखता हूँ तो ख़ून जलता है मेरा। पर तुम्हें कहाँ फ़र्क पड़ता है, जिस दिन ये मकान गिरेगा ना तब समझ आएगा। 

निकेतन: ज़रा सा गिरा है पलस्तर पापा, 1 इंच होगा। घर कैसे गिरेगा उस्से? 

[प्रमोद जी बोलते हुए भीतर जाते हैं।]

प्रमोदजी: ये तो वक़्त ही बताएगा बेटा.... ये तो वक़्त ही बताएगा।

निकेतन: (प्रेक्षकगण से) देखा साहब, ये तो हाल है। पलस्तर ठीक ना होने से और गिर जाएगा समझ आता है, पर दीवार गिर जाएगी। चलो फिर भी गनीमत है, अभी कुछ दि नों पहले बोल रहे थे मकड़ी का जाला जागने से छत गिर जाएगी.. भला ऐसा हुआ है........

[अंदर से प्रमोद जी आवाज़ लगाते हुए बाहर आते हैं। पिछ्ले दृश्य वाले कपड़े ही पहने हुए हैं।]

प्रमोदजी: (हाथ में चूहेदानी उठाए है) हाँ जी.... मिस्टर निकेतन शास्त्री। ये चुहिया फसी हुई है, इसे कब छोड़ कर आओगे। 15 दिन मे जाकर तो पकड़ में आई है ये। अब क्या इसे यहीं बसाना है।

निकेतन: अभी छोड़ कर आउंगा पापा, दीजिए।

प्रमोदजी: अब कहने पर गए तो क्या गए बेटा। कभी तो ऐसा करो कि बिना कहे कुछ काम खुद से कर दिया। ज़रा हमारे भी कलेजे को ठंडक पहुंचे।

निकेतन: अब जा तो रहा हूँ पापा। 

प्रमोदजी: हाँ जाओ.... (रोकते हुए) अच्छा सुनो।

निकेतन: जी...

प्रमोदजी: कहाँ... छोड़ोगे कहाँ? 

निकेतन:  वहीं जहाँ हर बार छोड़ता हूँ।

प्रमोदजी: हर बार नहीं, महोल्ले से दूर छोड़कर आना। पिछली बार वापस आ गयी थी ये।

निकेतन: अरे पापा... वो नहींं है ये। बाइक पर 4 किलोमीटर दूर छोड़ कर आया था, वापस कैसे आ सकती है।

प्रमोदजी: अरे हम बता रहे हैं जब ये वही है, झूठ बोल रहा है तू।

निकेतन: झूठ क्यूं बोलुंगा इसमें.... आपको भरोसा नहीं है तो आप खुद छोड़ आइये।

प्रमोदजी: तुझे किसलिए पैदा किया है फिर ये बता दे मुझे।

निकेतन: चूहें छोड़कर आने के लिए???? 

प्रमोदजी: मत जा, मैं ही जाता हूँ। ला इधर।

निकेतन: नहीं मैं जा तो रहा हूँ पापा...

प्रमोदजी: हट.... उल्लू का पट्ठा।

[पिंजरा लेकर बाहर जाते हैं।]

निकेतन: मुझे तो ये समझ नहीं आता कि मैं करूं क्या इनका। मैंने तो कसम खा ली है, जितना टोर्चर मुझपर ये कर रहे हैं ना... उसका सारा बदला निकालुंगा मैं अपने लड़के पर। ये तो फिर भी चुहिया है, अब छिपकली और झिंगुर का क्या करुं मैं। अमरीका कि फर्स्ट लेडी तो हैं नहीं पापा कि उनकी तरह 'आधी रात के बाद' पुरे शहर के मंत्री लगा दूं, झिंगुर ढूंढ़ने में। मामुली सा आदमी हूँ यार। आजकल एक और नया फिकरा ईजाद किया है, कि घर को कबाड़-खाना बनाया हुआ है। टीन के बक्से में पता नहीं क्या क्या दुनीया भर कि सारी चीज़ें भरे रखें हैं। नट बोल्ट किल पेंच तार जाली पुराने-कब्जे बिना ताले कि चाबियां और ना जाने क्या क्या। सड़क पे चलते चलते कहीं कुछ भी मिल गया, छर्रा, गोली, लोहा... बस उठा लाएंगे और बक्से मैं भर लेंगे। अभी कुछ दिन पहले कुछ पुराने ताले ढूंढ़ निकाले और पूछने लगे कि इनकी चाबियांं कहाँ है?? (प्रमोद जी बनियान पहने अंदर वाले कमरे से आते हैं और बरामदे में चाबियांं ढूंढ़ने लगते हैं।) अब बाबा आदम के ज़माने के ताले, चाबियांं कहाँ से निकाले। न जाने कब से खराब पड़े होंगे। पर नहीं ज़िद पकड़े बैठे हैं की....

प्रमोदजी: घर में ताले आए हैं तो चाबियां भी आई होंगी। 

निकेतन: आई होंगी पापा पर चीज़ें खोती भी तो हैं। एक हफ़्ते से अभियान चालू है, मिलनी होती तो अब तक मिल जाती ना चाबियां।

प्रमोदजी: हाँ तो क्या बर्बाद कर दूं। इतने महंगे आते हैं ताले... चाबी नहीं हैं तो बनवाओ, कारीगर बुला कर लाओ और तुमसे नहीं होता, जो की तुमसे नहीं होगा..... तो मैं खुद ही जाता हूँ। 

[ कुर्ता पहनने भीतर जाते हैं।]

निकेतन: अब ये चाबियांं भी बनवाकर लाएंगे और उन्हें भी बक्से मे बंद कर लेंगे। हम तो भैया हो गए परेशान, हम चले दफ़्तर, राम राम।

[ निकेतन बाहर जाने लगता है, तब ही उसकी सास का प्रवेश।] 

निकेतन: अरे.... मम्मी आप। आज इतनी सवेरे। नमस्ते। 

[ प्रमोदजी गर्दन निकाल कर, अंदर वाले कमरे से ही झांक कर देखते हैं, फिर हड़बड़ी में अंदर चले जाते हैं।]

सास: हाँ... जीते रहो। इसी ने बुलाया है महमान। बोल रही थी शाम को दावत कुछ है?

निकेतन: हाँ वो मेरे बॉस आ रहे हैं खाने पर, प्रोमोशन की बात चल रही है। तो इसी इसी चक्कर में बुला लिया मैंने।

सास: अच्छा। महमान... लाली कहाँ, भीतर है?

निकेतन: ना ना मार्किट गयी है थोड़ा सौदा सब्ज़ी लेने। आती होगी... आप एक काम करो अंदर चली जाओ कमरे में, आराम वराम कर लो थोड़ी देर। आ लेगी तब तक ये भी। मैं भी दफ़्तर ही निकल रहा था।

[ प्रमोदजी शाखा का निक्कर और बनियान पहने वर्जिश करते हुए बाहर आते हैं। सास उन्हें देख के घूँघट कर लेती है।]

प्रमोदजी: अरे भई निकेतन चलो जल्दी। मेरा भी कुश्ती का टाइम निकल जाएगा तुम्हारे चक्कर में। ओहोहो... अरे समधन जी आप। कब आयीं?? निकेतन बताया नहीं तुमने बेटा, कुछ चाय पानी पूछा। नालायक...

निकेतन: (जैसे नींद से जागते हुए) हैं?? नहीं... पर आपको क्या हुआ? निक्कर पहने कहाँ जा रहे हैं??

प्रमोदजी: भई कसरत करने और कहाँ? तुम तो जानते ही हो शारीरिक तंदुरुस्ती मेरे लिए कितनी ज़रूरी है भई...

[ निकेतन और सास दोनों हस्ते हैं।]

निकेतन: हाहाहा... आप?

प्रमोदजी: हाँ मैं... उल्ल.. भई अब तुम घर पर रहो तो तुम्हें पता चले। सुबह तुम जल्दी निकल जाते हो और रात को सौ बार बोलने पर भी आते नहीं हो टाइम से घर। 

निकेतन: पर साधना ने भी कुछ नहीं बताया।

प्रमोदजी: अब दफ़्तर नहीं जाना तुझे.... 

नुकेतन: हाँ जा रा हूँ बस... वो मम्मी जी आ गयीं तो मैं रुका था।

प्रमोदजी: अरे हम देख लेंगे मम्मी जी को... मेरा मतलब है हम मर गए हैं क्या। जाओ तुम लेट हो रहे हो।

निकेतन: आप तो कुश्ती करने जा रहे थे।

प्रमोदजी: अब भला महमान को छोड़ कर जाया जाता है कभी.... साधना भी नहीं है। समधन जी के लिए एक दिन कसरत छोड़ देंगे। कोई बात नहीं।

सास: नहीं नहीं... आप चले जाइये। लाली भी बस आती ही होगी।

प्रमोदजी: अरे नहीं नहीं समधन जी... अब आप इतने दिनों में आईं है तो दो चार बात आपसे भी कर लें ज़रा। 

निकेतन: अभी दो हफ़्ते पहले ही आई थी मम्मी जी।

प्रमोदजी: अच्छा अब तू बताएगा मेरे घर में कौन कब आएगा... तू निकल भई।

निकेतन: हैं?? अच्छा... ठीक है। चलता हूँ फिर... नमस्ते। नमस्ते मम्मी जी।

[ निकेतन प्रेक्षकों को इशारा करते हुए जाता है।]

प्रमोदजी: और बताइये समधन जी काफ़ी दिनों बाद आना हुआ।

सास: अभी तो गई हूँ जी कुछ दिन पहले।

प्रमोदजी: अजी आप आती जाती रहती हैं तो मन लगा रहता है, अम्म... बच्चों का। इनका मन लगा रहता है। वरना सच कहूँ तो इसकी माँ के जाने के बाद तो जीवन बड़ा सूना सा लगता है समधन जी।

सास:  जी मैं भी इसी लिए थोड़ा चक्कर मारती रहती हूँ। पर अब बेटी धी का घर है... ज़्यादा आना जाना भी ठीक नहीं लगता। वो तो लाली ने बुला लिया वो आज दावत के चक्कर में...

प्रमोदजी: हाँ वो इसका बॉस आएगा शाम को कह रहा था। पर ये आपका अपना ही घर ही है... आख़िर आप निकेतन की माँ से कम थोड़ी न हैं।

सास: जी???

प्रमोदजी: मतलब आती जाती रहा कीजिए। अच्छा लगता है।

सास: जी.... देखूँ ज़रा अंदर क्या क्या सामान ले आयी है ये लड़की। 

प्रमोदजी: जी...  अच्छा मैं कुछ मदद करूँ आपकी??

सास: अरे नहीं नहीं आप रहने दीजिए।

[सास उठकर भीतर जाती है। प्रमोदजी देखते रहते हैं।]

प्रकाश जाता है।

अंतराल

प्रकाश आता है।

[ प्रमोद जी हाथ में तेल कि कुप्पी लिए बैठे हैं और सामान में तेल डाल रहे हैं। निकेतन भी कुर्सी पर बैठा प्रेक्षकों की ओर देख रहा है।]

निकेतन: लिजीए... एक और नई मुसीबत... ये देख रहे हैं (कमीज़ पर तेल का दाग दिखाते हुए)। पता नहीं क्या नए नए खेल मिलते रहते हैं इनको.. कहीं से मशीन में तेल डालने वाली कुप्पी पा गई, उसमें कड़वा तेल भरे रखे हैं। हर छटे- सातवे दिन घर के तालों में तेल डालकर उन्हें धूप दिखाते रहेंगे। यही नहीं घर के सभी दरवाज़े सिटकनियों में दबादब तेल उड़ेलते फिरते हैं। जो भी दरवाज़ा खोलता है, उसके कपड़ो में तेल लग जाता है। पर मजाल है कोई इन्हें कुछ कह दे। और कहो, तो फिर सुनो... ये देखिए...
(प्रमोदजी से) अअअ... पापा आप क्यूं हर दूसरे दिन ये कुप्पी लेकर तेल डालने लगते हैं, सारे कपड़े गंदे हो जाते हैं। इतना भी तेल क्या पिलाना इनको।

प्रमोदजी: अपने लिए नहीं कर रहा हूँ ये सब। ये सबकुछ सर पर उठाकर नहीं ले जाउंगा। मरुंगा तो सब यहीं छोड़ कर जाउंगा, फिर जो समझ में आए करना। मुझसे अपनी आंखों बरबादी नहीं देखी जाती। इसलिए हलाकान होता रहता हूँ।

निकेतन: (प्रेक्षकों से) देखा.... कौन कह रहा है हलाकान होने को। जब इस बात का एहसास है कि.. कुछ सालों में...(हाथ से इशारा करता है, फिर प्रमोदजी को देख कर सहम जाता है।) मेरा मतलब ये सब साथ नहीं लेकर जाने वाले तो क्यूं मोहमाया में फसे हैं। अरे भगवत भजन में मन लगाओ, रामायण का पाठ करो। पर नहीं, रात भर टहलते रहेंगे और हर खिड़की दरवाज़े को ठोक बजा कर चैक करते रहेंगे। और गल्ती से कोई दरवाज़ा खुला रह गया तो सुबहा सारा घर सर पर उठा लेंगे कि, चोरी हो जाती तो। हफ्फ....

प्रकाश जाता है।

[ शास्त्री घर का मुख्य कमरा। रात का पहर। प्रष्ठभूमी से दूर कुत्ते के भौंकने कि आवाज़ आ रही है। प्रकाश आता है। प्रमोद जी स्टेज के एक कोने से बाहर कि तरफ झांक रहे हैं, और निकेतन खाट पर बैठा बैठा सो रहा है।]

प्रमोदजी: कूलर चढ़ा रहे हैं अब ट्रक में। लंगड़े वाला ओवन चढ़ा रहा है।

[ इतने में निकेतन खाट पर पुरी तरह लमलेट हो जाता है। प्रमोद जी पलटते हैं और यह देखकर दौड़ते हुए उसके पास आते हैं, लात मार कर उसे उठाते हैं।]

प्रमोदजी: अबे उठ उल्लु के पठ्ठे.... यहाँ महौल्ले में लाइव चोरी चल रही है और तू घोड़े बेच के सो रहा है। उठ.... और सुन मैं क्या क्या बता रहा हूँ। सुबहा पुलीस पुछेगी तो काम आएगा।

निकेतन: [नींद में] पापा मैं ऑफिस जाउंगा सवेरे तो।

प्रमोदजी: अबे तू नहीं मैं बताउंगा.... ये लोग सोफा ले कर आ रहे हैं दरवाज़े से बाहर। फस गया सोफा, नहीं नहीं निकल आया। अब ट्रक में चढ़ा रहे हैं... भारी है यार काफ़ी।

निकेतन: पापा हम अभी ही क्यूं नहीं फ़ोन कर देते पुलीस को, सुबहा...

प्रमोदजी: नहीं..... पूरे महौल्ले कि नींद खराब होगी। और ऐसी चोरी भी कहाँ देखने को मिलती है रोज़ रोज़। लंगड़े वाला कुछ लेकर आया है अंदर से... ये तो नहाने का डब्बा लगता है शायद...

निकेतन: डब्बा?? डब्बा क्यूं चुराएगा कोई पापा? 

प्रमोदजी: अब भई मैं तो चोर हूँ नहीं, उससे पूछो... वापस अंदर गया। हाँ देखो दो बालटियां भी ले आया है, डब्बा ही था। येस।

निकेतन: पापा... मैं जा रहा हूँ अन्दर, सवेरे लेट हो जाउंगा दफ़्तर को।

[ निकेतन उठ कर भीतर चला जाता है। प्रमोदजी कुछ देर तक बाहर देखते हैं जिसके कुछ देर बाद ट्रक के शुरु होने आवाज़ आती है, कुत्ते भोंकते हैं। ट्रक कि आवाज़ धीमे से क्षीण हो जाती है। प्रमोदजी मुस्कुराते हुए अपने हाथ मसलते हैं और आकर अपनी खाट पर पसर जाते हैं।]

प्रकाश जाता है।

[ रिपोर्टर बाहर प्रस्थान करता है। प्रमोद जी बरामदे में बैठे हैं, साधना अंदर से चाय लेकर आती है।]
(निकेतन का पात्र निभाने वाला अभिनेता ही बहू साधना का पात्र भी निभा सकता है।)

प्रमोदजी: बेटा आज तो मूहं मीठा करा। खुश खबर है... आज तेरे ससुर ने नाम रौशन किया है।

साधना: क्या कर दिया पापा आपने? 

प्रमोदजी: रात चोरी हुई थी ना गुप्ता के घर, पुलिस तहकिकात कर रही थी। टी-वी न्युज़ वाले भी आए थे, अब किसी को कुछ पता ही नहीं था। अब पूरी चोरी मेरी तो आंखों देखी थी। तो बस उनके पुछ्ने कि देर थी। मैंने पूरा हाल, एक एक सामान गिनवा दिया। वो लोग बोल रहे थे शाम तक आ जाता है टी-वी पर... कौनसा चैनल है वो.. अअअअम्म्म... ख़बर.. 

साधना: (जूते पहनता है) ख़बर-पच्चीसी??? 8 नम्बर पे है। 

प्रमोदजी: हाँ हाँ वही.... लाल सा जो है। इस उल्लु के पट्ठे को बोल... कुछ सीखे अपने बाप से। यह फ़ायदा होता है पुलीस को ना बुलाने का। 

साधना: हाँ पापा आप सही कह रहे हैं, पर ये बस इसलिए कह रहे होंगे कि गुप्ता जी के साथ कोई अनहोनी ना हो जाए।

प्रमोदजी: अरे ये गुप्ता साला बड़ी सख्त जान है, कुछ नहीं होना था इसको..... उम्म वाह बहु.. चाय बहुत  बढ़िया बनी है। अरे ये टी-वी चैनर वाला आया था न अभी इंटरव्यू लेने, मैंने तो उसे भी कह दिया..... की मेरी बहु बिलकुल मेरे अपने बेटे जैसी है, बल्की उस्से भी ज़्यादा। यूं मान लो कि मेरी बहु, मेरा बेटा ही है।

साधना: जी.... लेकिन हाँ पापा ये लोग सब ठीक तो है ना.. फ़ैमिली वालों को तो कुछ नहीं हुआ ना?

प्रमोदजी: नहीं नहीं... शुक्र है। बेचारे पाचों लोगों को कुर्सी से बांध कर डकैती डाली है। खिड़की तोड़ कर घुस गए और बंदूक के ज़ोर पर धर लिया पुरे खानदान को। कोई राजकुमार चोर है....... सुबहा तक ऐसे के ऐसे ही बंधे रहे बेचारे सब। बरतन-भांड़े, बालटियां सब ले गए। यहाँ तक की नहाने का डब्बा तक नहीं छोड़ा। ये गुप्ते ने तो पेशाब भी पजामे में ही कर दिया, अभी सुबहा पुलीस आने के बाद गया है लैटरीन भी।

साधना: ट्च... चलो शुक्र है जान हानी तो नहीं हुई।
 
प्रमोदजी: इसलिए कहता हूँ इस उल्लु के पट्ठे को... कि खिड़की दरवाज़े देखकर बंद कर दिया कर पर दिमाग़ में घुसे तब ना.... हार-पीटकर इस बुढ्ढे आदमी को ही रोज़ रात बंद करनी पड़ती है खिड़कियां। बेटा इस उल्लु के साथ रह रह कर ना तेरी अक्ल पर भी पत्थर पड़ गए हैं कसम से, किसी को इस घर में परवाह नहीं है कि घर को सम्भालना है या नहीं.... बस एक मैं हूँ जो पगला रहा हूँ। घर में चाहे आग लग जाये....

साधना: (हसते हुए) ठीक है पापा, अब से कर दिया करुंगी।

[साधना कप लेकर अंदर जाती है। और एक अवरोधक बाहर से अंदर घुस आता है।]

प्रमोदजी: अरे अरे भाई कहाँ बड़े चले आ रहे हो? कौन.. हो कौन?

अवरोधक: राम राम चाचा जी, ये चिठ्ठी देनी थी... जयपाल सिंह जी आप ही हैं क्या? 

प्रमोदजी: नहीं भईया मैं तो मिस्टर प्रमोदजी शास्त्री हूँ। दिखाओ ज़रा... ये तो, कौन वो जज साब हैं ना हाई कोर्ट वाले जयपाल......

अवरोधक: हाँ जी हाँ जी वही हैं।

प्रमोदजी: हाँ तो ये तो बेटा दो गली छोड़ के रहते हैं आगे, मेन रोड़ के पास।

अवरोधक: अच्छा.... तीन दिन से ढूंढ रहा हूँ, अब जाकर मिला है। चलता हूँ।

प्रमोदजी: अच्छा सुनो...... क्या.. है क्या?

अवरोधक: उनकी बेटी की चिठ्ठी है।

प्रमोदजी: पर वो तो यहाँ नहीं रहती।

अवरोधक: तभी तो चिठ्ठी भेजी है।

प्रमोदजी: अच्छा हाँ... मेरी भी मत मारी... पर चिठ्ठी?? आजकल तो वो बट्सप फ़ेसबुक वगेहरा कर लेते हो ना तुम लोग। मैं तक नहीं भेजता चिट्ठी तो...

अवरोधक: अब पता नहीं चाचा जी क्या चक्कर है इनका... हम तो लिए फिर रहे हैं 3 दिन से। जाता हूँ अब राग ख़त्म करता हूँ इनका। अच्छा जी.. नमस्ते।

प्रमोदजी:  अच्छा बेटा.... ये दो गली छोड़ के सीधे हाथ पे ही है।

अवरोधक: ठीक है जी...

प्रमोदजी: और जज साब को मेरा नमस्ते कहना।
  
अवरोधक: हाँ जी ठीक है जी... नमस्ते।

प्रमोदजी:  नमस्ते नमस्ते....

[अवरोधक जाता है। कुछ देर बाद निकेतन बहुत खुश अंदर के कमरे से बाहर आता है, दफ़्तर जाने को तैय्यार है। उसे रोकते हुए प्रमोद जी बोलते हैं।]

प्रमोदजी: भीतर का पंखा बंद कर के आया है? 

निकेतन: अम्म्म्म... अभी आप जाओगे ना अंदर इसलिए...

प्रमोदजी: जा बन्द कर के आ...

निकेतन: कुछ देर तो चलता है पापा... दो मिनट कि बात है।

प्रमोदजी: जाता है या निकालुं चप्पल।

निकेतन: पापा......

[ प्रमोदजी चप्पल उठाने को नीचे झुकते हैं, निकेतन घबराकर अंदर दौड़ जाता है, फिर बाहर आ कर जूते पहनता है।]

प्रमोदजी: हाँ भई मिस्टर निकेतन, शाम को 5-6 बजे के करीब ख़बर देख लेना, ख़बर-पच्चीसी पर।

[ निकेतन सवालिया निगाह से देखता है।]

प्रमोदजी: हाँ.... तुम्हारा बाप आएगा आज टी-वी पर और इंटरवियू भी देगा। और सुनो देखना ज़रूर, तब तुम्हें पता चलेगा की गुप्ता घर चोरी कैसे हुई और क्यूं रोज़ बोलता हूँ की खिड़कीयां बंद कर लिया करो। क्या चाहते हो कि गुप्ता हमारे घर की चोरी का इंटरवियू दे कल को........

निकेतन: अरे पापा आप फिर शुरु हो गये भई.....

[ निकेतन पैर छूता है और बाहर कि ओर प्रस्थान करता है। प्रमोद जी पीछे से चिल्लाते रहते हैं।]

प्रमोदजी: और उल्लु के पट्ठे टाइम से घर आ जाना शाम को..... मिस्त्री लेते आना। इतनी देर से क्यूं आते हो पता नहीं। किसी दिन लूट लिए जाओगे रास्ते में तब बाप कि बात याद आएगी। ओए..... सुन रहा है। गया क्या?

प्रकाश जाता है।

प्रकाश आता है।

[ निकेतन दफ़्तर से घर वापस आता है। प्रमोद जी कुर्ता पहने खाट पर बैठे हैं।]

प्रमोदजी: आ गए बेटा....

निकेतन: हाँ पापा, नमस्ते।

प्रमोदजी: हाँ नमस्ते बेटा... आओ यहाँ बैठो। मेरा प्यारा बेटा। और आज ऑफिस में दिन कैसा रहा??

निकेतन: अच्छ... ठीक था पापा।

प्रमोदजी: अच्छा था... हम्म्। अरे आराम से टिक कर बैठो भई, ये सब तुम्हारा ही तो है।

निकेतन: जी.... कुछ बात है क्या पापा?

प्रमोदजी: हाँ बात तो है... पर उससे पहले ये बताओ कि मिस्त्री को बुलाया या नहीं, सुबहा भी बोला था मैंने।

निकेतन: हाँ मुझे याद है पापा... दो बार बोल कर आ चुका हूँ पर अब इन लोगों का मालूम तो है आपको।

प्रमोदजी: आज गए थे या नहीं??

निकेतन: (सोचते हुए) वो...... अअअअ... नहीं आज तो भूल गया।

प्रमोदजी: भूल गए। अच्छा....

निकेतन: पापा यही बात करने के लिए मुझे बैठाया है, जाते वक़्त भी यही बात और अब आने पर भी।

प्रमोदजी: नहीं नहीं बात ये नहीं है।

निकेतन: तो फिर क्या बात है।

प्रमोदजी: (प्रमोदजी जेब से कागज़ मे लिपटी दो रोटियां निकाल कर मेज़ पर रखते हैं।) ये बात है।

[ निकेतन हारकर अपना माथा पीटता है और प्रेक्षकों कि ओर मुड़ता है।]

निकेतन: हे मेरे भगवान। देख रहे हैं आप लोग। क्या करूं इनका मैं.......

प्रमोदजी: अबे तू उनको क्या दिखा रहा है, इधर देख।

निकेतन: (चौंककर) क्या.... (नीवु अवरन्ना नोड़ बहुदा) [कन्नड़ में] आप आप आप इनको देख सकते हैं पापा?

प्रमोदजी: हाँ तो इनको देखने में क्या बड़ी बात है।

निकेतन: मतलब आप पूरा समय इनको देख सकते थे।

प्रमोदजी: हाँ उल्लू के पठ्ठे........ जो सब तू देख सुन सकता है, वो सब मैं देख सुन चुका हूँ। भूल मत मैं तेरा बाप हूँ।

निकेतन: तो फिर आप ही बताइए इनको कि ये सब क्या है।

प्रमोदजी: रोटीयां हैं वो भी मुझसे छिपा कर रखी हुई। ये होता है एक बुड्ढे के साथ उसके अपने ही घर में, देख रहे हैं आप लोग।

निकेतन: नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है जैसा आप सोच रहे हैं। आप पूरी बात बताइये ना......

प्रमोदजी: क्या बात... यही सच है कि तुम लोग मुझसे रोटीयां छिपाते हो।

निकेतन: पर पूरा सच नहीं है, मैं आप लोगों को असल बात बताता हूँ। पिछले कुछ दिनों से एक ये नयी आदत पाल लिए हैं.. रोटी को मीस-मीस कर बरामदे में डाल देते हैं ताकि चिड़िया आकर खा ले।

प्रमोदजी: तो इसमें क्या बुरा करते हैं।

निकेतन: कुछ बुरा नहीं करते।  बुरा वो है जो आप हमारे साथ करते हैं।

प्रमोदजी: क्या करते हैं?

नकेतन: भई हमें क्या दिक्कत है, खिलाना है सो खिलाएं रोटी। पर इसमें भी फजीहत खड़ी होने लगी। एक से ज़्यादा रोटी बचे तो इतनी सारी रोटियां क्यूं बरबाद हो रहीं हैं, और अगर एक भी ना बचे तो ये कि चिड़ीया को डालने को रोटी नहीं बचती। अब बताइये साहब, इसका कोई इलाज है।

प्रमोदजी: है कैसे नहीं... गिन कर रोटियां क्यूं नहीं बनती। आटा मुफ़्त नहीं आता। और मुद्दा ये नहीं है। मुद्दा तो यह है कि आखिर मुझसे रोटियां छिपा कर क्यूं रखी गईं।

निकेतन: आपको तो मीन-मेख निकालनी ही है न पापा। (प्रेक्षकों से) तो रोज़ कि झायं-झायं हारकर मैंने ही साधना से कहा कि एक रोटी को छोड़ कर बाक़ि फ़्रिज में छिपा कर रख दिया करे। पर इनकी नज़रों से कहाँ कुछ छिपने वाला है।

निकेतन: और छिपेगा भी नहीं........नहीं........ करो बरबाद जितना करना है। पेट काट काट कर मैंने ग्रहस्थी जोड़ी है। उड़ाओ सब मिलकर। फूंक डालो सब.... हम तो चले अपनी चिड़ीयों को रोटियां डालने।

[ प्रमोद जी बाहर जाने लगते हैं, तब ही बॉस का प्रवेश।]

बॉस: नमस्ते चाचा जी... 

प्रमोदजी: कौन चाचा जी भई? मेरा तो कोई भतीजा है नहीं। कौन.. हो कौन? कहाँ बढ़े चले आ रहे हो?

बॉस: जी मैं...

निकेतन: बॉस... आईये आईये। पापा ये मेरे बॉस हैं। बताया था न मैंने आपको। रामअवतार जी। 

प्रमोदजी: ओह... अच्छा... बॉस... हम्म।

निकेतन: एंड बॉस ये हैं मेरे पा.. मतलब डैडी, प्रमोदजी शास्त्री। 

प्रमोदजी: श्री..

निकेतन: श्री.. प्रमोदजी शास्त्री।

बॉस: नमस्ते जी।

प्रमोदजी: नमस्ते। पहली बार आए हैं... बैठीए।

निकेतन: आइये बॉस। कुछ देर हो गयी आपको आते... ट्रैफिक वगेहरा था क्या ज़्यादा?

बॉस: हाँ...अब इस समय ट्रैफ़िक का रश तो तुम जानते ही हो। और भला हर कोई तुम्हारी तरह समय का पाबंद थोड़े ही होता है।

निकेतन: अरे बॉस आप भी न...

बॉस: आई मस्ट टैल यू चाचा जी... आई मीन अंकल जी। आपका बेटा बड़ा होनहार है। सुबह जल्दी आता है और देर तक रुक कर काम करता है।

प्रमोदजी: करता होगा.... पर हम कैसे मान लें। घर में तो ये एक झूठा बर्तन तक उठा के नहीं रखता। नालाय....

निकेतन: हा हा हा... मज़ाक। मज़ाक कर रहे है डैडी। बड़े ही हसमुख मिज़ाज के हैं हमेशा से।

प्रमोदजी: नहीं.. सच में...

निकेतन: (काटते हुए) कहिए बॉस कुछ चाय ठंडा कुछ लेंगें आप।

बॉस: भई डिनर पर बुलाया है तुमने, तो डीनर ही लेंगे सीधा अब। टाइम भी हो गया है काफ़ी।

निकेतन: हाँ तो अभी लगवाते हैं बस,आइये आप बैठिए।

प्रमोदजी: आओ आओ बेटा... बैठो। बहुत कुछ देखना है अभी तो तुमको।

निकेतन: हाहाहा... मज़ाक कर रहे है। साधना, मम्मी जी।

[ निकेतन भीतर जाता है।]

प्रमोदजी: और कहो बेटा... काम धन्दा ठीक सब।

बॉस: बस अंकल जी... आप लोगों की दुआ से चल रही है कम्पनी।

प्रमोदजी: कम्पनी... पर तुम्हारी तो किराने की दूकान है ना?

बॉस: अरे नहीं नहीं अंकल जी, क्या बात कर रहे हैं आप। एक्स्पोर्ट फर्म है पूरी, दुकान क्यूँ होगी।

प्रमोदजी: अच्छा... भई हमें क्या मालुम। ये लड़का हमें कुछ बताए तब तो.... ख़ैर बेटा और बताओ कुछ लेते हो दवाई खाने के बाद या..

बॉस: दवाई??

प्रमोदजी: मतलब थोड़ा लिटिल लिटिल, खुश होने को?

बॉस: अरे नहीं नहीं जी मैं कहाँ...

प्रमोदजी: नहीं नहीं फिर भी थोड़ा बहुत।

बॉस: नहीं नहीं अंकल जी मैं तो छूता भी नहीं।

प्रमोदजी: थोड़ा तो... हल्का फुल्का।

बॉस: अरे आप तो फ़ोर्स कर रहे हैं।

प्रमोदजी: ठीक है तो नहीं करते फ़ोर्स। न सही..

बॉस: नहीं पर अब तो फ़ोर्स कर दिया न आपने... तो थोड़ा बहुत लिटिल लिटल।

प्रमोदजी: हाहा अरे वाह..

[ निकेतन और सास खाना लेकर अंदर से आते हैं।]

निकेतन: लीजिए बॉस डीनर हाज़िर है।

बॉस: हाँ... अच्छा ये निकेतन की माताजी हैं।

निकेतन: नहीं नहीं ये मेरी सासु माँ हैं। साधना की मम्मी।

बॉस: अच्छा... मुझे लगा

प्रमोदजी: हां कोई बात नहीं, अक्सर लगता है ऐसा लोगों को।

बॉस: जी.. नमस्ते माँ जी।

सास: नमस्ते जी। लीजिए शुरू कीजिये, ठंडा हो रहा 
है खाना।

बॉस: हाँ अरे अंकल जी लीजिए ना आपने तो एक भी रोटी नहीं ली।

प्रमोदजी: मेरी रोटिया तो हैं मेरे पास पहले ही। क्यों...

बॉस: क्या... 

निकेतन:  कुछ नहीं.. मज़ाक कर रहे हैं। ऐसे ही..

बॉस: अच्छा.. हाँ भई निकेतन... तुम्हारी वाइफ़ नज़र नहीं आ रही, कहाँ छिपा कर रखा है। शादी में भी नहीं बुलाया, सुना है बड़ी सुन्दर मिसस लाए हो।

निकेतन: हाँ सुन्दर तो है ही...अंदर ही है, वो खाने वाने में थोड़ा लगी हुई है।

बॉस: अच्छा.. आ जाओ तुम भी बैठ ही जाओ साथ ही खा लो। 

निकेतन: हाँ... अब, बैठ ही लेता हूँ।

प्रमोदजी: क्या बैठ ही लेता हूँ। निकम्मे ही रहोगे क्या जीवन भर, तुम्हारे बॉस पहली बार घर आये हैं, जाओ कुड़ेराम की दुकान से पनीर वाली जलेबी लेकर आओ। जाओ।

निकेतन: पर वो तो बहुत दूर है पापा...

प्रमोदजी: हाँ तो मोटरसाइकिल पे बैठो और लेकर आओ फ़टाफ़ट। जाओ दौड़ जाओ।

बॉस: अरे नहीं अंकल जी उसकी कोई ज़रूरत नहीं...

प्रमोदजी: ज़रूरत है कैसे नहीं भई, ज़रूरत है। अच्छा आते समय साथ में मूँगफली और वो खट्टी-मीठी नमकीन के दो चार पैकेट भी लेते आना।

निकेतन: वो.. वो क्यूँ??

प्रमोदजी: क्यूँ क्या क्यूँ, यूँ ही बस...

निकेतन: नहीं पापा, मैं नहीं जाऊंगा।

[ प्रमोदजी चप्पल उठाने के लिए झुकते हैं।]

निकेतन: जा रहा हूँ पापा, जा रा हूँ।

[ निकेतन बाहर जाता है।]

प्रमोदजी: खाओ खाओ तुम क्यों रुक गए बेटा।

बॉस: जी।

प्रकाश जाकर आता है।

बॉस: ओम् भोले.... बस जी बस अंकल जी। खाना बहुत बढ़िया था। मज़ा आ गया।

प्रमोदजी: बेटा खाने से ही पेट भर लिया या थोड़ी जगह छोड़ी है।

बॉस: अरे अंकल जी आप कहें और हम न सुने। 

प्रमोदजी: हाँ तो आओ बेटा। थोड़ा खुश होना तो बनता ही है जीवन में।

बॉस: जी, इंसान दुनिया में आया ही खुश रहने है। 

प्रमोदजी: हाँ तो बेटा जी, आपकी फैमिली में कौन कौन है?

बॉस: जी मैं हूँ, एक नौकर है, एक ही बीवी है, और 7 लड़कियां हैं।

प्रमोदजी: (चौंक कर) सात... मेरा मतलब भाग्यशाली हो। जो बेटियों का सुख मिला है। वो भी सात सात। वरना बुढ़ापे में क्या बीतती है एक बुड्ढे पर मैं ही जानता हूँ। क्या क्या टॉर्चर सहने पड़ते हैं इन बेटों के बेटा। पर तुम लकी हो। 

बॉस: हाँ.. मेरे पिताजी भी यही कहा करते थे मुझे। बाद में जब मेरी बेटियां हुईं तब मुझे एहसास हुआ अंकल जी।

प्रमोदजी: अरे अंकल नहीं, तुम मेरे बेटे जैसे हो बेटा। चाचा जी कहो।

बॉस: चाचा जी.. आपका बेटा तो बहुत बढ़िया है चाचा जी। इतना होनहार लड़का मैंने आजतक नहीं देखा। ऑफिस का सारा काम पलक झपकते ही चुटकियो में कर देता है।

प्रमोदजी: क्या बात कर रहे हो?

बॉस: अजी बिलकुल। सारे एकाउंट्स खुद संभाल लेता है, सबको चाय बना बना कर पिलाता है, छत के सारे जाले उतार देता है। परसो बारिश हुई थी तो पानी जमा हो गया था, जो हाथ में पन्नी पहन के जो मोरी यांखोली है उसने, जवाब नहीं। 

प्रमोदजी: अच्छा???

बॉस: हाँ चाचा जी। और अंधे की तो क्या एक्टिंग करता है, सबका मन लगा रहता है ऑफिस में। और इसलिए मैंने उसको प्रमोशन देने का फ़ैसला लिया है। ये देखिये (प्रमोशन लैटर देता है।), नाओ ही विल बी मैनेजर।

प्रमोदजी: नहीं बेटे नहीं, ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो।

बॉस: क्यूँ चाचा जी??

प्रमोदजी: बेटे तुम उसके बॉस ज़रूर हो पर बाप तो उसका मैं ही हूँ ना। मेरा बेटा एक नंबर का कामचोर है, निकम्मा। घर में एक काम नहीं करता। अरे अपने ही बाप से उसी के घर में रोटि यां छिपाता है तो सोचो मैनेजर बनते ही वो तुमसे क्या क्या छिपाएगा। कितने अकाउंट्स की डिटेल्स मिल पाएगी तुम्हें ये भगवान ही जाने। उसका अभी ये हाल है तो न जाने प्रोमोशन मिलने पर उसका दिमाग कौन से आसमान पर चढ़ जाएगा।

बॉस: क्या कह रहे हैं चाचाजी?

प्रमोदजी: हाँ बेटे। तूने मुझे चाचा जी कहा है तो मैं तेरा ऐसे नुकसान नहीं होने दूंगा। भले ही वो मेरा अपना बेटा है पर उसे प्रोमोशन देकर तुम उसका और अपना दोनों का नुकसान कर रहे हो। हाँ बस उसे नौकरी से मत निकालना, घर पर भी क्या ही करेगा वो निकम्मा।

बॉस: चाचाजी आज आपने मेरी आँखे खोल दी। मेरा इतना नुकसान होने से बचा लिया। आप जैसा महान आदमी पुरे अन्तरालपुर में दूसरा नहीं होगा। ग्रेट हो आप। [ निकेतन जलेबी लिए आता है।] लीजिए निकेतन भी आ गया।

निकेतन: बॉस... ये लीजिए मेरे हाथ से जलेबी खाइये।

बॉस: निकेतन तुम एक महान आदमी के बेटे हो। वाह। मैंने सोचा था तुम्हे आज मैं प्रमोशन दे ही दूंगा पर नहीं, तुम्हारे अपने भले के लिए मैं आज तुम्हे डिमोट करता हूँ। 

निकेतन: क्या... पर क्यूँ। बॉस।

बॉस: चलता हूँ। कल टाइम से ऑफिस आ जाना। एंड योर फादर इस अ ग्रेट मैन... ग्रेट। चलता हूं चाचा जी नमस्ते। 

प्रमोदजी: नमस्ते।

बॉस: ग्रेट मैन। ग्रेट।

[बॉस चला जाता है।]

निकेतन: ये क्या किया आपने? क्या पट्टी पढ़ा दी उन्हें।

प्रमोदजी: हमने कुछ नहीं किया, सब तुम्हारे कर्मों का फल है। और छिपाओ बाप से रोटी।

निकेतन: ओह.. तो आप बदला लेंगे अब।

प्रमोदजी:  हम बदला नहीं दण्ड देते हैं। घर में तुमसे एक टूंटी ठीक नहीं होती, बाहर मोरियां खोल रहे हो। मरो सालो। हमें क्या... हम तो चले अपनी चिड़ियों को रोटी डालने।

निकेतन: (प्रेक्षकों से) देख रहें हैं आप........ अजब अजब आदतें पाल ली हैं। घर में दो दो कूलर हैं पर यहाँ गर्मी में खाट पर पड़े रहेंगे। कपड़े लत्ते कोई कमी नहीं है पर नंगे बदन पूरा बाज़ार डोल आएंगे। अभी पहले सीन से नंगे बदन बाहर निकले हुए हैं, पता नहीं कहाँ गए हैं। आपको याद है या भूल गए। लिजीए आ गए....

[ प्रमोद जी नंगे बदन बाहर से प्रवेश करते हैं। हाथ में छोटी सी डिबीया पकड़े हैं।]

निकेतन: पापा आप फिर बिन कपड़ों के बाहर चले गए, और ये क्या ले आए हैं?

प्रमोदजी: एम-सील है, तुमसे तो मिस्त्री बुलाया नहीं जाएगा। हम ही कुछ कर लें।

[ बोलते हुए प्रमोद जी सीधे अंदर चले जाते हैं। निकेतन फिर प्रेक्षकों की ओर देखता है और अंदर से आती आवाज़ों को सुनता रहता है।]

निकेतन: वैसे बात चली ही है तो आपको बता दूं कि अपने नंगे बदन घुमने की हमारे पिताजी... गांधी जी से तुलना करते हैं। विशवास नहीं होता??? पर यही सच है। कहते हैं गांधी जी भी तो लंगोटी पहनते थे, वही पहने-पहने विलायत गए थे, वही पहन कर वहाँ के राजा के साथ खाना खाया था। उनपर तो किसी ने उंगली नहीं उठाई। अब कर लो बहस....

[ अंदर से प्रमोद जी के गिरने और कराहने की आवाज़ आती है। निकेतन भाग कर अंदर जाता है। कुछ देर संगीत सुनाई देता है, जिसके कुछ देर बाद निकेतन परेशान सा बाहर आता है।]

निकेतन: स्टूल लेकर घुस गए बाथरूम की टंकी ठीक करने... नास जाए इस एम-सील का, स्टूल पर से पैर फिसल गया। एक्स-रे में पता चला कूल्हे की हड्डी टूट गई है। 3 दिन से अस्पताल में पड़े हैं। ऑपरेशन कराना पड़ेगा। लोहे की रॉड़ डाली जाएगी तब जाकर चलने फिरने लायक होंगे। लाख रुपये का लटका है। ऑफिस की क्रेडिट सोसाइटी और पी.एफ दोनों में लोन के लिए अप्लाई कर दिया है। मिला तो ठीक वरना साधना के ज़ेवर बेचने पड़ेंगे। बेचूंगा। अब भई जैसे भी हैं, हैं तो मेरे ही पापा। और बाप तो बस एक ही होता है। नमस्कार।

[ प्रकाश जाता है। ]


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