Ujiyara

उजियारा

(नाटककार एलेक्स ब्रॉउन के first fireworks पर आधारित)          हिंदी अनुवाद एवं रूपांतरण अनन्त गौड़


शानवी: अम्मा... अम्मा, अम्मा.....(आवाज़ लगाते हुए) यहाँ बैठी हो? कुछ अंदाज़ा है सब कितने परेशान हैं... पापा जी ने पूरा हॉस्पिटल सर पर उठा रखा है। 
सीमा: हम्म... उन्हें कुछ नहीं होगा। ठीक हैं वो।
शानवी: हाँ...  आपको तो सब पता है ना। हम सब पर क्या बीत रही है वहाँ.... ऐसी हालत में.... ये कोई तरीका होता है। कमसगम बता कर तो भागना चाहिए।
सीमा: बता कर भागने में क्या मज़ा।
शानवी: मज़ाक नहीं है ये। पापा जी वहाँ पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट कराने चले गए हैं। चलिए... इससे पहले बात और बढ़ जाए। अरे, चलिए...
सीमा: चलेंगें थोड़ी देर में। शरू होने वाला है, देख कर चलेंगे।
शानवी: देखना वेखना कुछ नहीं, इतनी ठंड हो रही है यहाँ, चलिए आप चुप चाप। चलो।
सीमा: थोड़ी देर की बात है बस, रुक जा। यहाँ बैठ जा.. आ।
शानवी: अम्मा...
सीमा: तू जा अग़र जाना है तो... मैं देख कर आउंगी। (मौन) आ जा, यहाँ आ जा (बैठने का इशारा करते हुए)।
(शानवी बैठती है, कुछ देर का मौन)
शानवी: इतनी जगह है ये, पता नहीं लोग क्यों नहीं आते यहाँ?
सीमा: क्योंकि किसी को पता ही नहीं है ना कि ये छोटे वाले रास्ते की जाली टूटी पड़ी है, अब इतना घूम कर कौन चढ़कर आये उप्पर।
शानवी: हाँ सच में, मेरे तो पैर टूट गए। भगवान का घर ही है ये, इतना ऊपर। आप कैसे आ गईं?
सीमा: पता नहीं।
शानवी: बताओ?
सीमा: क्या बताऊँ.... आ गई बस।
शानवी: ह्म्म...
सीमा: तुझे कैसे पता मैं यहां हूँ?
शानवी: वो.. (कहते कहते चुप हो जाती है।)
सीमा: क्या हुआ.... बता। (शानवी ना में सर हिलाती है) अरे बता दे... बता ना। बोल। 
शानवी: क्या बताऊं... पता चल गया बस।
सीमा: (निराश होकर) मत बता जा। (कुछ देर रुककर) बता ना.... (खांसी का दौरा पड़ता है)।
शानवी: अम्मा...
सीमा: बता
शानवी: new year की रात है, और कहाँ मिलतीं आप। बाक़ी हर जगह देख ही लिया था मैंने। 
सीमा: (हस्ते हुए) हम्म.... मेरी कुर्सी, मेरा नज़ारा/उजियारा.... और तुम भी मेरी। (शानवी को चूमते हुए) मेरा बच्चा।
(मौन)
सीमा: कितना टाइम बीत गया ना?
शानवी:  हम्म 5 साल हो गए। शादी के बाद एक बार भी कहाँ आए।
सीमा: हम्म पांच साल हो गए।
शानवी: याद है, आप जब मुझे यहाँ पहली बार लायीं थी, तब मैं... 8 साल की थी ना. शायद?
सीमा: हम्म..
शानवी: 20 साल.... कमाल है। शाम ढल रही थी और आख़िरी 50 सीढ़ियों पर मेरे पैर दुखने लगे तो आपने मुझे उठाकर अपने कांधों पर बैठा लिया। मैं ज़िद कर रही थी कि हम कहाँ जा रहे हैं, तो आपने कहा कि आज तुझे दुनिया की सबसे सुंदर जगह दिखाउंगी।
सीमा: तुझे सब याद है?
शानवी: हाँ हाँ... और फिर जब अंधेरा छाने लगा तो आपने मेरी आँखों पर हाथ रखा और कहा 10 तक गिनो। और फिर जैसे ही मैंने आँखे खोली तो आसमान में हरा गुलाबी लाल, हर तरह की रौशनी से पूरा आसमान भरा हुआ था। पटाखों की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मैंने अपने कानों पर डर कर हाथ रख लिया था। आह.... वो दिन।
सीमा: ऐसा नज़ारा भूले नहीं भूलता कभी, ख़ासतौर से पहली दफ़ा।
(मौन)
सीमा: हम्म... देखते देखते ही इतनी बड़ी हो गयी तू।(देखकर मुस्कुराते हुए)
शानवी: आप और पापा जी यहाँ कब आए थे पहली बार??
सीमा: कभी नहीं।
शानवी: क्या ?
सीमा: हम्म
शानवी: ओह.... ओह अच्छा। पर ऐसे कैसे ? क्यों?
सीमा: क्योंकि ये तो मेरी जगह है ना बच्चे।
शानवी: पर आप मुझे तो यहाँ ले आई।
सीमा: हाँ... पर तुम तो मैं ही हूँ ना, और  दसरसल, जब हम यहाँ पहली बार आए थे, तब हम दो नहीं एक ही थे।
शानवी: हाहाहा... सच में?
(मौन)
शानवी: क्या आपको अब भी लगता है हम दो नहीं एक हीं हैं?
सीमा: तुझे क्या लगता है? (शानवी चुप रहती है) 
सीमा: कभी कभी, कुछ एक चीज़ें ऐसी होतीं हैं जीवन में, जिन्हें हम सिर्फ़ अपने तक ही रखना चाहते हैं। और ये एहसास मैं अपने तक ही रखना चाहती थी। इसका मतलब ये बिलकुल नहीं है कि मैं तुम्हारे पापा जी से प्यार नहीं करती, न। पर ये एक चीज़ मेरी अपनी है। मेरी जगह... जहाँ, मैं बस मैं हो सकती हूँ। बाक़ी तो 40 साल तुम्हारे पापा जी के साथ बिता ही दिये।
शानवी: हाहाहा... (याद आने पर) अरे, इतनी देर ही गई अम्मा, इन्हें बताकर नहीं आई मैं और पापा जी भी परेशान हो रहे होंगे।
सीमा: अरे छोड़, जलकुकड़ा है वो तो।
शानवी: पापा??
सीमा: अरे नहीं.... तेरा खाविंद ये, क्या नाम है...
शानवी: पता तो सब है आपको, नाटक करना है बस, है ना??
सीमा: अरे नहीं सच में, क्या नाम था? गपन गलेश
शानवी: गिरीश
सीमा: हाँ ग्रीस... एक तो पता नहीं कैसा अजीब सा नाम है, पके फोड़े सा...
शानवी: (हस्ते हुए) अम्मा.…
सीमा: हाह.... अरे मुझे तो वो जो पहले देखने आया था ना, वो ही अच्छा लग रहा था।
शानवी: कौन? अच्छा वो...
सीमा: हाँ हाँ…. क्या नाम था। कितने अच्छे से बात करता था वो मुझसे।
शानवी: (चिढ़ाते हुए) हाँ.… कुछ ज़्यादा ही बात करता था। हमें तो आप ही के चक्कर में लगता था वो। काफ़ी पसंद जो करता था आपको।
सीमा: अरे कहाँ... मैं उसकी दुगनी उमर की हूँ (मुस्कुराते हुए)।
शानवी: हाँ तो क्या हुआ।
सीमा: ये तेरा ग्रीस मुझे किसी की याद दिलाता है।
शानवी: किसकी?
सीमा: मेरे पती की।
शानवी: पापा जी? वो तो कितने अच्छे हैं।
सीमा: 40 साल शादी के गुज़ार के देखो फिर बताना।
(मौन)
शानवी: (उठते हुए) अम्मा... अब हमें वापस चलना चाहिए, सच में।
सीमा: मैं नहीं जा रही।
शानवी: ज़िद मत करो अम्मा, चलो अब।
सीमा: मैं नहीं जाउंगी उस गंदे से कमरे में, उन गंदे लोगों के बीच। दिन भर मुझे परेशान करते रहते हैं। अम्मा क्या चाहिए, अम्मा क्या ला दूं, अम्मा दवाई खा लो। अरे नहीं जाना, नहीं खानी दवाई।
( सीमा हाथ से शानवी को वापस बैठ जाने का इशारा करती है।)
सीमा: सूट तो बहुत सुंदर पहना हुआ है ये तूने। कहाँ से लाई?
शानवी: ये ही लाये हैं। जन्मदिन पर, चलो आपका ग्रीस किसी एक काम तो आ रहा है।
सीमा: (शानवी के पेट पर हाथ लगाते हुए) बच्चे, काम तो वो काफ़ी चीज़ों में आ रहा है।
(मौन)
सीमा: वैसे मुझे पता था कि तुम ज़रूर आ जाओगी। अच्छा हुआ जो तुमने मुझे ढूंढ लिया। साथ में थोड़ा वक़्त ही बीता लेंगे।
शानवी: कितना अच्छा होता पापा जी भी यहाँ होते। आपने ठीक नहीं किया उनके साथ।
सीमा: बेटा मैंने बहुत ज़िम्मेदारी निभा ली। 40 साल बीवी बनके, 30 साल माँ बनके। बस अब हो गया, पल भर बस सांस लेना चाहती हूँ मैं खुद में...
शानवी: अम्मा...
सीमा: आख़िरी बार ये नज़ारा देख लूं, बस फिर शांती से विदा ले लेना चाहती हूँ। अच्छा तुझे एक राज़ की बात बताऊं। 
शानवी: हम्म..
सीमा: ये बात मैंने कभी किसी से नहीँ कही।
शानवी: बताइये, वैसे मुझे पता ही है शायद, पर बताइये।
सीमा: अच्छा, तेरे पापा जी तक को तो बोला नहीं मैंने, तुझे पता है, बता क्या है।
शानवी: अरे भयी आप बताओ न.. शायद कहा मैंने।
सीमा: जब तक तू पैदा नहीं हुई थी ना, मुझे हमेशा से एक बेटा चाहिए था। मेरा प्यारा सा गुड्डा।
शानवी: (हस्ते हुए) ओह अच्छा, तो फिर?
सीमा: फिर क्या? तु आ गई। पर फिर हमें तुझसे प्यार हो गया, जब पहली बार तेरा चेहरा देखा तब ही पता चला कि तेरे सिवा हमें और कोई नहीं चाहिए। मैंने भगवान का शुक्रिया किया कि हमें तुम मिलीं।
सीमा: एक वादा कर मुझसे।
(शानवी सीमा को देखती है।)
सीमा: तु इसको भी लेकर आएगी यहाँ, और हमारे बारे में बताएगी।
शानवी: हम्म
सीमा: कर वादा।
शानवी: हम्म हम्म...
सीमा: हम्म हम्म नहीं, मुँह से बोल, वादा कर।
शानवी: हाँ हाँ अम्मा... वादा करती हूँ।
सीमा: और उसको एक आत्मनिर्भर औरत बनाना। मुझे याद है जब तू पैदा होने वाली थी, तब बस कुछ दिन पहले हम तुझे खोने वाले थे।
शानवी: हाँ हाँ अम्मा, बता चुकी हो आप सौ बार...
सीमा: आधी रात में दर्द से नींद खुली तो देखा, सारे बिस्तर पर ख़ून ही ख़ून। तेरे पापा जी बेचारे किसी तरह मुझे हॉस्पिटल लेकर गए। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया तेरा बचना मुश्किल है, क्योंकि तेरा वज़न बहुत ज़्यादा था। पर मैं तुझे बस किसी तरह बचा लेना चाहती थी।
शानवी: अम्मा !
सीमा: बस समझो भगवान मेरे साथ थे...
सीमा: तेरे पापा जी ना होते तो, नहीं बच पाते हम। पूरी रात मेरा हाथ पकड़े बैठे रहे बेचारे। अगर कुछ हो जाता तो टूट जाते वो, और हमारे सिवा कोई था भी कहाँ उनका। उनका प्यार ही था शायद जिसकी वजह से मैं बच गई।
(मौन)
शानवी: आपको कितनी तकलीफ़ हुई मेरी वजह से।
सीमा: तकलीफ़ कैसी बच्चे, ये तो सुख है बेटा। तुमसे अच्छा  तोहफ़ा और कुछ नहीं दिया जीवन ने मुझे। बाक़ी ये ज़िन्दगी तो मैंने बहुत अच्छी तरह बिताई है, तेरे जैसी प्यारी बेटी मिली, प्यार करने वाले पती मिले। एक परिवार, घर, और बस क्या चाहिए। ख़ुश हूँ मैं।
शानवी: अम्मा, आपकी बहुत याद आएगी।
सीमा: मुझे भी.... एक बात याद रखना, अपने काम में, नौकरी में इतना बिज़ी मत हो जाना कि अच्छी माँ ना बन पाओ। और ग्रीस को तो  भूत बनकर परेशान करूँगी मैं।
(दोनों हँसते हैं)
सीमा: समय बहुत तेज़ भागता है। (शानवी की गोद में सर रखती है) शुरू हो जाए तो मुझे उठाना।
(शानवी लोरी गाती है। कुछ देर बाद आतिशबाज़ी की आवाज़ और रौशनी।)
शानवी: अम्मा... देखो शुरू हो गया। उठो.... अम्मा। (उठाने की कोशिश करती है) अम्मा।
(सीमा नहीं उठती।)
(शानवी आसमान की तरफ़ देखती है और फिर धीरे से गुनगुनाती है।).

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