Purushottam
पुरुषोत्तम
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लेखक का आग्रह- प्रस्तुत नाटक जो आपके सामने प्रत्यक्ष रूप से आने वाला है, वह एक कल्पित लेखन की रचना है। इसकी मूल-कथा, रामायण के उत्तर-काण्ड, पद्म पुराण और अन्य कुछ लोकोक्तियों से प्रेरित है, जिसे लिखने और करने का एकमात्र कारण, श्री राम के अंतिम दिनों और उनके वैकुंठ लौटने के प्रसंग के बारे में, आज के प्रेक्षकों, विशेषकर बच्चों को अवगत कराना है। मंच कि नाटकीयता और ईक्कीस्वी सदी के दर्शकों को ध्यान में रखते हुए, हमने नाटक को जितना हो सके चमत्कार और धार्मिकता से दूर रखने का प्रयास किया है, पर साथ ही इस बात पर भी विशेष ध्यान दिया गया है कि तथ्यों और किसी के धार्मिक मनोविचार को ठेस न पहुंचे। तिस पर भी कोई चूक यदि कहीं रह गयी हो तो उसका हमें खेद है। हम अवश्य ही उसका सुधार करना चाहेंगे। धन्यवाद।
पात्र सुची
शम्बूक
42 - 45 वर्षीय श्री राम
65 - 70 वर्षीय श्री राम
राजकुमार
कुश
कालदेव
सेवक
उत्तर
लक्ष्मण
हनुमान
ऋषि
दुर्वासा
नागराज
वासुकी
राजकुमार लव
परिवारगण, अयोध्या की प्रजा व अन्य सेवक
आमुख
शैवल पर्बत; सरोवर; सांझ
[ जंगल के भीतर से कुछ ढूंढते हुए, शिकारी के वेश में कई दिन के थके- प्यासे, कुछ 40 - 45 वर्षीय श्री राम मंच पर प्रवेश करते हैं। सरोवर के ठीक उप्पर एक पेड़ से उल्टे लटके शूद्र संत शम्बूक घोर तपस्या में विलीन हैं। राम कुछ क्षण उन्हें देखते हैं तत्पश्चात सरोवर में धीरे से प्रवेश कर उनकी ओर बढ़ते हैं। ]
राम- बहुत उत्तम तप का पालन करते हैं तापस। आँखे खोलिये, मैं दशरथ कुमार रामचन्द्र इक्ष्वकु, आपका नरेश आपके समक्ष खड़ा हूँ।
[ शम्बूक अपनी आँखे खोलते हैं। ]
राम- आपका परिचय दीजिये।
[ मौन ]
राम- आप शायद मेरी बात सुन नहीं सके, अपना परिचय दीजिये?
शम्बूक- हमारी भेंट पहले भी हो चुकी है भगवन् , पर इस तुच्छ मनुष्य को याद रखना राज पुरुषों के लिए उतना आवश्यक नहीं।
राम- मेरे लिए अभी कौशल में शांति बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण है, किसी भी दुराचारी तपस्वी को याद रखने से अधिक। मेरे प्रश्नों का उत्तर दीजिये, तत्पश्चात हम अवश्य आगे बढ़ेंगे।
शम्बूक- मैं शम्बूक हूँ भगवन्। एक साधारण सा तपस्वी, अध्यनकर्ता, भिक्षुक। नाम व परिचय में समय न गवाएं नरेश, आप जिस कारज से यहाँ आए हैं उसे पूर्ण कीजिये। वह आपका धर्म है।
राम- हे शम्बूक, सर्वज्ञानी... आपके इस घोर तप ने एक निस्सहाय बालक के प्राण हर लिए, यह जानते हैं आप? एक पिता से उसका पुत्र छिन गया, धर्म और वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध आपका यह अध्ययन सबको ले डूबेगा, यह जानते हैं?
शम्बूक- वर्ण निर्धारण तो मेरे जन्म से हुआ, उसमें मेरा कोई हाथ नहीं और मेरा धर्म आपकी दृष्टि में भला या बुरा, ऊँचा या नीचा हो सकता है। मेरे कर्म ने मेरे दीन बदले। जन्म से जो कुछ मेरे पास न था उसे मैं अपने अध्ययन से, अपने ज्ञान से अर्जित कर पाया। क्या यह अनुचित था? कहिए?
राम- मैं क्या सोचता हूँ शम्बूक उससे कुछ नहीं बदलने वाला। मैं चाहे यह भी समझ लूँ की ज्ञान अर्जित कर अपने दीन सुधारना बिल्कुल ठीक है, होगा... पर आपके लिए नहीं। कम से कम यह धर्म के नीतिगत नहीं।
शम्बूक- तो फिर किस असमंजस में हैं आप?
राम- आपके सारे दोष आपको बता देना चाहता हूँ।
शम्बूक- आप बस अपने मन को ग्लानि मुक्त करना चाहते हैं। राजा और राम के बीच उलझ गए हैं नरेश?
राम- चित का भान करने में कुशल हैं आप। मानसिकता और वाचिका से आप किसी ब्राह्मण से कम नहीं। तो क्यों यह तप कर रहे हैं। अब क्या पाना है आपको?
शम्बूक- सर्वस्व ... मोक्ष.... ज्ञान.... हर वो वस्तु जो एक साधारण मनुष्य होते हुए मैं पा सकता हूँ और यही ज्ञान मैंने अपने सभी शिष्यों के साथ भी बाटा है।
राम- जीते जी भगवान बनना चाहते हैं आप? भूल कर रहे हैं। किसी श्राप से कम नहीं यह, मानिए मेरी बात।
शम्बूक- मानता हूँ। आपका द्वंद्व देखा है मैंने.... भगवन्।
राम- (व्यंग से) कटाक्ष! मेरा उपहास कर रहे हैं? शास्त्रों से सीखा है यह भी?
शम्बूक- नहीं... और भगवान होने की भी मेरी कोई इच्छा नहीं।
राम- फिर क्यों?
शम्बूक- आप जानते हैं मेरे गुरुकुल में क्या शिक्षा दी जाती है?
राम- हम्म..
शम्बूक- तब तो आप समझ ही गए होंगे कि उस निरपराध बालक के प्राण जाने में मेरा कितना हाथ है?
राम- क्या मतलब??
शम्बूक- भगवन् मेरे साथी मेरे शिष्य बचपन से हर भोग विलास माया से वंचित रहे हैं। भूख क्या है, इसको पहचानते हैं वे।
राम- तो?
शम्बूक- तो वह सभी ज्ञान और कार्य निष्ठा का महत्व जानते हैं। उन ब्राह्मण पुजारियों की भांति वह मुँह मांगी रकम नहीं माँगते और ना ही अपने वर्ण और सामाजिक प्रतिष्ठा के मद में घमण्ड से चूर रहते हैं। सही ढंग और दाम में अपना काम करते हैं। उस बच्चे की मृत्यु का असल कारण तो वस्तुतः उसके पिता का अपना कपट स्वयं रहा।
राम- समाज की दृष्टि में आपने उनका काम, उनका अन्न छीना है, जो नीतिगत नहीं। व्यवस्था आपको यह काम करने की अनुमति नहीं देती।
शम्बूक- शस्त्र चलाना हम सीख नहीं सकते, शास्त्र हमारी ढाल बना। अपनी अभागी नियति का दोष भी पुराने पाप बता कर हम पर ही डाल दिया गया। एक अच्छा जीवन जीने का दूसरा और कोई राह थी ही कहाँ! परिश्रम कर एक अच्छा जीवन बनाना क्या एक मनुष्य का अधिकार नहीं?
राम- जिसे आप अधिकार बता रहे हैं, उसे वह चोरी कह रहे हैं।
शम्बूक- चोरी! ज्ञान कब से किसी के अधीन हो गया?
राम- किसी का उचित अधिकार छीनना चोरी ही होता है।
शम्बूक- और हमारे मानवीय अधिकारों का क्या?
राम- आप भलीभांति जानते हैं कि तप और शास्त्र अध्ययन आपके अधिकारों में नहीं।
शम्बूक- या एक अंतिम रास्ता भर, मनुष्य की भांति जीने का... या जानवर बने रहें, और कब तक?
राम- सम्भवतः इस युग में तो नहीं.... मेरे राजा होते तो नहीं...
शम्बूक- अपना राजधर्म निभाइये प्रभु... यह वार्ता कभी समाप्त नहीं होने वाली।
राम- तो कह दीजिये... मैं अयोध्या नरेश दशरथ पुत्र राम आपसे पूछ रहा हूँ... हे तापस शम्बूक, क्या वर्ण है आपका? बताओ की तुम ब्राह्मण हो या अजेय क्षत्रिय? तीसरे वर्ण के वैश्य हो या शुद्र हो? कौन जात हो?
शम्बूक- मैं तप में हूँ भगवन् झूठ नहीं बोलूँगा। आप मुझे शुद्र...
[ शम्बूक बोल ही रहे होते हैं तभी राम आगे बढ़ कर उसका शिर काटकर धड़ से अलग कर देते हैं। धीरे से प्रकाश जाता है। ]
दृश्य एक
सीतामढ़ी ; भोर से कुछ पहले कि घटिका
[ अंधेरे
में श्री राम की आवाज़, जो विलाप करती हुई देवी सीता को रुक जाने
के लिए कह रही है।
"राम- सीते.. नहीं सीते, रुको। सीते मत जाओ... रुक जाओ सीते,
मुझे क्षमा
कर दो। मैं विवश था सीता... नहीं, मत जाओ, रुको... सुनो सीते सीते सीते....."।
लगभग
65-70 वर्ष के वृद्ध राम पहले
से मंच पर खड़े हैं, धीरे से
प्रकाश आता है। कुछ देर वे यूँ हीं अपने सामने सीतामढ़ी स्थित देवी सीता की समाधी को एकटक देखते रहते हैं, जिसके कुछ क्षण उपरांत उनके
पुत्र कुश का प्रवेश। ]
कुश- पिताजी।
राम- (जैसे स्वप्न से बाहर आते हुए) हंह...
कुश- ठीक हैं?
राम- हाँ हाँ बिल्कुल, मुझे क्या...
कुश- यह तो आप स्वयं ही जानें, कल सवेरे से आप यहीं खड़े हैं, बिलकुल इसी स्थान पर। ठीक कैसे हैं? (राम चुप खड़े रहते हैं) चलिए, घर लौट चलिए। महल में सब चिंतित हो रहे हैं। आइये..
राम- (मुस्कुराकर) और सबसे अधिक तुम... (कुश चुप खड़ा रहता है) ठीक हूँ मैं, तुम अकारण ही चिंतित हो रहे हो बेटा। ठीक हूँ।
कुश- तो चलिए महल की ओर प्रस्थान कीजिये, चलिए जल्दी।
राम- तुम चलो मैं आता..
कुश- आता हूँ नहीं पिताजी, आप अभी मेरे साथ चलिए, मैं और नहीं सुनना चाहता, आइये। कुछ खाया भी नहीं है आपने, और सर्दी भी हो चली है, आइये...
राम- मैं बस कुछ समय में आता हूँ, ठीक तुम्हारे पीछे ही..
कुश- नहीं..
राम- मान जाओ बेटा। मैं आता हूँ, तुम चलो, मैं आया।
कुश- हमें पर्सों वाली सभा के लिये मंत्री जी के पास भी जाना है, मैं सवेरे सीधा उनसे ही मिलूँगा। दो सेवक यहीं छोड़े जा रहा हूँ, और सब पहले ही महल लौट चुके हैं।
[ कुश समाधी को नमन कर बाहर जाने लगता है, तभी बाहर की ओर देखकर कुछ स्मरण होने पर पुनः वापस लौटता है। ]
कुश-
पिताजी, बाहर एक मुनी आए हैं, आपसे मिलना चाहते हैं। कौशल के तो नहीं लगते, पहले
यहाँ कभी उन्हें देखा नहीं है। आप उनसे एक बार मिल लीजिये। वे भी कल सांयकाल से ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
[ राम उन्हें भीतर भेजने का संकेत कर वापस ध्यान मग्न हो जाते हैं। कुश का प्रस्थान। कुछ क्षण उपरांत मुनी वेष में कालदेव का आगमन। ]
कालदेव- लौटने का समय आ गया है प्रभु।
राम- (पलटते हुए) प्रणाम मुनीवर, जी मैं आपका प्रसंग समझा नहीं?
कालदेव- मृत्यूलोक पर आपका कर्मकाल पूर्ण हुआ, वैकुण्ठ आपकी राह देख रहा है।
राम- आप?? (पहचानते हुए) ओह.. क्षमा कीजिये देव, मैं आपको पहचान नहीं पाया।
कालदेव-
क्षमा मांगने की कोई अवश्यकता नहीं है प्रभु। आप जिस सोद्देश्य से आए थे उसकी
स्थापना हो चुकी है। त्रेतायुग जाने को है और साथ ही आपके भी यहाँ से वापस चलने का समय आ गया है।
[ कुछ देर का मौन। ]
राम- तो यह सच ही निकला।
कालदेव- जी।
राम- मुझे अचरज नहीं होना चाहिए पर हो रहा है। आप स्वयं आ गए, मैं खुद भी कुछ समय से इस बारे में सोच रहा था।
कालदेव- तब विलम्ब कैसा प्रभु।
राम- मेरे कुछ कार्य अभी भी शेष रह गए हैं देव। आप शायद उन्हें मेरे इस मनुष्य स्वरूप का अनुबंध माने पर मेरे लिए वह सब निःशेष करना अत्यावश्यक है।
कालदेव- अब और क्या कार्य शेष हैं?
राम- मेरी प्रजा देव। मैं राजा हूँ, मेरी प्रजा मेरा परिवार है। मेरे भाई, मेरे पुत्र... लक्ष्मण। उसका जीवन तो मेरे बिना छूछा(रिक्त) हो जाएगा। और हनुमान, जब तलक हनुमान धरातल पर सावधान है, तब तक यम मुझे पृथ्वी के इस पृष्ठ से नहीं ले जा सकेंगे। विश्वास कीजिये बहुत से प्रयत्न हो चुके हैं।
कालदेव- (मुस्कुराकर) मुझे ज्ञात है प्रभु।
राम- तो आप समझ रहे हैं मैं क्या कहना चाह रहा हूँ।
कालदेव- जी... (मौन)। आप और आपके तीनों भाई एक सुत्र से बंधे है रघुवर। आप संसार में साथ आए थे और जाने की अवधी भी संजोगवश एक ही साथ कि है। भरत और शत्रुघ्न आपके बिल्कुल पश्चात ही प्रस्थान करेंगे पर प्रभु लक्ष्मण को आपसे पहले जाना है।
राम- क्यूँ?
कालदेव- यही विधान है। प्रभु लक्ष्मण और हनुमान इस बात को समझ जाएं, बस अब यही उपाए हमें करना होगा।
राम- कैसा उपाए?
कालदेव- इसके लिए एक युक्ति है मेरे पास प्रभु, पर आपको बहुत धीरज धरना होगा, यह कार्य सरल नहीं होने वाला।
राम- मनुष्य जीवन सरल होता ही नहीं देव।
कालदेव- यह तो आप अधिक जानेंगे नरेश।
राम- तो क्या योजना है बताईये?
कालदेव- एक गुप्त बैठक रखनी होगी, जिसमें मैं आप और पवन पुत्र हनुमान सम्मिलित होंगे। प्रभु लक्ष्मण से आपको बस यह वचन लेना होगा, की कक्ष के बाहर तैनात रहकर, वे इस गोष्ठी का रक्षण करें। यद्यपि कोई भी आपकी अनुमती बिना कक्ष के भीतर आया तो उस जीव को मृत्युदंड भोगना होगा। बस यही करना है।
राम- मैं कुछ समझा नहीं?
कालदेव- लक्ष्मण इस वचन का उल्लंघन करेंगे रघुवर।
राम- अवश्य ही आप मेरे भाई लक्ष्मण से परिचित नहीं हैं, वह कभी मेरा वचन नहीं तोड़ेगा।
कालदेव- परिस्तिथियां प्रभु, परिस्तिथियां मनुष्य से हर वो कार्य करा देतीं हैं, जो वह नहीं करना चाहता।
राम- और हनुमान?
कालदेव- परिस्तिथियां। अभी हम महल की ओर प्रस्थान करते हैं, मैं आपको यात्रा में सारी बात समझाता हूँ।
राम-
चलिए।
[ नेपथ्य में गीत भोर भयी शुरु होता है। श्री राम और कालदेव का प्रस्थान। धीरे से प्रकाश जाता है। ]
दृश्य दो
अयोध्या, राजमहल का एक कक्ष; भोर
[ श्री राम और कालदेव महल के एक कक्ष में प्रवेश करते हैं। ]
राम- स्थान ग्रहण करें देव। आप कुछ भोजन आदि, (सेवक हो पुकारते हैं) उत्तर..
कालदेव-
नहीं नहीं प्रभु, भोजन की
आवश्यकता नहीं...
[ सेवक उत्तर का प्रवेश। ]
उत्तर- भगवन्
राम- लक्ष्मण और हनुमान को तुरंत मेरे पास आने के लिए कहिये। किसी और को बताने की आवश्यकता नहीं है, तुम स्वयं जाना और...
उत्तर- जी भगवन् (जाने लगता है)
राम- और सुनो
उत्तर- (हड़बड़ा कर रुकता है) जी...
राम- भई बड़ी जल्दी में रहते हो। अतिथि के लिए विश्राम की भी कुछ व्यवस्था करो।
उत्तर- जी भगवन्।
राम-
जाओ।
[ उत्तर का प्रस्थान। राम कक्ष के एक कोने में जाते हैं और अपनी एक अँगूठी उतार कर तल में बनी एक विच्छेद (दरार) में गिरा देते हैं।
राम- यह लीजिए देव, मैंने लक्ष्मण और हनुमान को बुला लिया है और साथ ही आपके कहे अनुसार अपनी अँगूठी भी मैंने कक्ष की इस रिक्ती में उतार गिराई है। आपको पूरा भरोसा है यह युक्ति सफ़ल होगी?
कालदेव- आपको मुझपर भरोसा नहीं?
राम- सत्य कहूं तो अभी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।
कालदेव- (मुस्कुराते हुए) आप
अवश्य ही सब जानते हैं प्रभु, वरना जिस कुशल क्षत्रिय राजा
राम कि महिमा हमने सुनी है, वे तो बिना सोचे समझे एक डग भी
नहीं भरते। यद्यपि आपके मन में तनिक भी शंका होती तो आप मुझे महल लाते ही नहीं।
राम- (मुस्कुराकर) चलिए... कम से कम आपको ऐसा लगता है।
[ लक्ष्मण का प्रवेश। ]
लक्ष्मण- आप आ गए भइया? प्रणाम, उत्तर ने इस अकाल घड़ी मुझे आने को कहा, सब सकुशल तो है? (कालदेव से) प्रणाम मुनिवर।
राम- नहीं लक्ष्मण, एक बहुत ही अहम प्रयोजन के चलते मुन्.. (रुककर) ऋषिवर, मैं और हनुमान इस कक्ष में एक गुप्त बैठक करने वाले हैं।
लक्ष्मण- क्या बात है भइया?
राम- इस समय मैं तुम्हें केवल इतना ही बता सकता हूँ कि हमारे संसार में शांति बनाए रखने के लिए यह अत्यावश्यक है। (रुककर) और निष्चित भी।
लक्ष्मण- तो मेरे लिए क्या आज्ञा है भइया।
राम- भाई इस गोष्ठी का एक आख़र भी इस कक्ष के बाहर न जा सके, जिसके लिए मैं चाहता हूँ कि तुम बाहर खड़े रहकर कक्ष का संरक्षण करो। याद रहे यदि कोई भी इस बैठक के दौरान मेरी आज्ञा के बिना भीतर आता है तो उसे मृत्युदंड मिलेगा, चाहे वो कोई भी हो। ऐसे में उसके जीवन के उत्तरदाता तुम होगे। मुझे वचन दो कि चाहे जो हो, तुम इस कक्ष का रक्षण करोगे।
लक्ष्मण- नि:संदेह। मैं वचन देता हूँ भइया।
राम- ठीक है लक्ष्मण, जैसे ही हनुमत... लो वे आ गए।
[ हनुमान का प्रवेश। हनुमान ने पूरे शरीर पर सिंदूर लपेटा हुआ है। वे आगे बढ़ श्री राम को नमन करते हैं। ]
हनुमान- आपने कहला भेजा अधिपति?
राम-
हाँ हनुमत, एक बहुत ही महत्वपुर्ण कार्य के चलते मैंने इस गोष्ठी का आयोजन किया है। जिसके लिए ही
ऋषिवर बहुत दूर से हमारा मार्गदर्शन करने आए हैं। (हनुमान कालदेव को
प्रणाम करता है) मैं नहीं चाहता की अभी इस बात का महल में अन्य किसी भी
व्यक्ती को पता चले इसलिए कक्ष के बाहर तैनात(नियुक्त) रहकर लक्ष्मण कक्ष का रक्षण करेंगे।
हनुमान- धनी यदि आप कहें तो मैं भइया लक्ष्मण के स्थान पर...
राम-
नहीं हनुमत, तुम्हारा इस वार्ता में होना महत्वपुर्ण
है। हमें तुम्हारे सुझाव की भी आवश्यक्ता होगी। (बाहर जाने
का संकेत करते हुए) लक्ष्मण।
[ लक्ष्मण का प्रस्थान। ]
राम- (कालदेव से) आइये.... आओ हनुमत बैठो। हनुमान बात वस्तुतः ऐसी है कि मेरे मन में यह विचार अब बहुत वर्षों से कोतुहल मचाए है कि, सामान्यत: एक पिता अपनी सम्पत्ति, अपने कर्तव्य, अपना भार सब अपने पुत्र को सोंप देता है, पर मेरा दुर्भाग्य यह रहा कि महाराज दशरथ अपने जीते जी ऐसा नहीं कर सके। तो मैं इस चिंतन में हूँ कि कदाचित अब समय आ गया है की मैं राजा के इस धर्म से निर्वहित हो जाऊँ और सन्यास ले लूँ।
[ हनुमान खड़े हो जाते हैं। ]
राम- (बैठ जाने का संकेत करते हुए) तुम्हें क्या लगता है, क्या लव को राजा बनाना ठीक रहेगा?
हनुमान- धनी, राजकुमार लव अयोध्या के राजा बन जाएं इससे अधिक प्रसन्नता की बात क्या होगी, पर प्रभु... आपको लगता है कि अभी उन पर यह भार डालना उचित होगा? और प्रभु राजकुमार लव और कुश दोनों यमज जन्में (जुड़वा) भाई हैं, किसी भी एक का चुनाव पूर्णत: सोचने समझने के उपरांत ही होना चाहिये। आप क्या कहते हैं ऋषिवर?
[ अंधकार। ]
दृश्य तीन
अयोध्या राजमहल, कक्ष के बाहर; सवेरा
[ लक्ष्मण बाहर खड़े होकर कक्ष का रक्षण कर रहे हैं। कुछ क्षण पश्चात ऋषि दुर्वासा का प्रवेश। ]
लक्ष्मण- प्रणाम ऋषिवर...
दुर्वासा- (सीधा भीतर जाते हुए) आयुषमान...
लक्ष्मण- ठहरिये ऋषिवर। क्षमा कीजिये पर इस समय आप भीतर नहीं जा सकते।
दुर्वासा- और कौन रोकेगा मुझे?
लक्ष्मण- भइया का आदेश है कि कक्ष में कोई न आने पाए। एक गुप्त बैठक के चलते इस कक्ष में जाना सभी के लिए वर्जित है देव।
दुर्वासा- मैंने केवल यह पुछा की कौन रोकेगा मुझे?
लक्ष्मण- मैंने भइया को वचन दिया है ऋषिवर और एक क्षत्रिय का वचन छूछा (रीता) नहीं जा सकता। मैं वचनबद्ध हूँ मुझे आप क्षमा कीजिए। अभी के लिए लौट जाईये।
दुर्वासा- ऐसा भी क्या प्रयोजन है जो यह बैठक दुर्वासा के बिना हो गई? मैं भी तो जानूँ!
लक्ष्मण- बात क्या है यह तो मैं भी नहीं जानता, पर इतना अवश्य जानता हूँ की श्री राम राज्य में कुछ भी अकारण नहीं होता। और इस समय मैं आपको भीतर जाने नहीं दे सकता।
दुर्वासा- तुम्हें ज्ञात नहीं मैं कौन हूँ? ऋषि दुर्वासा को रोकने का तेरा इतना साहस मूरख। अपने इस हठ का परिणाम जानता है?
लक्ष्मण- (उनके सामने बैठ कर
विंती करते हैं) आप गुरु हैं देव। मुझ अज्ञानी को क्षमा कीजिये और मेरी विवशता को
समझने का प्रयत्न कीजिये। अपना हठ आप भी छोड़ दें।
[ दुर्वासा बात अनसुनी कर भीतर जाने लगते हैं। लक्ष्मण अपनी कटार निकाल कर उनका रास्ता रोक लेते हैं। ]
लक्ष्मण- (रोश में) मान जाइए ऋषिवर, अन्यथा...
दुर्वासा- (व्यंगात्मक) मूरख.. मुझे रोकेगा! भस्म कर दूँगा...
हट...
[ दुर्वासा पुनः आगे बढ़ते हैं लक्ष्मण स्फूर्ति से उठ कर कटार की नोक उनके सिर के पिछे तान देते हैं। ]
लक्ष्मण- सावधान ऋषिवर! आप मेरी क्षत्रियता कि परीक्षा न लें, ठहर जाइये।
दुर्वासा- (पलटते हुए) ब्रहामण कि हत्या करेगा मूरख? ब्रह्म-हत्या का पाप लेगा अपने सर। कलंकित करेगा अपने कुल को... कर.. मार... मार ना।
लक्ष्मण- आवश्यक होने पर वह भी करुंगा देव, पर आप भीतर तो नहीं जाएंगे।
दुर्वासा- (क्रोध में) तो ठीक
है, यदि तुम अभी
इसी समय मुझे भीतर नहीं जाने दोगे तो मैं
तुम्हें, तुम्हारे राम को और राम के नाम को ही नष्ट कर दूँगा। ऐसा श्राप दूँगा कि उसकी जितनी भी ख़्याती
है सब मिट्टी में मिल जाएगी, अयोध्या
की प्रजा कीड़े पड़ पड़ के मरेगी, आने वाली सभी नस्लें अपाहिज
अपंग पैदा होंगी, अन्न
के एक कोर को भी तृषित होगी तुम्हारी यही प्रजा और कोई
राजा.. कोई भी राजा यहाँ शांति से जी नहीं सकेगा, विनाश होगा। और यह सब... यह सब तुम्हारे इस हठ के कारण
होगा दम्भी राजपुरुष....
[ लक्ष्मण सोच में घिरे वहीं खड़े रहते हैं। ]
दुर्वासा- लगता है मेरी बात तुम्हें स्वांग लग रही है।
[ दुर्वासा पीछे हट कर मंत्र पढ़ने का ढोंग करते हैं। प्रकाश बदलता है, लक्ष्मण उनके समक्ष ही खड़े हैं और मन ही मन सभी सम्भावनाओं का अनुमान लगाते हैं। ]
लक्ष्मण- यदि मैं इन्हें भीतर नहीं जाने देता तो इनके श्राप से सम्भवत:
अयोध्या के निर्दोष लोगों को हानी होगी और ऐसा हुआ तो राम राज्य का नाम दूषित होगा, भइया की ख़्याती पर आघात होगा। लांछन लगाये
जाएंगे। तब इस सबका कोई अर्थ ही नहीं
रह जाएगा... परंतु मैं इनको भीतर जाने देता
हूँ तो वचनानुसार भइया को इन्हें मृत्यूदंड देना पड़ेगा। नहीं.. ब्रह्म-हत्या का पाप भइया के हाथों नहीं होना चाहिए, और इन्हें तो यह आभास तक नहीं कि अज्ञातवश यह अपनी मृत्यु को आह्वाहन दे रहे हैं, मैं ऐसा नहीं होने दे सकता। अरे... दम्भी ब्राहमण
यह हम सब को किस मोड़ पर ला खड़ा किया है तुमने। हर प्रकार से क्षतीग्रस्त
होगी रघुकुल की मर्यादा... जब तक की कोई.... (कुछ सोच कर) यदि मैं स्वयं ही....
हे प्रभु यह कैसी लीला है आपकी। आपका संकेत संभवतः मैं समझ गया। तो ठीक है यदि यही होना है तो यही सही। प्राण जाए पर वचन न जाए....
(दुर्वासा के समीप जाकर) ठहरिये ऋषिवर। आप भीतर चले जाएं।
[ दुर्वासा मंत्र रोककर आँखें खोलते है। ]
लक्ष्मण- आप भीतर चले जाइये
ऋषिवर। पर पहले मैं जाउंगा।
[ अंधकार। ]
दृश्य चार
अयोध्या राजमहल, कक्ष के भीतर; सवेरा
[ श्री राम, कालदेव और हनुमान के बीच वार्तालाप चल रहा है, तभी लक्ष्मण सहसा भीतर आते हैं। ]
हनुमान- धनी यदि राजकुमारों का राज्याभिषेक करना है तो हमें प्रबंध आरंभ कर देना चहिये।
कालदेव- सत्यवचन हनुमान और आपसे अतिशिघ्र यह कार्य भला दुजा और कौन कर सकता है।
[ लक्ष्मण का प्रवेश। ]
लक्ष्मण- भइया....
[ हनुमान आशचर्यचकित रह जाते हैं। सभी भिन्न भिन्न अनूभुतियों के कारण खड़े हो जाते हैं।
राम- (अपराध बोध से) यह तुमने क्या किया लक्ष्मण?
लक्ष्मण- मैं क्या करता भइया, मैं विवश था। ऋषि दुर्वासा आपसे मिलने कि हठ कर बैठे हैं और यदि मैं उनकी बात न मानता तो अनर्थ निश्चित था। परिस्थिति ही कुछ ऐसी हो चली की... मैं जानता हूँ कि मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है, और मैं इसका परिणाम भुगतने के लिए भी उद्यत हूँ।
हनुमान- यह भइया लक्ष्मण क्या कह रहें हैं धनी?
राम- हनुमत मैंने लक्ष्मण से यह वचन लिया था कि यदि कोई भी मेरी आज्ञा के बिना इस कक्ष में आता है तो उसे मृत्युदंड मिलेगा।
हनुमान- (चकित होकर) क्या....
राम- तुमने एक राजा का वचन भग्न दिया मेरे भाई?
कालदेव- केवल एक राजा ही नहीं साथ ही एक क्षत्रिय का भी राजन और एक क्षत्रिय का वचन कभी खाली नहीं जाना चाहिए।
हनुमान- (रोष में आकर) नहीं किसी भी अहंकारी के हठ के लिए भइया जैसे एक सज्जन को दंड मिले, भला यह कैसा न्याय हुआ।
कालदेव- एक राजा के वचन का किसी भी कारण उल्लंघन करना नितीगत नहीं। तब चाहे वो कोई भी हो, परिणाम तो उसको भोगना ही होगा।
हनुमान- ऐसे कैसे परिणाम भोगना होगा। मैं भी देखता हूँ कौन होते हैं यह ऋषि दुर्वासा।
राम- बैठ जाओ हनुमत...
हनुमान- नहीं प्रभु यह तो...
राम-
(ऊँचे स्वर में) बैठ जाओ हनुमान।
[ हनुमान विकल होकर बैठ जाते हैं। ]
राम- जाओ ऋषि दुर्वासा को भीतर ले आओ लक्ष्मण।
[ ऋषि दुर्वासा कक्ष के भीतर आते हैं। ]
दुर्वासा- भला ऐसी कौन सी वार्ता है जो दुर्वासा की अनुपस्थिति में हो रही है राजा जी?
राम: प्रणाम ऋषिवर।
दुर्वासा- यशस्वी भव: ।
राम: हमें क्षमा कीजिए ऋषिवर। वास्तव में मुझे लगा कि अब समय आ गया है की मैं राजपाठ अपने बेटों को हस्तांतरित कर, सन्यास ले लूँ, इसी पर विचार-विमर्श करने के लिए इस बैठक को मैंने बुलाया। आपका इस संदर्भ में क्या विचार है?
दुर्वासा- अच्छे विचार हैं। बहुत उत्तम... परंतु प्रश्न अभी यह है कि यह बात हमें पहले क्यूँ नहीं बताई गई। यही अहमियत है हमारी आपके इस राज्य में? या आपको यह भ्रम हो गया कि आप दुर्वासा से कुछ भी गुप्त रख पाएंगे।
राम: क्षमा किजिए ऋषिवर, मैं आपको निश्चित ही सब बताने वाला था। पर यह सब इतना आकस्मिक रूप से हुआ कि.... हम इसी पर ही विचार कर रहे थे कि राजकुमारों का राज्याभिषेक किसी सर्वोत्तम गुरु द्वारा ही होना चाहिए और भला आपसे अधिक निष्पक्ष एवम् गुणी कौशल में दूजा और कौन होगा। यह कार्य आपके ही मंगल हाथों से होना उचित रहेगा।
दुर्वासा- सत्य वचन रघुनंदन, हमसे उत्तम भला और कौन रहेगा। यह ज्ञान तनिक लक्ष्मण को भी दीजिए।
राम-
जी जी... आज सांयकाल से पूर्व ही राजकुमारों का राज्याभिषेक होगा। आपका वहां होना आनिवार्य है।
[ दुर्वासा मुस्कुराते हुए कक्ष से चले जाते हैं। ]
कालदेव- अपना वचन पूर्ण कीजिए महाराज, अन्यथा यह शास्त्रों का अनादर, मर्यादा का उल्लंघन होगा।
लक्ष्मण- ऋषिवर सत्य कह रहे हैं भइया। एक राजा का वचन कभी खाली नहीं जाना चाहिए, तो परिणाम जो हो सो मुझे स्वीकार्य है।
राम- (गंभीर श्वास भरते हुए) ह्म्म... तो ऐसा ही होगा।
हनुमान- नहीं धनी यह अनर्थ मत किजिए। भइया लक्ष्मण एक ज्ञानी और सक्षम योद्धा हैं, एक राजपुरुष हैं। आप उनके स्थान पर मुझे मृत्युदंड दे दीजिए।
कालदेव- नहीं हनुमान, ऐसा नहीं हो सकता। अपराध जिसने किया है दंड भी उसे ही भोगना होगा।
लक्ष्मण- ऋषिवर याथातथ्य कह रहे हैं हनुमान।
हनुमान- नहीं यह उचित नहीं। (कुछ सोचकर) एक और उपाय है मेरे पास, एक उपाय और है जिससे आपके वचन कि गरिमा भी रह जाएगी और भइया लक्ष्मण के प्राण भी बच जाएंगे।
कालदेव- कदाचित आप अभी बूझ नहीं पा रहे वानरदेव। जो होना है वह होकर रहेगा। अटल को परिवर्तित करने का आप व्यर्थ ही प्रयास कर रहे हैं। यह बचपना है।
हनुमान- सम्भवतः... आप अवश्य ही सत्य कह रहे हैं। कदाचित मैं अपनी वानर बुद्धी से सम्पूर्ण चित्र का आभास नहीं कर पा रहा हूँ, पर आप सब मनुष्य यह नहीं देख पा रहे कि एक भाई के हाथों अपने ही बन्धु को मृत्युदंड मिलने से तो मेरा बचपना उचित है।
राम- कहो हनुमत.. क्या कहना है तुम्हें।
हनुमान-
धनी.. शास्त्रों के ही अनुसार यदि कोई पालक
अपने समबन्धी किसी साधु व्यक्ति का परीत्याग कर देता है तो वह उस साधु आत्मा के
लिए मृत्यु समान ही है। और भइया लक्ष्मण का विशुद्ध मन, उनकी दक्षता, उनका आचरण तो विश्व विख्यात है।
[ राम कालदेव की ओर देखते हैं। कालदेव हाँ में संकेत करते हैं। राम आगे बढ़ लक्ष्मण से गले मिल कर उनका परीत्याग कर देते हैं। ]
राम- (अपने अश्रु रोकते हुए) सुमित्रा नंदन लक्ष्मण, मैं कौशल्या पुत्र अयोध्या नरेश रामचंद्र दशरथ इक्शवकु तुम्हारा परीत्याग करता हूँ... मेरे भाई।
लक्ष्मण-
जैसी आपकी आज्ञा भइया। और आप चिंतित नहीं होइए भइया, आपका
वचन खाली नहीं जाएगा।
[ लक्ष्मण श्री राम के चरण स्पर्श करते हैं। दोनों स्वयं को सम्भालते हैं, जिसके कुछ क्षण पश्चात लक्ष्मण स्फूर्ति से कक्ष से चले जाते हैं। कुछ क्षण का मौन। ]
राम-
तुम्हारे लिए भी एक कार्य शेष है हनुमान। वहाँ उस रिक्ती में मेरी अँगूठी गिर गई है। क्या तुम मेरे लिए उसको निकाल
लाओगे?
[ हनुमान रिक्ती की ओर बढ़ते हैं। ]
हनुमान-
यहाँ? इस रिक्ती में?
[ अंधकार। ]
दृश्य पांच
नागलोक; अनिष्चित समय
[ मंच पर अंधकार है। हनुमान नागलोक में प्रवेश करते हैं। केवल उनकी छायावत् आकृती और वाणी सुनाई पड़ती है। ]
हनुमान- (आश्चर्य से) अरे! मेरे राम.... यह मैं कहाँ आ पहुँचा! (पुकारते हुए) कोई है? क्या मुझे सुन सकता है, कोई है यहाँ?
वासुकी- अवश्य ही... मैं आप ही की बाट देख रहा था। आप हैं पवन सुत हनुमान, है ना?
हनुमान- जी... पर क्षमा करें मैं आपको पहचान नहीं सका और ना ही इस स्थान को? यह मैं कहाँ आ बड़ा हूँ मित्र।
वासुकी- सर्वप्रथम तो आप मेरा नमन स्वीकार कीजिए वानर देव। आप जहाँ आ पहुँचे हैं, यह नागलोक है और मैं हूँ यहाँ का वासुकी।
हनुमान- ओह... प्रणाम सर्पराज। तो आप हैं वासुकी, आपकी महिमा के बहुत से आख्यान सुने हैं मैंने देव।
वासुकी- महिमा के चर्चे तो स्वयं आपके भी कम नहीं है हनुमान।
हनुमान- आपसे पहले कभी भेंट नहीं हुई सो मैं आपको पहचान नहीं सका इसका मुझे खेद है।
वासुकी- आपका दोष नहीं हनुमान, नागलोक का यह अंधकार अवश्य ही आपको तंग किये दे रहा होगा।
हनुमान- नहीं बहुत अधिक नहीं।
वासुकी- लगता है आप वो अँगूठी ढूंढने के लिए आएं हैं?
हनुमान- जी हाँ राजन, परंतु आपको...
वासुकी- वासुकी से कुछ नहीं छिपा हनुमान।
हनुमान-
(मुस्कुराकर) जी.. ठीक कहा। चलिए।
[ हनुमान और वासुकी एक ओर से भीतर जाकर मंच के दुसरी ओर से बाहर आते हैं। ]
वासुकी- यह लीजिए वानर देव, आ पहुंचे हम अपने ठिकाने पर। वो वहाँ देखिये... वो परबत। वहीं है, प्रभु श्री राम की अँगूठी।
हनुमान- (आगे बढ़कर देखते हुए) परंतु वहाँ तो कुछ दिखलाई नहीं पड़ता।
वासुकी- थोड़ा ध्यान से देखिये...
हनुमान-
लगता है आपको कुछ मिथ्याबोध हो चला है राजन। यहाँ तो शून्य के सिवा कुछ नहीं
दीखता।
[ धिमे-धिमे मंद प्रकाश मंच पर उभरता है। ]
वासुकी-
थोड़ा और आगे जाईये।
[ हनुमान आगे बढ़ एक खाई के किनारे पहुँच जाते हैं, जिसके तल पर से असंख्य अँगूठीयों से बना एक परबत उन्हें दिखता है। ]
हनुमान- हे राम! यह तो निश्चय ही एक परबत है। मुझे क्षमा कीजिए राजन।
वासुकी- क्षमा माँगने की कोई अवश्यक्ता नहीं है हनुमान। ले लीजिए, वहीं मिलेगी आपको अँगूठी।
हनुमान- हाँ परंतु इनमें से कौनसी?
वासुकी-
आप स्वयं ही देख लीजिए।
[ हनुमान एक अँगूठी उठाते हैं। ]
हनुमान- (स्वगत)अरे वाह! मिल गई, पहली ही बार में... अदभुत। आपका बहुत धन्यवाद मेरी सहायता करने के लिए राजन। अच्छा मैं चलता हूँ...
वासुकी- एक बार पुनः देख लीजिए हनुमान, यह श्री राम ही की अँगूठी है ना?
हनुमान- जी... यह मेरे प्रभु की ही अँगूठी है। मुझसे अधिकांश इसे भला और कौन जानता होगा। मैं इससे भलि-भाँती अभिग्य हूँ।
वासुकी-
अच्छा? तब यह किसकी
अँगूठी है हनुमान?
[ वासुकी परबत पर से एक दूसरी अँगूठी उठा कर हनुमान को देते हैं। हनुमान दोनों अँगूठियों की तुलना करते हैं और चकित रह जाते हैं। ]
हनुमान- यह तो दोनों एकदम समान हैं। (आगे बढ़कर और अँगूठीयों को परखते हुए) यह क्या माया है राजन? यह एक अँगूठी का परबत कैसे हो गया? यह तो सारी प्रभु ही की अँगूठीयां लगती हैं।
वासुकी- सही कह रहे हैं वानर देव। यह सभी अँगूठियां श्री राम ही की हैं।
हनुमान- क्या?
वासुकी- अतिश्योक्ति नहीं, यह पूरा परबत ही इन्हीं अँगूठियों से बना है।
हनुमान-
पूरा परबत!
[ हनुमान कुछ विचार कर नीचे खाई में परबत को झाँक कर देखते हैं, तत्पश्चात ऊपर कि ओर देख कुछ अनुमान लगाकर दो डग पीछे हटते हैं। ]
वासुकी- (हँसते हुए) रुकिये हनुमान। इस बार पूरा परबत उठाने की आवश्यक्ता नहीं है।
हनुमान- यह क्या माया है सर्पराज?
वासुकी- माया नहीं केवल सत्य है हनुमान। एक ऐसा सत्य जिसके प्रत्यक्ष होते भी हम अपने इन दो नेत्रों से उसकी थाह नहीं ले पाते। इस ब्रह्माण्ड में अनगिनत ऐसे जीवंत उदाहरण हैं। यह सृष्टि कल्पों और युगों कि एक अनन्त माला में बंधी है। एक ऐसा चक्र जो चलता ही जाता है। अनन्त काल से त्रेतायुग में प्रभु राम पृथ्वी पर अवतरित होते हैं, तद्उपरांत एक दिन उनकी अँगूठी ऊपर से ठीक यहाँ, इस परबत के स्थान पर आ गिरती है। हर बार। जिसके पीछे-पीछे एक वानर उस अँगूठी को ढूँढता हुआ यहाँ मेरे पास आ पहुंचता है। हर बार। और जब तक हनुमान यहाँ नागलोक में होते हैं, प्रभु राम मनुष्य दह त्याग कर यम के साथ अपने परम धाम को रवाना हो जाते हैं।
हनुमान- क्या?
वासूकी-
आपके होते यम पृथ्वी पर नहीं आ सकते। प्रभु भी यह बात जानते हैं की आप उन्हें जाने
से रोक लेंगे। आपका प्रेम सम्भवतः उनका
निष्चय अशक्त कर दे। प्राण छोड़ना कोई सरल कार्य नहीं है हनुमान। प्रभु राम
चाहे एक साधारण मनुष्य न भी हों, अत: हैं तो मनुष्य ही। जिसने जन्म लिया है उसे मृत्यू भी भोगना होगा। यह एक
कटू सत्य है, प्रभु बस आपको यही बतलाना चाहते हैं, इसलिए ही वो हर बार आपको
यहाँ भेज देते हैं वानर देव। लेकिन इस बार सम्भवतः सामान्य से
कुछ पृथक होगा।
पर जो भी हो यह सनातन चक्र चलता रहेगा। भविष्य में गिरने वाली कई अँगूठियों के लिए इस परबत पर अभी स्थान है और हर कल्प में हनुमान मेरे पास आते रहेंगे। सत्य कि स्थाप्ना करने राम सदैव आएंगे। पर उन्हें पुनः जाना होगा ताकि भविष्य के राम, एकबार पुनः आ सकें। यही नीति है हनुमान। और यही प्रभु की इच्छा।
हनुमान- आपकी बात मैं बोध गया राजन। (रुककर) अगर प्रभु यही चाहते हैं तो यह साधारण सा वानर कौन होता है उसकी उपेक्षा करने वाला। मैं चलता हूँ। राम राम।
[ अंधकार। ]
दृश्य छ:
सरयू नदी का तट; सांझ
[ लव और कुश का राज्याभिषेक। कुछ संगीतकार अपने समूह के साथ मंच के पिछले भाग में गा-बजा रहे हैं। श्री राम मंच के एक कोने में खड़े चुपचाप सबको देख रहे हैं। मंच के अग्र भाग में ऋषि दुर्वासा मंत्रोच्चारण कर रहे हैं। लव और कुश मंच के मध्य में सभास्थल पर बैठे हैं, अन्य सभी परिवारजन व सेवक उनके आस पास ही खड़े हैं। मंत्रोच्चारण रुकता है। एक सेवक श्री राम को मंच के मध्य में लेकर आता है। ]
सेवक- महाराज रामचंद्र की...
सभी-
जय हो...
[ दुर्वसा अपने समक्ष रखे कलश को उठाकर राजकुमारों के पास लाते हैं और उनका अभिषेक करते हैं। राम आगे आकर अन्य तीन पवित्र जलों से उनका अभिषेक कर उनका राजतिलक करते हैं। ]
सेवक- अयोध्या नरेश लव रामचंद्र इक्ष्वकु की....
सभी- जयतू..
सेवक- राजा कुश रामचंद्र इक्ष्वकु की....
सभी- जयतू..
लव- अयोध्या वासियों, आपने सदैव हम दोनों भाइयों को प्रेम से अपने हृदय में स्थान दिया है। अपने पिता महाराज रामचंद्र और अपने चाचाओं कि भांति हम भी अपने कर्तव्यों का पूर्णतः पालन करने की यत्न, सदैव करते रहेंगे...
कुश- एक अच्छा समृद्ध और यशवंत राज्य अस्पृष्ट रखने में हमें आपके सहयोग व आशिर्वाद की आवश्यक्ता होगी। मेरे अंतिम श्वास तक मरयादा पुरुषोत्तम महाराज राम की भांति, अपने कर्तव्य का पालन करने का मैं वचन देता हूँ।
लव- मैं वचन देता हूँ।
लव, कुश- रघुकुल रीत सदा चली आई..
सभी- प्राण जाए पर वचन न जाए।
[ कुश आगे बढ़ कर शंखनाद करते हैं। श्री राम आगे आकर प्रजा को संबोधित करते हैं। संगीत धिरे से शांत हो जाता है। ]
राम- अयोध्या नगर के मेरे परिवार गण, सर्वप्रथम मेरा प्रणाम स्वीकार कीजिए। मैं आपका राम, आप सभी से यह प्रार्थना करता हूँ कि जैसे आप सबने
मुझे अपनाया, मुझे अपनी सेवा का अवसर दिया, वैसे
ही आप कुश और लव को भी अपनाऐं। आज बहुत विचित्र यह एक घड़ी हमारे सामने आ खड़ी हुई है। जहाँ ख़ुशी के साथ साथ
दु:ख का भी एक कारण हमारे पास
है। लक्ष्मण अब हमारे साथ नहीं हैं। (लोगों के बीच आश्चर्य) जी..... यह सच है। (रुककर) आज इतने दशक हो चले मैं आपसे
कुछ कहना चाहता हूँ। एक मनुष्य होने के नाते मैंने अपने सभी धर्म पालन करने का प्रयत्न किया है, सभी रिश्ते।
चाहे वो एक पुत्र का, पिता का नाता हो, एक
भाई का, एक राजा का या शेष सभी। पर एक ऐसा
रिश्ता जो वस्तुतः मैं नहीं निभा पाया वो है
एक पति का..... मुझे लगता है कि मैं एक अच्छा राजा तो संभवतः बन पाया लेकिन एक अच्छा पति नहीं बन सका। जीते जी मैं सीता
को कभी सुख के दो पल नहीं दे पाया। उनके धरती के गर्भ में समा जाने के पश्चात ही से मैं इस विचार से जूझता रहा हूँ कि उनके मुझसे विवाह के उपरांत उन्हें जीवन में हर अवसर पर दुःख के अतिरिक्त कुछ और मिला ही कहाँ। पहले मेरे कारण राज वधु का जीवन त्याग
उन्हें वन जाना पड़ा, तत्पश्चात मेरी ही भूल के कारण उस राक्षस के गढ़ में यातनाऐं झेलनी पड़ीं। अपना सम्मान आग
में झोंकना पड़ा और अंत में राजपाठ के साथ उनके बच्चे भी मैंने उनसे छीन लिए। अब आप
यह बताइये कि यह कैसी मर्यादा हुई? वास्तव में सच तो यह है की सीता के जाने के पश्चात से राजपाठ शासन से मेरा मोह उठ गया था।
मन नहीं लगता। पता नहीं सीता मुझे क्षमा कर पाएंगी या नहीं।
[ हनुमान का प्रवेश। कालदेव हनुमान को देख आश्चर्य चकित रह जाते और श्री राम की ओर देखते हैं। कालदेव हनुमान की ओर बढ़ते हैं, पर श्री राम संकेत कर उन्हें रोक अपने पास बुला लेते हैं और धीमे स्वर में उनसे कुछ कहते हैं। कालदेव वापस अपने स्थान पर लौट जाते हैं। राम हनुमान की ओर देखते हैं। हनुमान जाकर शेष परिवारजनों के साथ खड़े हो जाते हैं। श्री राम पुनः प्रजा को संबोधित करते हैं। ]
मेरे
जीवन का वो एक और ऐसा स्वरूप (पक्ष) रहा जिसे लेकर मैं अपने आप को सदैव कोसता रहता हूँ, वह है एक योद्धा होना। आप
सोच रहे होंगे कि एक क्षत्रिय होकर मैं यह क्या कह रहा हूँ! शायद मेरी उम्र हो चली है। पर... यदि मैं आपको यह समझा पाता की एक राजा का योद्धा
होना कितना कठिन होता है। इस बात का अनुमान यहाँ मात्र मुझे ही
है या सम्भवतः मेरे भाई भरत को। एक क्षत्रिय होने के नाते मैंने अपने सभी कर्तव्य निभाए, पर
अपने पिता के अंतिम क्षणों में उनके पास भी न रह सका, क्यूँकि मैं एक क्षत्रिय था। मैं अपने बेटों
का बचपन तक नहीं देख पाया क्यूँकि मैं एक योद्धा था। सीता के प्रति मैं अपना धर्म
नहीं निभा सका क्यूँकि मैं एक योद्धा था। न जाने कितने ही लोगों के रक्त से सने
हैं इस योद्धा के हाथ। कई बार घृणा भी हुई अपने आप से पर तब भी मैंने अपने क्षत्रिय होने का, अपने योद्धा होने का
धर्म निभाया। और आज इतनी आयु जी लेने
के पश्चात मैं बस यही कामना करता हूँ आने वाले समय में कभी किसी को
योद्धा न होना पड़े।
(रुककर
कुछ क्षण सोचकर मुस्कुराते हुए) पर मैं यह भी जानता हूँ की आगे अभी
बहुत से युद्ध शेष हैं। हो सकता है भविष्य में मुझे और भी बड़े और भयानक युद्ध लड़ने पड़ें।
कितनी दुर्भाग्यूर्ण
निरर्थक बात है की शांती स्थापित करने के लिए हमें युद्ध करना पड़ता है।
पर अन्तरमन से मेरी यही
कामना होगी के आगे कोई योद्धा न हो और इसी कामना के साथ मैं आपका सेवक राम अपने
दादा अज् की भांति जीवन से सन्यास ले रहा हूँ।
[ लोगों के बीच कोतुहल। लव और कुश राम के पास आते हैं आर उन्हें पकड़ लेते हैं। ]
लव- यह आप क्या कह रहे हैं पिताजी? नहीं... नहीं ऐसा नहीं.....
कुश- ऐसे राजपाठ का हम क्या करेंगे जो हमें आपसे पृथक कर दे। नहीं पिताजी आप...
राम-
कदाचित सीता वहाँ मेरी राह देख रही है
बच्चे।
[ राम भरी आँखों से दोनों बेटों को देखते हैं। भरत आकर राम से धीमे स्वर में कुछ वार्तालाप करते हैं, तद्उपरांत अपने स्थान पर लौट जाते हैं। तीनों गले मिलते हैं। लोगों के बीच कोतुहल जारी। ]
लव- (ऊंचे स्वर में) शांत हो जाईये!
राम-
(लोगों को सम्बोधित करते हुए) जिस प्रकार मेरा आप
लोगों के बीच आना आनीवार्य था वैसे ही अन्ततः मुझे
जाना होगा। यही जीवन का नियम है। अब मैं चाहता हूँ की मैं अपना पति धर्म निभा सकूँ।
आपने मुझे अपनी सेवा करने का अवसर दिया अब
मुझे जाने की भी अनुमती दें। मेरी आप सब से यही विंती है।
[ कुछ क्षण का मौन। ]
सभी-
सियापत् रामचंद्र की.... जय!!!! सियापत् रामचंद्र की.... जय!!!!!
[राम सबको निहारते हैं तद्उपरांत अपना उत्तरिय और आभुषण उतार कर सेवकों को देते हैं। हनुमान आगे आ उनके समक्ष बैठ जाते हैं। ]
हनुमान- मेरे लिए क्या आज्ञा है धनी?
राम-
(हनुमान को उठाते हुए) तुम्हें इस संसार में अभी और रहना है हनुमत्। तुम्हारी
निष्ठा तुम्हारा बल कलियुग में सबका उद्धार करेगा। मेरे प्रति जो तुम्हारा प्रेम
है संभवतः वही इस संसार को बचा
ले। जाते जाते यह भी कह देना चाहता हूँ की जितना प्रेम मैं सीता और लक्ष्मण से
करता हूँ उतना ही तुमसे भी मेरे भाई। (मुस्कुराकर) अब तुम्हें मेरी लम्बी आयू के
लिए अपनी
देह पर यह सिंदूर लपेटने की आवश्यक्ता नहीं पड़ेगी....
चिरंजीवी भव:।
[ दोनों गले लगते हैं। हनुमान अपनी बाँह से सिंदूर लेकर श्री राम का तिलक करते हैं। राम एक दुसरा श्वेत उत्तरिय पहनते हैं, तद्उपरांत हाथ जोड़ सबको नमन कर मंच से चले जाते हैं। उनके निकलने के साथ ही नेपथ्य से गीत मंगल भवन, अमंगल हारी शुरु होता है। धीरे धीरे प्रकाश और संगीत भी धीमा होता जाता है। ]
[ रात्री 00:07 ; दिसम्बर 4, 2018 ]
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