Hajamat
हजामत
(अंतरालपुर क़िस्सा #1)
भाषा: देहाती (जमनापारी)/ हिंदी नाटककार अनन्त गौड़
पात्र सूची
ज.ना: जवान नाई
बु.ना: बूढ़ा नाई
मा.ग्रा.: मालिश कराता ग्राहक
चा. वा: चाय वाला
प्र.ग्रा: प्रतीक्षा करता ग्राहक
मूँ.व.: मूंछ वाला व्यक्ति
जज़: जज़बात (बूढे नाई का बेटा)
रुख़सार: (जज़बात कि प्रेमिका, आज़ाद कि होने वाली बिवी)
आज़ाद: (जज़बात का मालिक, बूढ़े नाई का दूर का रिश्तेदार)
[दो नाई, एक बूढ़ा तक़रीबन 55-60 बरस की उम्र का और दूसरा तक़रीबन 40-45 के करीब। जवान नाई जो की दूकान का मालिक है, एक ग्राहक के बाल काट रहा है और बूढ़ा नाई दूसरे ग्राहक की मालिश कर रहा है। टी.वी. पर पुरानी हिंदी फिल्मों के गाने चल रहे हैं। इस दौरान एक तीसरा ग्राहक अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में बैठा है।]
(चायवाले का प्रवेश)
ज.ना.: हाँ भई थमचु, अरै इस टाइम लियाया। ना मत रख अब कौन पिएगा। मुंसीर कहाँ,आ लिया?
च.वा.: ना अभी कां, गाम गये वे तो। परसो की कह रये हे।
ज.ना.: अच्छा..... बिहायेलि कु ले कै गया होगा घर कु?
च.वा.: न। वा तो घरयी है।
(चायवाले का प्रस्थान)
ज.ना.: यू लौंडा लगा रक्खा था अजाद की दुकान पै, काम वाम सही चल रा है?
बू.ना.: हैं???
ज.ना.: जज़्बात अपना... दुकान पै नी लगा हुआ था?
बू.ना.: (मालिश रोकता है) हैँ... का कै रा है?
ज.ना.: अरै यू लौंडा अजाद की दुकान पै लग रा हा न अपना, सही चल रा काम धंधा?
बू.ना.: हाँ काम का का है, सही बढ़िया चल रा है। महीने का ढाई तीन आ जावै और का।
ज.ना.: और कहा बढ़ियाये। कौन अजाद वो कारीगर रख राखे होंगे और तो?
बू.ना.: न कारीगर कहाँ वायी हैं दोनू लड़के बस अभी तो।
ज.ना.: दोई।
बू.ना.: रक्खे तो दीखे कारीगर, पर ऐ मेरा सुसरा कोई टिकैयी नाए।
ज.ना.: हाहाहा......और कहा हाथ ए साफ करैं अपना फिर बस।
बू.ना.: हैं?
ज.ना.: मनकी हाथ साफ़ करैं हैं अपना बस, फिर बस कौन टिक रा है।
बू.ना.: होर का। महीना दू महीना कु टिकैं अपना हाथ साप करैं फिर पाल्लर (पार्लर) मैं। आजकल ना टिकै कोई, पाल्लर का जमाना है। दुकान कां......
ज.ना.: हम्बै...... (व्यंग से) हाहाह भेजते तो इसै भी पाल्लर में ही दीखो वैसै।
बू.ना.: हाँ छोड़ के आऊंगा किसी पाल्लर मैं इसै, कह तो रा हा पाल्लर मैं लगवायाओ। मैंने ही कही फिर ऐ कर तो सही तू महीना दू महीना कु इसमैं, फिर करूँ तेरी बात।
ज.ना.: ओर कहा। अपना हाथ साफ करकै फिर लग जा फिर किंगै कू भी।
बू.ना.: हाँ और का दो ढाई ऊगा ले है दिन का।
ज.ना.: कहाँ... वहीं दुकान?
बू.ना.: हाँ वहीं, पासयि है। ये यहाँ सै जितनी दूर ये बना रक्खा ना, पानी का बना रक्खा बच्चो का, स्विविंग (स्विमिंग) का सा। इतनी दूर है घर सै।
ज.ना.: पास ही है फिर तो बहोत। जब मर्जी अम्मी से मिलियाता होगा अपनी सै।
बू.ना.: हम्म्....
ज.ना.: मनकी अम्मी से मिलियाता होगा जब मर्जी फिर तो।
बू.ना.: हाँ और का।
ज.ना.: दुफैर कु खाना कहाँ फिर अम्मी धोरे ही खाता होगा?
बू.ना.: ह्म्बै....
ज.ना.: कब जावै है?
बू.ना.: ऐ कोई 10:30 बजे सिक जा।
ज.ना.: बहोत लेट खोलै दुकान तो।
बू.ना.: ना मार्किट धोरे है न, तो चले है, आये रह हैं घ्राहक रात तक।
ज.ना.: अच्छा मैं दिन कु समझ रा हा 10:30, लेट खोलने की।
[प्रतीक्षा करता ग्राहक जाने के लिए उठता है।]
प्र.ग्रा.: चलो यार भैया जा रा हूँ टाइम लगेगा तो।
ज.ना.: बस 5 मिन्ट रुको, हो लिया बस।
प्र.ग्रा.: अरे नी भईया लेट हो रा हु यार। बाद में आऊंगा।
[प्रस्थान]
ज.ना.: ये भी थमचु हिए सुसरा। कराना कुछ ना, आ जावै बस।
बू.ना.: टाइम किसकै धोरे है भैय्या आजकल।
[मालिश कराता ग्राहक बोल पड़ता है, जिसके कुछ देर बाद एक बारीक मूंछ वाले दुबले वयक्ति का प्रवेश होता है जिसने भद्दे लाल रंग की कमीज़ पहनी हुई है।]
मा.ग्रा.: बाल लम्बे हो गए इस बार ज़्यादा ही।
बू.ना.: आयै बी तो ना हो भोत दिन सै।
मा.ग्रा.: हाँ कल कराऊंगा कल कराऊंगा में टल रहा था। कर दो फिर कट्टिंग और क्या।
बू.ना.: कट्टिंग कराओगे?
मा.ग्रा.: क्या हुआ?
बू.ना.: मालिक लेट हो जाएगा फिर तो।
मा.ग्रा.: कैसे। जाना है कहीं?
बू.ना.: ना.... करकै तो तुम्हारी सब भेज दे, कट्टिंग सेव सब। टाइम हो लिया ना जादा पर।
मा.ग्रा.: चलो कल करा लूंगा कोई बात नहीं।
(मूंछ वाले व्यक्ति का प्रवेश।)
ज.ना.: और थमचु। कैसै..... शेव कराएगा?
मूँ.व्य.: ना घर जाऊँ। सबेरे आऊंगा। ये लो उसके बिजली वाले के। कट्टिंग के रह गए थे?
ज.ना.: ऐ 4 बार के रह रए थे पैसा भेंचो..... अब जाके दिए हैं 3 महीना में।
मूँ.व्य.: रै चोर हैं साले। मेरी खुद की दिहाड़ी रोक राखी है 8 दिना की। किसी दिन ईंट मारियाउंगा सर मैं साला के।
ज.ना.: हाहाह... तू बी भेंचो थमचु ई है।
[ ये बोलते हुए जवान नाई टीवी का रिमोट उठाकर चैनल बदलने लगता है।]
मूँ.व्य.: ऐ रोक रोक इसीपै बैटमैन आ री है।
ज.ना.: ओह्हो.... अंग्रेज कै फूफा।
मूँ.व्य.: रै भाई बड़ी जोर की पिच्चर बना रक्खी है या।
बू.ना.: तभी तो मेरे सुसरों तुम काम के ना धंधे के हो.... उलटी सीधी चीजें देखते रओ हो।
मूँ.व्य.: ऐ चाचा तू भी, यु ना है उल्टा फुल्टा। भोत बढ़िया पिच्चर बना है ये। अभी बनाई एक फिलम इसने इंटर्सवल इंटर्सवल करकै... ओ बहुत जोर की। दूसरी दुनिया ही दिखायी है वा मै.... तुम्हारी कसम। बहार ही गए हे लेके सारा कैमरा कूमरा अन्तरिच्छ मैं।
मा.ग्रा.: अच्छा जी।
मूँ.व्य.: धरम तै। साइंटिस्ट फाइन्टिस्ट सब साले सर पकड़ के बैठ गए हे अपना।
बू.ना.: भैया पता ना का का मसीने आ री आजकल।
[V.O. (bane's voice): i am the League of shadows, i am here to fulfill ra's -al ghul's destiny.]
[आवाज़ (बेन की): मैं ही लीग ऑफ़ शैडोज़ हूँ, मैं यहां राज़-अल घुल का अधूरा काम पूरा करने आया हूँ।]
ज.ना.: (टी.वी. की तरफ़ इशारा करते हुए) कहा कह रा है?
मूँ.व्य.: नू कह रा अक... मैं सिमरन कौ सेहजादा ऊँ, अर् मैं यहाँ राज कीये किस्मत ए बदलने आयौ हूँ।
ज.ना.: दिलवारे दुल्हनिया जैसी है क्या या?
मूँ.व्य.: हाँ वैसी सी ऐ, चल जाऊँ मैं।
ज.ना.: ऐ कहाँ जाऐ रुक जा।
मूँ.व्य.: ऐ ना, जाऊँ। टाइम हो लिया।
(प्रस्थान)
मा.ग्रा.: 11 बजे तक खोलते हो डेली?
बू.ना.: ना.... 9-9:30 कर दें बंद। वो तो त्यौहार के चक्कर में खोल राखी है। कल नी शनिवार है नी फिर.... इस मारे।
मा.ग्रा.: शनिवार को भी बाल नहीं कटवाते लोग?
बू.ना.: हाँ और का। पता ना का का बहम पाल राखे हैं।
मा.ग्रा.: मैंने तो मंगल का ही सुना था, शनिवार का तो पहली बार सुन रहा हूँ।
बू.ना.: ऐ भैनचोद अन्धबिसवासि भरे पड़े हैं। अपना तो दिमाक ही ना है। दिल्ली सहर है ना। पता न कां कां से आकै बसे पड़े हैं। सबके अपने अपने बहम हैं।
मा.ग्रा.: हम्म्.... घुड़चाल है भाई बस।
बू.ना.: उप्पर सै इन बाबाओं ने मार रक्खे हैं ना। ये अर वो, अर वो अर वो। इतने पकड़े जां हैं ये रोज डेली, फिर भी लोग मेरे सुसरे लम्बी लाइन लगा के पहुचन्गे।
माँ.ग्रा.: हाहाह.... अब भी तो फसा था कोई बाबा अभी कुछ दिन पहले। 4 6 लड़के लड़की घर में बंद कर रखे थे। कुकर्म करता था।
ज.ना.: ये बहन के लकड़बघ्घे साले। पैसे कमा रे हैं दबा कै। और लोग भी तो भेंचो घर मैं माँ बाप कू एक गिलास पानी न पियायेंगे उठ कै। और इन कै साला के पैर धो धो के पियेंगे।
मा.ग्रा.: सब मन की शांति तलाश रहे हैं भाई।
बू.ना.: अजी बहमबाजी है बस। काम करो अपना ईमानदारी से। बहोत है बस।
मा.ग्रा.: बिलकुल। देखना बाहर ज़रा.... लोग कहते हैं काम नहीं है।भरे पड़े हैं बाज़ार, रातों रात चल रहीं हैं दुकानें।
बू.ना.: क्या करे जी आम आदमी भी। त्यौहार है मना थोड़ी किया जा है।
ज.ना.: ट्च...... खर्चा तो करना ही पड़ेगा ना। अब बच्चे ए क्या मना कर देंगे। मन मार कै करना पड़े पर करना तो पड़ेगा।
मा.ग्रा.: नहीं भाई मना थोड़े ही किया जाता है, फिर अपनी भी तो आत्मा दुखती है साली। लोग कहते हैं महंगाई बढ़ रही है.... क्या कर सकता है फिर आम आदमी। खर्चे थोड़े ही रुक जाएंगे। खाना तो पड़ेगा ही ना।
बू.ना.: होर का मुंह थोड़ी रुक रा है। पेट का का करैं? रांड गांड कां माने है। अब त्यौहार बगैरा है खाना पीना है। ओ तो सब करना ही पड़े है।
मा.ग्रा.: ट्च ट्च...... शेव भी बना ही देते फिर साथ ही अभी। सुबहा फिर आना पड़ेगा नहीं तो।
बू.ना.: सेव?? चलो।
मा.ग्रा.: सिंगल हाथ लगाना।
बु. ना.: ह्म्म... हाँ आपके तो एक ही लगाऊं हूँ कोट हमेसा।
मा.ग्रा.: हां वो दाने से निकल आते हैं नहीं तो चेहरे पर।
बू.ना.: अब वा लगे भी तो सीधा खाल ई पै है, कोइ अच्छी बात थोढ़यी है।
मा.ग्रा.: ह्म्म...
बू.ना.: करीम लगा देऊ या फोम?
मा.ग्रा.: फ़ोम लगा दो।
बू.ना: कां धरी फोम?
ज.ना. न ना है, खतम हो ली।
बू.ना.: हैं??
ज.ना.: खतम.....
मा.ग्रा.: कोई बात नहीं, क्रीम लगा दो फिर।
ज.ना.: चाचा, तुम परै कु होओ। मैं बनाऊ लाओ फटाफट।
बू.ना.: ऐ मैं बनाये दे हूँ, दूई मिनट मैं यार।
ज.ना.: अरै..... चलो बना लो।
[जवान नाई दुकान का सामान ठीक करने लगता है, इतने में एक जवान लड़का 'जज़बात' जो की बूढ़े नाई का बेटा है, दुकान में आकर बैठ जाता है।]
(जज़बात का प्रवेश)
बू.ना.: अरै.... घर ना गया? इंगै कूं आ गया, अर चाची बाट देख री होगी तेरी।
[जज़बात चुप रहता है।]
ज.ना.: कोई बात ना, अब अपनी गैल ही ले जाना इसै भी,(जज़बात से)और भैया तेरा ठीक चल रा है सब ट्रेनिंग ट्रूनिंग.... पाल्लर देखा कोई?
[जज़बात फिर कुछ नहीं कहता है।]
बू.ना.: रै कैसे बुत बना बैठा है? जवाब कूं ना दे रा?
[जज़बात रोने लगता है।]
ज.ना.: अरै... रो क्यूं रा है लाला??
बू.ना.: रो रा है??
[बूढा नाई ग्राहक की शेविंग छोड़ कर जज़बात की तरफ़ मुड़ता है।]
बू.ना.: अरै का हो गया भैया रो कूं रा है.. हैं? का हो गया?
[मालिश कराता ग्राहक भी पलट कर देखता है, फिर वापस मुड़ जाता है।]
ज.ना.: कहा हो गया बता भी तो सही कुछ?
मा.ग्रा.: आपका लड़का है क्या?
बू.ना.: हैं... हाँ हाँ। (जज़बात से) बोल भयी कैसे टसूंअन नै बहा रा है?
जज़: (रोते हुए) अब्बा गल्ती हो गई अब्बा... माफ़ कर दो.
बू.ना: माप कर दो... किसलिया माप कर दूं भैया.. का करियाया? हैं?
जज़: माफ़ कर दो अब्बा... गल्ती हो गई. माफ़ कर दो..
बू.ना.: अरै... कुछ हुआ भी? कुछ हमैं बताएगा अके नू ही रोए जाएगा।
जज़: ना... मैं ना, तुम मारोगे... माफ़ कर देओ अब्बा.. गल्ती हो गई।
बू.ना: कूं मारुंगा भैया... मेरे का स्वान (स्वप्न) आ रें हैं... हैं??? कोई बात हो चीत हो कुछ हो तो हम बतावें भी तुझै, अर का हो गा नू बता?
जज़: नई तुम मारोगे।
बू.ना: लै भेंचो... तू ना मानै ऐसै.. ऐ लै..
[बूढा नाई जज़बात को पीट्ने लगता है, जवान नाई उसे रोक लेता है। ग्राहक पलट कर खड़ा हो जाता है।]
ज.ना.: ऐ चाचा बस करो, कहा कर रे हो, तुमने भी छेत गेरा लौंडा.... जवान लौंडा पे हाथ छोड़ रे हो।
बू.ना.: ऐ.... मेरा सुसरा मान ही ना रा.... पीटोगे पीटोगे, अरै हम कोई बावली तरेड़ हैं जो पिटेंगे इसै बिना बात।
मा.ग्रा.: नहीं नहीं मारो मत जी.. कोई बात नहीं प्यार से पुछ लो।
बु.ना.: इतनी बार कह दई बता बता... मान ही ना रा।
मा.ग्रा.: आप यहाँ आ जाओ कोई बात नहीं।
[बूढ़ा नाई वापस ग्राहक की शेविंग करने लगता है। जज़बात अब भी रो रहा है।]
बू.ना.: मेरे सुसरे बोलेगा कुछ।
ज.ना.: ऐ चाचा तुम चुप रहो, मैं पूछता हूँ। (जज़बात से) ओए लौंडा, मुझे बता क्या हुआ?
जज़: हम्म... अब्बा मारेंगें।
[जवान नाई उठ जाता है, बूढ़ा नाई उस्तरा लेकर जज़बात की तरफ़ आगे बढ़ता है।]
बू.ना.: तू ना माने भैंचो, मैं बता रा हूँ तेरै उस्तरा फिरा दूंगा साले।
ज.ना.: (बूढ़े नाई को इशारे से पीछे हटने को कहता है) अरै कुछ न कहैं तू बता, हम बैठेऐ यहाँ। क्या हुआ बता। बोल।
बू.ना.: बता बता...
मा.ग्रा.: हाँ बताओ बताओ...
ज.ना.: बोलअ।
जज़: वो... अब्बा वो.... अब्बा वो अजाद ना।
बू.ना.: हुंह??
जज़: अब्बा वो अजाद है ना... वो अब्बा अल्ला कू प्यारा हो गया।
बू.ना.: अक्... उंम्मम हैं!! अल्ला कू प्यारा होगा... कैसै???
ज.ना.: कहा कै रा है??
जज़: (रोते हुए) हुँह्ह्ह्ह्ह्... अब्बा माफ कर दो चाचा।
बू.ना: कैसै?
जज़: (जवान नाईं से) मर गया वो।
बू.ना.: अरै जो हम पूछ रे वा बता तू भैंचो.... कैसै कैसै???
जज़: अब्बा वो मेरी बेहस होगीई उससै... तो मैंने.... उसके उस्तरा फिरा दिया।
[बूढ़ा नाई ये सुनकर पागल सा हो जाता है और चीख़ते चिल्लाते हुए जज़बात को पीटने लगता है।]
बू.ना.: का कै... भैंचो कुत्ता, तेरी ऐसी की तैसी साले... तुझे मैं खतम कर दूंगा साले आज... तू ना बचै भैंचो।
[बूढ़े नाई को ऐसे विकराल रूप में देख कर ग्राहक और जवान नाई घबरा जाते हैं और उसे आगे बढ़कर रोक लेते हैं।]
बू.ना.: अरै छोड़, इसै ना छोड़ूं आज...... छोड़ दे... अर नी तू भी कटेगा इसकी गैल।
ज.ना.: (पीछे हटते हुए) चाचा कोई ना बालक है चाचा...चाचा एक ही लौंडा है।
मा.ग्रा.: (घबराते हुए) नहीं नहीं.... देखिये आप कोई गलत कदम मत उठाइये.... समझिये! मामला और संगीन हो जाएगा, बात हाथ से निकल जाएगी। सुनिए मेरी बात।
[मालिश वाला ग्राहक बूढ़े नाई को कुर्सी पर बैठाता है। उसके आधे चहरे पर शेविंग फोम लगी है।]
बू.ना.: (रोते हुए) हाए रै.... पुरे खानदान का नाम मट्टी कर दिया इस हराम के जने नै... हमै तो शुरू सैई पता हा, या सुसरा। अरै जिस आदमी नै इसे चाकरी दई, अपनी दूकान पै लगाया, आज इस कमीन के जाम नै उसी का हलक बुचक दिया। या भैंचो L.E.D बलफन की तस्करी करता हा अर यहाँ दूकान सै झूठी बिलेटन्नै (ब्लेड) चुरा कै बेचा करु था। अरै इसकी अम्मीऐ का कहूँआ अब। का सिकल दिखाऊंआ मौहल्ले मैं। इतने साल महनत मस्सकत कर कै थोड़ी इज्जत कमाई ही इस बुड्ढे नै, वा भीऐ खा गा हराम का जना। साले ऐसी का कमी रह गई ही हमारी परवरिस मैं जो इसै काण्ड ऐ करियाया तू कुत्ते के बच्चा? बोल।
ज.ना.: अरै बोल यार।
मा.ग्रा.: बताओ भई...
बू.ना.: बोले है, अर नी निकालूं चप्पल।
[जज़बात अब भी रो रहा है। कुछ देर बाद मालिश कराता ग्राहक उठ कर जज़बात के पास जाता है।]
मा.ग्रा.: देखो बेटा, इधर देखो, आखिर क्यूँ? ऐसी क्या वजह थी जो तुमने... तुम्हे यह कदम उठाना पड़ा?
जज़: (गर्दन से ना का इशारा करते हुए) अब्बा मरेंगे।
बू.ना.: तेरी.....
[बूढ़ा नाई उठकर अपनी चप्पल निकालता है और जज़बात को चप्पल से पीटने लगता है।]
बू.ना.: (चप्पल को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए) बता अब.... बता। कुंक्कर उस भले आदमी की जान लई तैने। बोल।
जज़: अब्बा वो..... रुख़सार है ना।
बू.ना.: वा उसकी खाला की छोरी वा?
जज़: अब्बा वो ना... वो..
बू.ना.: बोल कुत्ते की औलाद।
जज़: अब्बा वो रुख़सार है ना वो पेट से हो गई है।
बू.ना.: भैंचो कुत्ता...
[बूढ़े नाई को जैसे शॉक सा लगता है, वो जज़बात का कॉलर छोड़ता है और चुपचाप जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है। कुछ देर का मौन।]
(चाय वाले का प्रवेश।)
चा.वा.: आज तो भैया महफ़िल जम रईये दीखै। ला गिलास पकड़ा दीजो मेरा। (शांति) कैसे चुप बैठे हो भई। चाचा? क्या हुआ कोईसा मर गया के?
ज.ना.: अरे ना कुछ ना है... यूँ ही बस देर हो री है ना, निकल ही रऐ हम भी बस।
चा.वा.: अच्छा भैया, पच सी न रई बात। और ये जजबात रो क्यों रा है?
ज.ना.: र..र.. रो रा है? कहाँ? (जज़बात की तरफ जाते हुए) अरै क्यों रो है भाईया, कहा हो गया?
[जज़बात अपने आंसू पोंछते हुए, कुछ ना होने का इशारा करता है।]
ज.ना.: कुछ ना हुआ, नू ई परेशान हो रा है तू तो... कुछ ना ऐ। इसे...इसे फ़िल्म ऐ देख के रो रा होगा... अच्छी फिलम है या काफी बढ़िया जुगत की फिलम है।
चा.वा.: अच्छा... हम्म। जादा जजबाती होना भी ठीक ना होता जजबात। अच्छा चलूँ हूँ।
ज.ना.: अच्छा भैया राम राम।
चा.वा.: हाँ हाँ जा इ रा हूँ.... भगा सा रा है तू तो यार हमैं।
ज.ना.: हाहा ऐ..... ना ना ऐसा ना भैया। वो तो दूकान बढ़ानी ही ना, इस मारै....
चा.वा.: हाँ हाँ.... अच्छा...राम राम चाचा।
[चाय वाले का प्रस्थान। कुछ पल का मौन जिसके तुरंत बाद बुढ़ा नाई एकदम से बोल पड़ता है।]
बू.ना.: (चप्पल जज़बात की ओर फेंकता है) इसनै हमारे सुसरे ने जीवन नस्ट कर दिया। भैंचो ऐसी पता ना का आग लग रही है बेटिचो... गांड की जेल सुखी ना है इस्क मोहब्बत करेंगे हरामजादे। वा छोरी के चक्कर मैं खून करियाया साले ऐसा दीवाना हो रा है कुत्ता।
जज़: (चीख़कर) प्यार करूँ मैं उससै..
ज.ना.: चुप बैठे भैंचो.... प्यार करै, प्यार करै ये.. तुझै सरम न याई इसे कांड ऐ करते बखत। अरै अपनी अम्मी अब्बू के बारे मैं तो सोच लेता एक बार कू। साले देख अपने अब्बा कू कैसै रो रा... तुझै कहा लगा हमैं पता ना तेरे कहा धंधे चल रे, बताऊं चाचा कू कहा कहा करै है तू उस राजकुमार गैल रह कै, बताऊं। इसै दुकान ऐ छोड़ कै तू वहां चला गया उस लौंडिया के मारे, हमनै कही कुछ तुझै। यहाँ दुकान सै तू बिलेटननै (ब्लेडों को) चुरा कै बेचै करू था, हमैं कहा पता न है... गांडू पिस्तौल। मेरा हाल दीख ना रा तुझै, तेरी भाभी लक्ष्मी भग्गी ना उस बनिये की गैल। ऐसे ही लक्खनन नै देख देख कै। तुझै साले हमेशा अपने छोटे भाई जैसा माना, देखियो। देखियो इस बुढ्ढे कू, इतनी सालों सू मेरे यहाँ काम कर रा, तूने मेरे सुसरे रेढ पीट दी इसकी। जितनी इज्जत कमाई थी इसने सब मट्टी कर दयी। ऐ मेरा तो कोई हेई ना दुनिया मैं, कौन देखेगा हमारे बाद इस दुकान ए बताइये। चूतिया की चम्मच। ये बनेंगे आशिक़, प्यार करेंगे.... इसका प्यार ना दीखा तुझै। सुधर जा साले, सुधर जा। अब भी टाइम है सुधर जा। अरै इतनी जुगत कर कर या दुकान जमाई... हमारे मरने पै इसै कौन देखेगा... सुधर जा। सुधर जा, अर नी बताऊ...... (खुद को जज़बात को मारने से रोक लेता है)
मा.ग्रा.: देखिये इसे मारने पीटने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। सबसे पहले तो हमें पुलिस को इत्तला करना चाहिए। अच्छा बेटा.. जस जसबीर...जज़बात देखो हमे पुलिस को रिपोर्ट देनी होगी, मुझे बताओ.. जो जो हुआ, जैसे भी, मुझे बताओ कुछ मत छुपाना.. एकदम ठीक ठीक। अगर तुम खुद पुलिस को ख़बर करोगे तो शायद वो ये भी मान जाएं की ये एक हादसा था।
ज.ना.: हाँ हाँ.. बिल्कुल ठीक कह रेऐ भाईसाब। बोल भई लौंडे बता।
बू.ना.: (हाथ जोड़कर) देख लओ मालिक साब अब आप ही बचा सको हो, एक ही छोरा है हमारा तो, संतान भी नाए दूसरी।
ज.ना.: हमबै... बोल भाई .. बता दे भाईसाब कु सब सच्ची सच्ची।
जज़: अब्बा हुआ ये कि मैं और रुकसार वहाँ अजाद कि दुकान में थे और फिर... फिर..
[दुकान कि रौशनी बदलती है। बूढा नाई, जवान नाई और मालिश कराता ग्राहक बाहर जाकर ख़िड़की से झांकने लगते हैं। गाना शुरु होने के साथ ही रुख़सार का प्रवेश। जज़बात और रुख़सार साथ में नाचते हैं, फिर गाने के अंत में गले लग कर कुछ देर खड़े हो जाते हैं। जज़बात रुख़सार को चूमने कि कोशिश करता है।]
रुख़सार: बस अब हम ये नहीं कर सकते।
जज़: अरी क्यूं? क्या हो गया?
रुख़सार: नहीं मेरा मन नही है।
जज़:जज़: क्यूं नहीं है तेरा मन..
रुख़सार: मैंने कहा ना मेरा मन नहीं है।
जज़: मेरी जान, ऐसे कैसे नही है तेरा मन आज, क्या बात है?
रुख़सार: अरे नहीं है। अच्छा सुनो मुझे तुमसे कुछ ज़रुरी बात करनी है।
जज़: मैं समझ गया.... तू मेरे लिया वो लैदर कि जैकिट लाई है ना.. लाल रंग की।
रुख़सार: ओहो.. बहुत समझदार है ना तू, मोटे दिमाग़ के।
जज़: अरी समझदार तो तेरा जज़बात बचपन से है। याद है उस दिन तेरे अब्बु से बचाके तुझे कैसे राजकुमार भाई के रूम पे लेके गया था। और वहां पे...
रुख़सार: अच्छा छोड़ मुझे, बोल रही हूँ ना मन नहीं है।
[ रुख़सार आगे जाति है। जज़बात पिछे आकर कस कर रुख़सार को पकड़ लेता है।]
रुख़सार: म्म्म.. छोड़। छोड़ दे, देख मत कर, मर जाएगा..
जज़: कौन मर जाएगा?
रुख़सार: हमारा बच्चा...
जज़: वो तो निक़ाह के बाद आएगा ना जान
रुख़सार: निक़ाह से पहले ही आ गया। छोड़ मुझे।
जज़: वो कैसे?
रुख़सार: जो उस राजकुमार चोर के घर पे आपने बहादुरी दिखाई थी ना, ये उसी बहादुरी का नतिजा है।
जज़: ट्च.. क्या कह री है....
रुख़सार: अबे... मेरे महिने नहीं आए। मैं मां बनने वाली हूँ।
जज़: हैं....किसके बच्चे की??
रुख़सार: अबे चूतिये तेरे बच्चे की।
जज़: मेरे बच्चे कि.... अजी घंटा मेरे बच्चे कि।
रुख़सार: तेरा बच्चा नहीं है ये?
जज़: No
रुख़सार: तेर बच्चा नहीं है ये??
जज़: Never
[रुख़सार बुरी तरह बिलख कर रोने लगती है।]
रुख़सार: हाय अल्ला मेरी तो ज़िंदगी बरबाद हो गई। अब मैं क्या करुंगी इस बच्चे के साथ, हाय अल्ला... हाय रुख़सार तुझे तो कुछ करना भी नहीं आता। क्या करेगी अब... हाय... महंदी लगाउंगी।गाउंगी। अब्बा को पता चलेगा वो तो घर से निकाल देगा।देगा। अब तु क्या करेगी रुख़सार.. रुखसार। तू ये बच्चा नहीं रख सकती। तू ये बच्चा गिरा दे। हाँ... (जज़बात से) मैं जा रही हूँ ये बच्चा गिराने। जा रही हूँ। मर गई तेरी रुख़सार भैन के लौड़े।
[रुख़सार जाने लगती है। जज़बात उसे आवाज़ लगा कर रोकने के लिए आगे बढता है।]
जज़: नहीं रुखसार रुको ।
रुख़सार: पास मत आ जइये मेरे, जूती निकाल के मारुंगी चुतिये। चला जा दूर.. भाग। हट कुत्ते, हट। दूर जा... छोड़ मुझे छोड़।
जज़: (ख़ुशी से) ये हमारा बच्चा है रुखसार सच में.. अपना बच्चा रुखसार.. मुझे माफ कर दे, प्लीज़। प्लीज़ आइ सौरी। रुख़सार बेग़म, मैं इस बच्चे को दुनिया कि सारी खुशियां लाके दुंगा रुखसार।। महंगे से महंगा स्कूल, महंगे से महंगा कौलेज, महंगे से महंगी युनीवर्सिटि.. मैं उसे पढाउंगा रुखसार।। हमारे बच्चे को मैं अपना नाम दुंगा रुखसार, मैं अपना नाम।। मैं इसे किसी चीज़ कि कमी नहीं होने दुंगा। कपड़े लत्ते खिलौने सब मैं लाके इसके क़दमों मे रख दुंगा रुखसार।। मैं अपने बाप तय्यब अली जैसा नहीं बनुंगा, दरबदर इसे गलियों में नहीं भटकने दुंगा। मैं इसे बहुत बढ़िया तालीम दुंगा। हमारा बच्चा एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा जिसके कदमों में सारी दुनिया सर झुकाएगी रुखसार बेग़म। (शुन्य में इशारा करते हुए) वो देख, हमारा बच्चा, उसे तू पैदल चलना सिखा रही है... पाइ पाइ, पाइ पाइ.. और वो वहाँ स्कूल का गेट। हमारे बच्चे का आज स्कूल का पहला दिन, कितना प्यारा लग रहा है ना रुखसार। और वो वहाँ देख उसके दादू उसे बाल काटना सिखा रहे हैं। कितना अच्छा होगा सब रुखसार.... और हाँ हम अपने बच्चे का नाम मुसकिल रखेंगे।
रुख़सार: मुसकिल?? वो क्यूं?
जज़: ज़माने कि मुसकिलों से जो लड़़ कर पैदा होगा.. उसे मुसकिल कहेंगे रुखसार।
रुख़सार: तो फिर कर ले ना अपने अब्बू से बात।
जज़: अरे अब्बू से तो मैं आज ही बात कर लूं पर तेरे उस भइया अज़ाद का क्या करें...
[दरवाज़े पर दस्तक होती है। और दुकान के बाहर से आज़ाद कि आवाज़ सुनाई पड़़ती है।]
आज़ाद कि आवाज़: अबे खोल कुत्ते क्या कर रहा है, खोल, हरामज़ादे।
रुख़सार: अरे... अज़ाद आ गया। भाग, ये मेरे अब्बू को बता देगा। छोड़ मुझे..
[रुख़सार दरवाज़ा खोल कर भाग जाती है। प्रकाश वापस बदल जाता है। बूढा नाई, जवान नाई और मालिश कराता ग्राहक भीतर आ जाते हैं।]
ज.ना: कौन हा?
जज़: अब्बा फिर वो अज़ाद अब्बा वो दुकान के अंदर घुसियाया और मुझ पर चढने लगा, मारने लगा। तो मैंने उस्तरा उठा के उसकी गर्दन पे फिरा दिया अब्बा और फिर मैं भगियाया।
बू.ना.: भागियाया.... हराम के चोदे। उसै बेचारे कु बुचक कै वहीं छोड़ीयाया ल्हास ऐ। कुत्ते के बीज तुझे सरम न याई और अब न्यू बता रा अक् जैसे का दिलेरी का काम किया हो। मरदूद के बच्चा।
ज.ना.: ऐ चाचा तुम सांस ले लओ थोड़ी देर, सांत भी बैठ जाओ कदि तुम्हारी भी ऐ घँटी बोल पड़े। यहाँ पहले ही इसका निपटारा न हो रा।
[बूढ़े नाई के फ़ोन की घँटी बजती है।]
बू.ना.: हैलो... हाँ हाँ यही है वा... हैं?? ना कुछ ना हुआ.... कुछ न हुआ एसई घराक बैठे दूई एक...( गला रुंध जाता है) आ रे बस थोड़ी देर में......न ना खाना... हाँ। हाँ।
ज.ना.: चाची का फोन हा?
बू.ना: हम्ब्...
ज.ना.: एक काम करो चाचा तुम जाओ चाची धोरै... हम देख लें यहाँ।
बू.ना.: हरै... कैसै चला जाऊ भाई.... कैसै? इसनै कपुते ने इंतजाम कर राखा हमारा। एक तो सबसै पहला उस बेचारे भले मानस किए ल्हास का ठिकाना करो। वहाँ पता ना कैसै लावारिस छोड़ कै आया जन कैसै। उसै ढंग से डिपाओ दफनाओ, उसकी जनाजे कीए नमाज कराओ।
ज.ना.: (सांत्वना देते हुए) हां हां... कराएंगे चाचा नमाज कराएंगे।
मा.ग्रा.: देखिये आप मानिए मेरी बात हमें पुलिस को खबर कर देनी चाहिए।
जज़: नहीं अब्बा.... पुलिस नी...
बू.ना.: अरे ना मालिक साब, भोत छोटे यादमी हम। पुलिस कां...
ज.ना.: हम्बे.. भाईसाब और कोइसा तरीका अगर... देखियो लौंडा पिस जाएगा जीवन भर कू जेल मैं हमारा अर नी।
मा.ग्रा.: फिर तो जी मुझे सिर्फ़ एक ही रास्ता दिखाई दे रहा है।
ज.ना.: जी... जी..
बू.ना.: मालिक..
मा.ग्रा.: हमें उस लाश को ठिकाने लगाना होगा।
ज.ना.: ठिकाने??
मा.ग्रा.: हम्म... पर पहले मुझे सबकुछ पूरी तरह से जानना पड़ेगा। अच्छा ये बताइये वो दुकान दिखने में कैसी है? मतलब कितनी बड़ी या छोटी, अंदाज़न???
बू.ना.: ऐसयी इत्ती ही बड़ी है हूबहू...
ज.ना.: इसी कै नक्शे पै बनाई उसनै।
मा.ग्रा: अच्छा... बेटे इधर सुनो। अब जो जो मैं पूछ रहा हूं उसका जवाब देते जाना सच सच। तुमने उसे कहाँ पर...
जज़: (गर्दन पर इशारा करते हुए) यहाँ पे....
मा.ग्रा: नहीं नहीं... मेरा मतलब दुकान में किस जगह पर..
बू.ना.: कां बुचक दिया उसे, यूं बता मेरे सुसरे।
मा.ग्रा.: हाँ मतलब उसके दुकान में आने के बाद क्या हुआ?
जज़: जैसे ही आजाद आया तो रुकसार डर के फटाफट बाहर चली गई, फिर आजाद भाई अंदर आया और वो मुझे मारने लग गया। उसने मेरा गिलबान पकड़ लिया, मैंने बहुत बोली उससे पर वो माना नहीं, मुझे गुस्सा आ रहा था तो मैंने उस्तरा उठाया और उसके मार दिया।
बू.ना.: बाप के चोदे....
मा.ग्रा: बस बस यहीं यहीं रोको हाथ को.. तुमने उसको यहां मारा... (जवान नाई से) जी आप यहाँ आइये..
ज.ना.: मैं???
मा.ग्रा.: यहां खड़े होईए, आइये तो।
ज.ना.: जी भाईसाब... मैं... मुझे न आवै एक्टिंग उकटिंग।
मा.ग्रा.: यहाँ सिर्फ खड़े होना है। फ़र्ज़ कीजिए आप आज़ाद हैं।
ज.ना.: (डर कर) मैं... ना जी मैं तो हसीन मलिक हूँ...
मा.ग्रा.: आइये तो... (जज़बात से) हाँ तो बेटा तुमने उस्तरा चलाया.... चलाओ!
[ जवान नाई जज़बात का गिरेबान पकड़े, आज़ाद बने खड़ा है। जज़बात उसके गले पर उस्तरा चलाने का अभिनय करता है। आगे समझ ना आने पर दोनों नाई और जज़बात सवालिया निगाह से मालिश कराते ग्राहक की तरफ देखते हैं। कुछ पल शांत खड़े रहने के बाद, जवान नाई मरने का अभिनय करता हुआ पीछे की तरफ़ गिरने का अभिनय करता है।]
मा.ग्रा.: नहीं नहीं जी... ऐसे नहीं। फ़िज़िक्स(physics) के हिसाब से गर्दन पे छुरी लगने पर आदमी पीछे नहीं आगे की तरफ़ गिरेगा (बताते हुए ज़मीन पर लेट जाता है) कुछ इस तरह। (उठकर) दोबारा कीजिए।
[जवान नाई फिर जज़बात का गिरेबान पकड़ता है। जज़बात उस्तरा चलाने का अभिनय करता है। इस बार जवान नाई आगे की तरफ सर करके लेट जाता है।]
मा.ग्रा.: बिलकुल ठीक। अच्छा इस आज़ाद की कद काठी कैसी है... मतलब थी। मतलब लाश की हाइट कितनी है?
बू.ना.: ए 6 फुटा खूब लंबा चौड़ा, हट्टा कट्टा.. विनोद खन्ना सा दीखे है.. था।
मा.ग्रा.: हम्म... अमूमन एक 6 फूटे नार्मल आदमी के अंदर 4-5 किलो ख़ून होता है। तो मतलब जहाँ वो कटा पड़ा है वहाँ.. कम से कम इतनी दूर तक ख़ून फैल गया होगा। (जवान नाई के सर के पास पैर से गोलाकार बनाकर दिखाता है।)
ज.ना.: खून....
मा.ग्रा.: हम्म... अगर ख़ून मिलेगा तो गुमशुदगी की संभावना खत्म हो जाएगी।
बू.ना.: अच्छा.. हाँ हाँ... तो मालिक दुई बाल्टी पानी मारियाएँगे झाड़ू सै।
मा.ग्रा.: नहीं जी... धुलने के बाद भी ख़ून का पता चल जाता है। देखा है मैंने एक अंग्रेजी नाटक में। ब्रेकिंग बैड(breaking bad)। प ानी से नहीं उससे धोना पड़ेगा। वो क्या इस्तेमाल करते हैं... अम्म... हाँ हाइड्रोजन पेरोक्साइड (hydrogen peroxide) वो इस्तेमाल करते हैं ख़ून साफ़ करने के लिए।
बू.ना.: परसाई... ऊ का...
मा.ग्रा.: ब्लीच ब्लीच..
ज.ना.: अरै वो तो बहौत पड़ी दुकान मैं, (जज़बात से) निकाल भई लौंडे, सारीए निकाल लै डिब्बियननै।
मा.ग्रा.: ये नहीं, सर्फ़ भी चलेगा। पूरी दुकान को हमें अच्छी तरह धोना पड़ेगा।
जज़: और अंकल उंगलियों के निशान, वो भी सफा करने पड़ेंगे।
मा.ग्रा.: न ना... तुम उसी दुकान में काम करते हो, तुम्हारे निशान होने बनते हैं।
ज.ना.: ऐ तू चुप खड़ा रै करमचंद, बकचोदी के फारम मत न भरै।
मा.ग्रा.: कोई बात नहीं... हमें एक गाड़ी की ज़रूरत भी पड़ेगी लाश उठाने के लिए, फिर उसे जला देंगे.….. दफ़न कर देंगे। गाड़ी चाहिए..
ज.ना.: चाचा..
बू.ना.: हम्बे…. एक ली ही जी या, सेकण्ड हैंड मारुति सी... वायी है।
मा.ग्रा.: नही नहीं आपकी नहीं तफ़्तीश हुई तो सबसे पहले आप लोगों की ही गाड़ी चैक होगी। कुछ और...
ज.ना.: टैम्पू???
मा.ग्रा.: हाँ... टेम्पो। पब्लिक व्हीकल (public vehicle) है, शक़ नहीं होगा। पर बन्दा अपना होना चाहिए, भरोसेमंद।
ज.ना.: हम्बै... अपना ही है लौंडा। टैम्पू है उसीका।
मा.ग्रा.: हाँ तो बुला लीजिए।
ज.ना.: हाँ हाँ... चाचा मेरी जेब में से फोन मारियो अज़हर कू फटाफट।
[बूढ़ा नाई जवान नाई की जेब से फ़ोन निकालने लगता है।]
मा.ग्रा.: अरे अब उठ जाओ भई, क्यूँ लेटे हो। फ़ोन मिलाओ।
ज.ना.: अच्छा.. (फ़ोन मिलाता है फिर अचानक मुड़कर) चाचा अपना फोन दिखाइयो... टच्.… इधर कू दो।
[जवान नाई फ़ोन लगाते हुए बाहर जाता है।]
मा.ग्रा.: बेटे तुम्हें वहाँ से भागते हुए तो किसी ने नहीं देखा था।
जज़: नहीं... भोत दूर से एक सब्जी वाला जा रा था बस।
मा.ग्रा.: क्या बेच रहा था?
जज़: सब्जी।
मा.ग्रा.: कौनसी?
जज़: सब्जी..
मा.ग्रा.: ओहो... (बूढ़े नाई से) उस सब्ज़ी वाले को भी ढूंढना पड़ेगा।
[जवान नाई अंदर आता है]
ज.ना.: फोन ना लग रा।
जज़: अब??
[बूढ़ा नाई रोने लगता है।]
बू.ना.: अब तू जाएगा भैया भीतर..
मा.ग्रा.: कोई और टेम्पो नहीं है क्या?
बू.ना.: ना ना... अब कोई जरूरत ना है टम्पू फम्पू की.… अब ना हो सकै कुछ भी। पता ना का हो गा यू।जीवन नस्ट हो गा। ओ भैया उसै डिपाने का इंतजाम करो बिचारे कू, अर नी दोज़ख मैं जांगे सारे। ऐसी अधूरी मौत मरन वाले जिन्द जिन्नात बन जाए करे हैं... ढंग से मापी ना करी तो पीछे हो लेगी। पूरे ए कुनबाए खत्म कर सकै.. तुम के जान रे हो। अतृप्त होवे हैं। का पता अभी रस्ते मैं जाते जाते ही खतम कर दे, अर यु भी हो सकै है अक् यहीं दूकान मैं ही बड़ियाये।
ज.ना.: यहाँ दूकान मैं?
[दूकान की खिड़क़ी पर दस्तक होती है और एक चेहरा नज़र आता है। जिसे देख कर सब डर जाते हैं और इधर उधर भागकर छुपने लगते हैँ।]
जज़: ये तो आज़ाद है।
ज.ना.: आजाद न है भूत है... भूत.... भूत।
[आज़ाद दूकान अंदर आता है। बूढ़ा नाई कुर्सी पर बैठा है और डरते हुए उससे माफ़ी मांगता है।]
बू.ना.: अरै भईया इसकी तरफ सै हम मापी मांग रए, माप कर दे छोरे कु, हमें न चइये भूत ब्याल का चक्कर माप कर दे भाई। माप कर दे ओ भूत भईया बखस दे।
आजाद: भूत। कहाँ रया भूत?
बू.ना.: यु रहया.... मतबल तू रहया। तू।
आज़ाद: मैं?
बू.ना.: होर.... तु भूत ना है?
आज़ाद: रै चाचा... तुम भी कमाल करो हो, मैं भूत लग रा सूं थमै? उसै छोड़ो बात कु, मैं न्यू कहन आया सु इशे जजबात कू शिंभाल के रख लो। अर नई फेर मैं शमझा दूंगा इशे अच्छी ढाल लमदे कू।
बू.ना.: क्क्क्क्..कूँ?? का हुआ??
आज़ाद: रुख़शार से घना चिपकता रहे करै है ये आजकल। इतनी मुश्किल सै ईब जाके रिश्ता हुआ सै उसकी गैल, खाला न्यू भी कितनी सख़्त है थम जानो हो पहला ही। इश्ते कहदो दूर रहेगा।
बू.ना.: हम्म्..
आज़ाद: और आज भी छेड़ रा था पता ना क्या कर रा हा... वो तो मैं शही टाइम पै पहुँच गया। और मैंने रोकी ते उशतरा तै मेरे यहाँ काट दिया देखियो(गर्दन पर मामूली सा घाव दिखता है).... ऐशे करै सै कोई बताइयो। जादा तेज लग जाटी ते मैं ते टैं बोल जाता ना। ओ ते थारी सरम के मारे मैं इश्ते कुछ बोलूं ना सू अर नी पुल्श भी आ सकै। (जाते हुए दरवाज़े से पलटकर जज़बात से) और शुन अबसे दूकान पै आने की जरुरत ना, दुकान के वहाँ उश तरफ आने जाने की कोई जरूरत ही ना है। तेरा हिशाब किताब मैं यहीं कर जाऊंगा चाचा तै। अच्छा चाचा राम राम हमारी ते।
[आज़ाद का प्रस्थान। मौन।सब एक दूजे को देखते हैँ।]
बू.ना.: (जज़बात से) ओए तू निकल चल.. अपनी चाची धोरे पहुँच। जल्दी.... 5 मिनट मैं पहुंच। निकल।
(जज़बात का प्रस्थान)
मा.ग्रा.: अच्छा जी मैं भी चलता ही हूँ फिर।
[मालिश वाले ग्राहक का प्रस्थान। जवान नाई और बूढ़ा नाईं एक दूजे को देखते हैं फिर नज़रे चुरा लेते हैँ। जवान नाई कुर्सी की तरफ देखता है फिर बैठते हुए बोलता है।]
ज.ना.: चाचा। चाचा.... इधर कु आओ। ये बाल जरा थोड़े थोड़े हलके कर दियो नीचे से। ट्रिम से कर दो।
बू.ना.: हैं.... हाँ।
[बूढ़ा नाईं टेबल पर से कैंची कंघी उठाकर जवान नाई के बाल काटने लगता है।]
[ कुछ देर बाद एक बेकाबू ट्रक के आने की आवाज़। तेज़ प्रकाश आता है और एकदम से चला जाता है। दुर्घटना की आवाज़।]
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