अग्निपूंज - अद्भुत कर्ण की जीवन गाथा
अग्निपुंज
(अदभुत कर्ण की जीवन गाथा)
नाटककार
परिकल्पना
7 दिसम्बर 2017, रात 12:25
दिल्ली- हैदराबाद- दिल्ली
मुख्य पात्र
कर्ण
कृष्ण
दुर्योधन/ सुयोधन
शकुनि
कुंती
द्रोणाचार्य
अर्जुन
युधिष्ठिर
भीम
भीष्म
धृतराष्ट्र
दु:शासन
पांचाली
द्रुपद
धृष्टधुम्न
भूमिका
इस नाटक की रचना अपने आप में दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि बहुत ही कम नाटकों की तरह इसका लेखन पहले से निर्धारित परिकल्पना के आधार पर हुआ। साथ ही जिन परिस्थितियों में यह लिखा गया वो ख़ुद में इतनी नाटकीय थी की शायद किसी दिन उन पर भी एक नाटक की रचना की जा सकती है। नाटक की प्रेरणा कर्ण पर उपलब्ध जानकारी के विभिन्न स्त्रोतों और रचनाओं से ली गई हैं, जैसे कि रामधारी 'दिनकर' जी का महाकाव्य "रश्मिरथी", पर मुख्य रूप से इसकी कथावस्तु महाभारत और उसमें भी कर्ण-पर्व पर आधारित है। इस नाटक का एक दूसरा पहलू जो इसे अन्य रचनाओं से अलग बनाता है वह यह है कि ज़्यादातर रचनाओं में कर्ण को एक महानायक के रूप में दिखाया जाता रहा है, पर यहाँ अदभुत कर्ण परिस्थितियों के साथ बदलते एक मनुष्य, अच्छे से बुरा या कहें नायक से एक खलनायक में परिवर्तित होता हुआ नज़र आता है, जो कि उसके पुत्र सुदामन की मृत्यु के बाद उसके संवाद और उसके पात्र में देखा जा सकता है। हालांकि, विषय वस्तु में दिए गए अनुदेश इस विशिष्ट मंचित नाटक के लिए तो मान्य थे, पर ज़रूरी नहीं कि हर प्रस्तुति में इनका इसी प्रकार पालन किया जाए।
इसकी शुरुआत तब हुई जब 22 अक्टूबर 2017 को श्री राम सेन्टर सभागार में विवेक त्यागी और आकाश ख़तरी के निर्देशन में खेले जाने वाले कर्ण पर ही आधारित एक दूसरे नाटक को मण्डी हाउस के कुछ जाने माने रंगकर्मियों ने अपनी अंदरुनी कूटनीति के चलते रुकवा दिया। मंचन की तारीख़ तय थी, महीनों से नाटक के लिए parkour और दंगल की ट्रेनिंग ली जा रही थी। पर अब नाटककार से ली गयी अनुमति वापस ले ली गई थी, जिसके बिना वह नाटक नहीं किया जा सकता था। लेकिन हमें मंचन तो करना ही था। फ़ैसला लिया गया कि इसी परिकल्पना के आधार पर ही एक नया नाटक लिखा जाए। तब अदभुत कर्ण की तरह ही आदित्य तिवारी ने आगे बढ़कर, निर्धारित दिनों में इस लक्ष्य को भेदने का निष्चय किया और लिखने की प्रक्रिया आरम्भ हुई। विवेक के लक्ष्मी नगर के एक छोटे से कमरे में दिन रात कई दिनों तक लिखना चलता रहा। बातें, विचार-विमर्श, बहस-मुबाहिसा, लड़ाइयां और बहुत कुछ हुआ। कभी कभी तो ऐसा की काम रोक कर चाय का बहाना कर माहौल ठीक करना पड़ता। इस बात पर भी बहुत सोचा गया कि उन तथाकथित बड़े कलाकारों ने ऐसा क्या सोचा की मामूली से कुछ लड़कों की टोली को उन्होंने इस हद तक रोकने की कोशिश की। सवाल कई थे, जवाब एक भी नहीं था, मंचन की तारिख़ तय थी और समय बिलकुल भी नहीं था।
बहरहाल, समय पर पूर्ण रूप से ख़त्म ना हो पाने, साथ ही और भी दूसरी वजहों के कारण नाटक 22 अक्टूबर को नहीं हो सका। बहुत लोगों को इससे निराशा और नाराज़गी हुई, पर नया नाटक एक नई दिशा ले चुका था इसलिए उसको पूरा करना अब ज़रूरी था। और उसके लिए अब समय भी हमारे पास था। कुछ दिन छुट्टी लेने और कुछ अधूरे काम निपटाने में लग गए, जिस बीच आदित्य हैदराबाद चले गए। वहाँ जाकर जमने में कुछ एक दिन और निकल गए जिसके बाद नाटक को लिखने का काम फिर शुरू हुआ। कई ड्राफ़्ट और काफ़ी चर्चा के बाद 7 दिसम्बर 2017 को अंतिम रूप से यह नाटक पूरा हुआ। इस नाटक में सभी का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। तथाकथित बड़े कलाकारों का भी, अग़र वह लोग न होते तो शायद इस नाटक की रचना भी ना हो पाती। उनको भी धन्यवाद।
तो प्रस्तुत है आपके सामने अदभुत कर्ण की जीवन गाथा, नाटक अग्निपुंज
अंक एक
(प्रतिस्पर्धा का दृश्य। प्रेक्षकों के सभागार में बैठने के समय पर ही पूरे सभागार में विभिन्न प्रकार के युद्ध कलाओं का प्रदर्शन चल रहा है। मंच पर सबसे आगे रेत का एक अखाड़ा है जिसमें दंगल खेला जा रहा है। प्रेक्षक पूरी तरह से सभागार में बैठ जाने पर अर्जुन एक बड़े पहलवान को अखाड़े में हराकर द्रोण को वंदन करता है फिर मंच के ऊपरी हिस्से में बैठे अन्य राजपुरुषों के बीच जाकर बैठता है।)
द्रोण: मैं राजगुरु आचार्य द्रोण हस्तिनापुर की इस राज रणशाला में आप सभी सभासदों, राज कुटुंबियों एवं समस्त आर्यावर्त से आए क्षत्रिय योद्धाओं का स्वागत करता हूं। जैसा कि आप सब को यह विदित है कि हस्तिनापुर के क्षत्रिय कुमारों की दीक्षा संपन्न हो चुकी है। और इसी उपलक्ष्य में इस प्रतिस्पर्धा का आयोजन किया गया है। अभी तक आर्यावर्त से आए अनेकों योद्धाओं ने जिसमें रती अतिरती तथा महारथी शामिल थे, अपनी वीरता का प्रदर्शन किया और मल्लयुद्ध गदायुद्ध खड़गयुद्ध एवं अनेक प्रकार की कलाओं एवं रण कौशल का प्रदर्शन कर महाराज धृतराष्ट्र द्वारा सम्मानित हुए। आज इस रण उत्सव का समापन का अवसर है तथा आज ही धनुर्विद्या का सबसे कठिन लक्ष्य है। जिसे उत्तीर्ण करने वाले धनुर्धारी को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जाएगा।
(अर्जुन की ओर देख कर) उठो और लक्ष्य का संधान करो
(अर्जुन उठकर लक्ष्य को भेजता है। सभा आश्चर्य और वाह वाही से गूंज उठती है अर्जुन द्रोण को प्रणाम करता है। द्रोण अर्जुन को उठाता है।)
मुझे तुम से यही अपेक्षा थी अर्जुन और इस अभेद लक्ष्य को भेदकर तुमने द्रोण की गुरुता को गर्वोक्त कर दिया है। संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने की, अपनी योग्यता को आज फिर से प्रमाणित किया। मैं राजगुरु आचार्य द्रोण धर्मराज को साक्षी मानकर पांडुपुत्र गांडीवधारी अर्जुन को द्वापर का सर्वश्रेष्ठ महाप्रज्ञ घोषित करता हूं।
(कर्ण अपनी टोली के साथ प्रवेश करता है।)
कर्ण: क्षमा करें गुरुदेव परंतु प्रतिस्पर्धा अभी समाप्त नहीं हुई है।
द्रोण: अर्जुन के लक्ष्य भेदते ही प्रतिस्पर्धा समाप्त हो चुकी है। परंतु तुम इसका निर्धारण कर अचानक कैसे हस्तक्षेप करने चले आए?
कर्ण: नहीं गुरुदेव प्रतिस्पर्धा के नियमानुसार अर्जुन ने लक्ष्य भेदकर अपनी योग्यता सिद्ध की है परंतु सर्वश्रेष्ठता नहीं।
द्रोण: तुम कहना क्या चाहते हो?
(कर्ण अखाड़े में उतरता है और गिनकर पांडवों जैसे ही पाँच पहलवानो को एक एक कर हरा देता है। यह देखकर बाक़ी पहलवान घबराकर पीछे हट जाते हैं। इसके तुरंत बाद कर्ण मंच पर ही रखे धनुष को उठाता है और शब्द भेदन तथा वर्षा का दृश्य अपने बाणों से दिखाता है।)
कर्ण: मुझे पराजित किए बिना भला अर्जुन सर्वश्रेष्ठ कैसे हो सकता है? (अर्जुन से) मैं तुझे चुनौती देता हूँ अर्जुन, द्वंद्व युद्ध। विजय या मरण, हिम्मत है तो आजा।
अर्जुन: मुझे स्वीकार है।
द्रोण: रुक जाओ। प्रतिस्पर्धा में भाग लेने चले आए परंतु प्रतिस्पर्धा के नियमों से नितांत अपरिचित हो। इस प्रकार राज्यसभा में बिना अनुमति के अभद्रता से प्रवेश करना दंडनीय है यह नहीं जानते तुम?
कर्ण: क्षमा करें गुरुदेव। मैं तो सिर्फ घोषणा सुनकर प्रतिस्पर्धा में भाग लेने आया था जैसे और योद्धा थे।
द्रोण: और योद्धाओं में और तुम में अंतर है यह मत भूलो, यह प्रतिस्पर्धा क्षत्रियोंके लिए है और जहां तक मुझे ज्ञात है तुम शायद सारथी अधिरथ के पुत्र कर्ण हो ना?
कर्ण: जी हां गुरुदेव।
द्रोण: तो क्या सोच कर चले आए?
कर्ण: मैं तो केवल वीरता की परीक्षा देने आया हूं गुरुदेव। जैसे की नगर में घोषणा हुई थी, कि जो चाहे धनुर्धारी अर्जुन को चुनौती देकर उसे परास्त करे और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का गौरव प्राप्त करे। मेरा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं था।
द्रोण: परंतु यह घोषणा सुनकर चुनौती देने का अधिकार तुम्हें नहीं है कर्ण।
(दुर्योधन अचानक बीच में पड़ता है)
दुर्योधन: यह कैसा व्यवहार है गुरुदेव?
भीष्म: अपनी मर्यादा में रहो दुर्योधन।
दुर्योधन: क्षमा करें पितामह परंतु मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि वह प्रतिस्पर्धा में भाग क्यों नहीं ले सकता?
द्रोण: क्योंकि वह एक सारथी पुत्र है। नीच कुल का है और एक शूद्र की क्षत्रियों को चुनौती निषिद्ध है।
दुर्योधन: क्यों निषिद्ध है। क्योंकि वह राज परिवार से नहीं है, तो ठीक है मैं अदभुत कर्ण को अभी अंगराज घोषित करता हूं।
भीष्म: दुर्योधन क्या तुम जानते भी हो यह कौन है?
दुर्योधन: यह जानना महत्वपूर्ण नहीं है पितामह। यह जो भी वीर है, योग्य है और अब राजा है। और इतना परिचय पर्याप्त है।
द्रोण: तुम्हारे राज्य दे देने से यह योग्य नहीं हो जाता।
दुर्योधन: तो फिर कैसे होगा?
द्रोण: यह प्रतिस्पर्धा सिर्फ क्षत्रियों के लिए है और इसके लिए एक ही शर्त है। क्षत्रिय होना।
दुर्योधन: क्षत्रिय क्या है गुरुदेव? यह वीर है और जो वीर है वही क्षत्रिय है।
द्रोण: क्षत्रिय बनाया नहीं जाता दुर्योधन। हुआ जाता है। जैसे एक ब्राह्मण वीर होकर भी क्षत्रिय नहीं हो सकता , एक क्षत्रिय पांडित्य से पूर्ण होकर भी ब्राह्मण नहीं हो सकता। उसी प्रकार एक शुद्र वीरता से, राज्य से युक्त होकर भी क्षत्रिय नहीं हो सकता।
दुर्योधन: क्यों नहीं हो सकता? जब प्रतिस्पर्धा की बात हो रही है तो यहां क्षत्रिय और शूद्र का बंधन क्यों? वीरता क्या जन्म आधारित होती है? नहीं... वीरों की केवल एक ही जाती है वीरता और यहां वीरता की परीक्षा हो रही है या फिर....
द्रोण: अनावश्यक प्रतिवाद मत करो दुर्योधन शायद तुम्हें ज्ञात नहीं की वह मल साफ करने वाले एक सारथी की संतान है, घृणित है।
दुर्योधन: इसमें घृणा का विषय क्या है गुरुदेव। अगर वह मल साफ न करता तो किसी को तो यह कार्य करना ही पड़ता। तो क्या उसे भी घृणित माना जाता? नहीं गुरुदेव...वीरता ऐसी रूढ़िवादिता से अक्षण होती है। और वह तो एक महावीर है।
द्रोण: महावीर होगा परंतु क्षत्रिय नहीं।
दुर्योधन: यहां वीरता की प्रतिस्पर्धा हो रही है या क्षत्रियता की? जब आपने सर्वश्रेष्ठता के लिए वीरता की शर्त रखी है तो फिर यह भेद क्यों?
द्रोण: दुर्योधन।
दुर्योधन: सुयोधन, गुरुदेव। जब स्वयं अर्जुन को चुनौती स्वीकार है तो फिर आपको आपत्ति क्यों?
द्रोण: तुम स्वयं अर्जुन को परास्त नहीं कर सके तो उसके के लिए दूसरों का सहारा लेना छोड़ दो।
दुर्योधन: यहां विजय या पराजय की बात नहीं हो रही है। प्रश्न यहाँ प्रतिस्पर्धा में शामिल होने का है, परिणाम चाहे जो भी होता परंतु आपने उसे पहले ही निष्काषित कर दिया, मैं जानता हूं आपका षड्यंत्र। आपको भय था कि आपकी घोषणा मिथ्या न हो जाए और सर्वश्रेष्ठ शिष्य के गुरु होने का गौरव भंग ना हो जाए।
द्रोण: दुर्योधन.......
दुर्योधन: आप सिर्फ़ राजगुरु हैं, महाराज नहीं। मैं निर्णय महाराज से मांग रहा हूँ।
द्रोण: राज्य सभा की शोभा बढ़ाने वाला मैं कोई पोषित ब्राह्मण नहीं हूँ। बल्कि महाराज का निर्णय जिससे परिचालित होता है वह क्षत्रिय वृत्ति से युक्त राजगुरु हूँ मैं। राजगुरु धन, वैभव, विलास के अभिलाषी नहीं होते, अपितु इन सबसे पृथक रहकर राजा का मार्गदर्शन करते हैं। क्षत्रिय शौर्य से, वैश्य धन से तथा शुद्र कर्म से राजा की सेवा करें पर परंतु राजगुरु राजा के दाम भाग में, राजा से सम्मानित आसान पर, शिक्षा का अधिकार अपने हाथों में लेकर विराजमान होता है। जिसकी सेवा स्वयं राजा करते हैं, वह राजगुरु हूँ मैं। और राजा का कोई भी कार्य यदि धर्म के विरुद्ध हो तो राजगुरु का यह पूर्ण अधिकार है कि वह तत्काल राजा की आलोचना करे। इसलिये अपनी मूर्खता का परिचय यहाँ मत दो।
भीष्म: क्षमा करें गुरुदेव, आपका कथन सर्वथा उचित और धर्मसंगत है। (दुर्योधन से) अपने गुरु से ऐसे व्यवहार से परहेज़ करो दुर्योधन।
धृतराष्ट्र: सुयोधन.. अपने गुरुजनों से ऐसा व्यवहार अशोभनीय है, तुम्हें ऐसे अनावश्यक प्रतिवाद से बचना चाहिए।
दुर्योधन: मेरा प्रतिवाद अशोभनीय है तो क्या गुरुदेव का कार्य शोभनीय है। जो उन्होंने उस वीर को अपमानित करके किया।
द्रोण: तुम व्यक्तिगत द्वेष में ऐसा आचरण कर रहे हो। आश्रम में जो कुछ भी हुआ वह मुझसे छिपा नहीं है।
दुर्योधन: ठीक है। अगर मैं व्यक्तिगत द्वेष में ऐसा आचरण कर रहा हूं तो फिर आपने किस द्वेष के कारण उस वीर को प्रतिस्पर्धा से वंचित रखा।
द्रोण: क्योंकि वह एक शूद्र है, नीच है जबकि अर्जुन राजपुरुष है और एक शूद्र की राजपुरुष को चुनौती कभी मान्य नहीं हो सकती।
दुर्योधन:क्यों नहीं हो सकती? वीरता मन और कर्म से होती है में नहीं परंतु आपने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए एक योद्धा का ही अपमान किया। आपको भय था कि अर्जुन उससे पराजित ना हो जाए
द्रोण: यह स्पष्टत: विदित हो चुका है कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ महाविज्ञ है।
दुर्योधन: यह असत्य घोषणा मैं नहीं मानता। अगर आज वह कर्ण नहीं आता तो मैं स्वीकार कर भी लेता, परंतु उसकी चुनौती को अस्वीकार कर तथा सभा से निष्काषित कर आपने यह सिद्ध कर दिया है कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ महाविज्ञता के दूसरे पायदान पर है।
द्रोण: यह निश्चित करने का अधिकार तुम्हारा नहीं है।
दुर्योधन: आप भी नहीं कर सकते गुरुदेव।
द्रोण: यह घोषणा हो चुकी है और सभा में सभी इससे सहमत हैं।
दुर्योधन:क्या सिर्फ़ सहमति के आधार पर किसी को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जा सकता है?
द्रोण: यह भी एक कारण है। योग्यता के अलावा जनमत भी अर्जुन के पक्ष में है जिसे तुम नकार नहीं सकते।
दुर्योधन: चाहें कितना भी तर्क क्यों न दें परंतु आप अपने इस कार्य को उचित नहीं ठहरा सकते। आज जिस जनमत के समर्थन से आपने जो अनुचित कार्य किया वही जनमत एक दिन मेरे कार्य को उचित ठहराने पर विवश होंगे और आपका यह भ्रम दूर होगा और तब तक अर्जुन का सर्वश्रेष्ठ होना संदहस्पद होगा। आज नहीं तो कल आपको उस नीच कर्ण को वीरयता देनी होगी और जब तक अर्जुन उसकी चुनौती स्वीकार ना कर ले तब तक सर्वश्रेष्ठ महावीज्ञ प्रमाणित नहीं होगा।
(दुर्योधन दु:शासन बातचीत कर रहे हैं। दुर्योधन एक शिकार किये हुए जानवर की खाल उधेड़ रहा है और दु:शासन कुछ राज कन्याओं के साथ क्रीड़ा में लगा है।)
दु:शासन: प्रतिशोध से मेरा मन खिन्न हो रहा है। क्या सोच रहे हो तुम?
दुर्योधन: आज सभा में जो कुछ हुआ वही विचार कर रहा हूं। गुरु द्रोण का पक्षपात, पूरी सभा में एक का भी समर्थन हमारे साथ नहीं होना। सभी जिस प्रकार पांडवों के पक्ष में मौन होकर सब समर्थन दे रहे थे उसने तो भविष्य के लिए मुझे चिंतित कर रखा है। अब तो मुझे अपना सिंहासन भी जाता दीख रहा है।
दु:शासन: हाँ..... आज द्रोण जिस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे और अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ बता रहे थे, उसके बाद तो उन पर विश्वास करना मूर्खता ही होगी। परंतु तुमने उस सारथी पुत्र को अंगराज क्यों बना दिया। भावना के आवेग में तुमने बहुत बड़ी भूल कर दी।
दुर्योधन: मैं सबकुछ स्वीकार कर सकता हूं परंतु पांडवों को सर्वश्रेष्ठ नहीं। जब अर्जुन ने लक्ष्य भेद दिया तो मेरी आंखों के आगे अंधेरा हो गया। कुछ नहीं सूझ रहा था। तभी अचानक वह सारथी पुत्र कर्ण वहाँ आ गया और मुझे उस में एक नई आशा की किरण दिखने लगी। मुझे विश्वास था कि अर्जुन को शायद वह परास्त कर दे परंतु द्रोण ने उसे राजवंश का ना होने से आयोग्य बताया। अंगराज बनाकर मैंने अपना अंतिम दाव अर्जुन की पराजय पर लगाया परंतु द्रोण ने उसे भी व्यर्थ कर डाला।
दु:शासन: अब तो घोषणानुसार राज्य भी उसे देना होगा। राज भी गया और अर्जुन सर्वश्रेष्ठ महाविज्ञ भी घोषित हुआ। और भरी सभा में अपमानित भी हम हुए।
दुर्योधन: यही अपमान तो मुझे सहन नहीं हो रहा है। पितामह भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य सब के सब पांडवों के पक्षधर हैं । कभी:कभी तो लगता है कि युवराज मैं नहीं अपितु युधिष्ठिर हैं।
दु:शासन: बार:बार सभासदों के बीच पांडवों का महिमा वंदन करके हमें तुच्छ साबित किया जाता है। शिक्षा में भी हमारे साथ द्रोण ने पक्षपात किया, हर क्षण भीमार्जुन की प्रशंसा....
दुर्योधन: अभी तक मैं सोचता था कि भविष्य में पितामह तथा द्रोण हमारे पक्ष में होंगे परंतु यह सिर्फ मेरी मेरा भ्रम था। यह लोग सिर्फ दिखावे मात्र के लिए हमारे सभासद है वास्तव में यह पांडवों के हितैषी हैं। शत्रु से अधिक घातक..... बार:बार मेरा अपमान किया जाता है, जैसे मैं कोई बालक हूं। पांडवों को श्रेष्ठ साबित किया जाता है और हम चाह कर भी अपने अपमान का प्रतिकार नहीं कर पाते और उसका एक ही कारण है। और वह है बल। और जहां पर बल होगा प्रतिष्ठा भी वहीं होगी और अभी पांडव बलशाली हैं।
दु:शासन: हां सबसे अधिक घातक वो अर्जुन है। किसी तरह उसे रास्ते से हटा सके तो ही तुम सम्राट बन सकते हो परंतु अर्जुन के रहते यह असंभव है।
दुर्योधन: इसे संभव करना ही होगा और सम्राट भी दुर्योधन ही होगा। अपने जीते जी इनका षड्यंत्र मैं कभी सफल नहीं होने दूंगा। साम दाम दंड भेद सबका प्रयोग कर अर्जुन को रास्ते से हटाना होगा, परंतु इस समय तो मुझे अपने आगे गहन अंधकार ही दिख रहा है।
(शकुनि का प्रवेश)
शकुनि: अंधकार.... गहन अंधकार के बाद ही तो प्रकाश होता है भांजे (मंदहास)
दुर्योधन: मामाश्री.... आप!
शकुनि: जहां मेरा प्रिय सुयोधन चिंतित हो वहां भला मैं न होऊं।
दुर्योधन: शायद आपको ज्ञात नहीं मामाश्री आज जिस प्रकार सभा में द्रोण ने मुझे अपमानित किया और मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई वह मैं भूल नहीं पा रहा। द्रोण का, भीष्म का और बाकी सभासदों का यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार ने मुझे प्रतिशोध से भर दिया है। परंतु अर्जुन के सामर्थ्य ने मुझे मौन रहने पर विवश कर रखा है। गदायुद्ध में भीम को टक्कर देने के बावजूद अर्जुन को पराजित करने की योग्यता मुझमें नहीं है। द्रोण और भीष्म सिर्फ़ कहने के लिए मेरे हैं परंतु वह भी पांडवों के ही सच्चे हितैषी हैं। यही चिंता मुझे सता रही है भविष्य में युद्ध हुआ तो अर्जुन का सामना मैं कैसे करूंगा। उस समय तो द्रोण और भीष्म भी तटस्थ होंगे। मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।
शकुनि: भांजे... उनकी यह तटस्थता ही तुम्हारा सशक्त पक्ष बनेगी। रही बात रास्ते की तो वो तुम्हारे सामने है।
दु:शासन: कौन सा रास्ता?
शकुनि: आज जाने अनजाने में ही तुमने वह कार्य किया है जिसने तुम्हारे भाग्य के द्वार खोल दिए हैं। अब तुम्हारे हस्तिनापुर युवराज से हस्तिनापुर नरेश बनने में कोई बाधा नहीं है।
दुर्योधन: परंतु ऐसा क्या किया मैंने?
शकुनि: कर्ण को अंगराज्य देकर तुमने अर्जुन का सशक्त विकल्प ढूंढ लिया है भांजे....
दुर्योधन: परंतु वह सारथी पुत्र मेरी मदद क्यों करेगा? उसे तो मैं भली भांति जानता तक नहीं।
शकुनि: करेगा.... सब कुछ करेगा। और वह भी सिर्फ सुयोधन के लिए करेगा। उस के बल से पूर्णत: तुम परिचित नहीं हो भांजे, साक्षात ज्वालामुखी का स्वरूप है वह, जिसमें पांडवों का विनाश निहित है। सिर्फ सम्मान की कमी थी उसे और तुमने उसे अंगराज घोषित कर वह भी प्रदान कर दिया। इस एक दया के उपलक्ष्य में तुम उसके जीवन रथ के चालक बन चुके हो। कर्ण में बल है, तेज है और तुम में बुद्धि है, राज वैभव है। तुम दोनों के बल और सामर्थ्य का समावेश पांडवों के विनाश के लिए पर्याप्त होगा, और आज राज्यसभा में सब के समक्ष ही इस विनाश की नींव भी पढ़ चुकी है। कर्ण रूपी ब्रह्मास्त्र तो तुम्हें मिल चुका है, अब उसका संधान करो सुयोधन।
दुर्योधन: अभी तक समाधान मेरे समक्ष था और मैं चिंतित था! परंतु आपने वह समाधान दिखला कर मेरी बाहों में मानो नया बल भर दिया है। हा हा हा..... कर्ण..... अब कर्ण की उपयोगिता क्या होगी यह सुयोधन तय करेगा। बल उसका होगा परंतु सयोधन से निर्देशित होगा। मामाश्री आज आपने डूबते हुए सुयोधन के अस्तित्व को कर्ण का सहारा दे दिया।
शकुनि: मेरे होते हुए मेरा सुयोधन भला डूब सकता है क्या भांजे.... अब देर मत करो कर्ण को अंगराज तो घोषित कर ही चुके हो अब उसे सभा में अपने बगल का आसन देकर उसके भाग्य का निर्माता बन जाओ। महाराज धृतराष्ट्र तो केवल नाम मात्र के राजा हैं। अब सिंहासन पर दृष्टिपात करो। अब हस्तिनापुर की राजलक्ष्मी, हस्तिनापुर के भावी नरेश चक्रवर्ती सम्राट महाराजाधिराज सुयोधन का स्वागत कर रही है।
दुर्योधन: मामा श्री यह उपाधि आज से ही क्यों?
शकुनि: यह तो बस शुभारंभ है भविष्य का। तुम्हारे सिंहासन के नीव कर्ण पर अवस्थित है। तुम्हारी राजसत्ता युक्त बुद्धि और कर्ण के प्रतिशोध युक्त बल का समावेश अनिवार्य है और यही हस्तिनापुर के भविष्य का निर्धारक होगा।
दुर्योधन: होगा.... अवश्य होगा मामाश्री। यह समावेश पांडवों के विनाश का अवश्य होगा।
शकुनि: (मंदहास करते हुए) पांडवों के विनाश का.... पांडवों के विनाश का (मुख भंगिमा बदलते हुए, मुड़कर) नहीं... पांडवों के विनाश का नहीं, अपितु हस्तिनापुर के सर्वनाश का। भूला नहीं हूं अपने पिता की पराजय भीष्म का वो अहंकार युक्त आचरण, अपनी बहन की इच्छाओं का हनन, अपने पिता का उनकी पुत्री के लिए शोक संतप्त होना। गंधार नरेश का लज्जा से झुका शीश। परंतु यह शकुनि कुछ भी करने में अक्षम था। अहंकार था भीष्म को अपने कुल की मर्यादा पर, प्रतिष्ठा पर, अपने अहंकार में गंधार नरेश की मर्यादा को भरी सभा में जिस तरह से ललकारा वह असहनीय थी मेरे लिए। उसी दिन हस्तिनापुर की मर्यादा ध्वस्त करने का बीज मैंने अंतर में उभर चुका था। वर्षों से अपना राज वैभव त्यागकर हस्तिनापुर की सभा में पराधीन की भांति मौन धारण कर, इसी समय की प्रतीक्षा कर रहा था। अब वह समय निकट आ रहा है, जिस प्रकार भीष्म ने मेरे पिता के समक्ष भरी सभा में मेरे कुल की मर्यादा का हनन किया, उसी प्रकार मैं गंधार:नरेश शकुनि एक दिन हस्तिनापुर की सभा में, हस्तिनापुर के ही वंशज द्वारा भीष्म के समक्ष नष्ट करूंगा हस्तिनापुर की मर्यादा। अपने पिता के प्रतिशोध की शपथ पूर्ण करूंगा और जिस प्रकार मेरे पिता शीश झुका कर मौन रहने को विवश थे उसी प्रकार भीष्म भी विवश होंगे। अहंकारी भीष्म तुम्हारे वंश के विनाश कि नीव पड़ चुकी है, वह भी तुम्हारे जीवन काल में ही.... इच्छा मृत्यु प्राप्त है ना तुम्हें! जीवित रहोगे तुम अपने वंश का सर्वनाश अपनी आंखों से देखने के लिए और सब देख कर भी मौन रहने को विवश होगे। तुम्हारी यही अवस्था देखने के लिए मैं कब से व्याकुल था। कुछ समय और प्रतीक्षा करो... मेरा द्वारा हस्तीनापुर का महानाश अभी कुछ दिन और शेष है।
दुर्योधन: मामा श्री.... मामा श्री... (झकझोरता है)
शकुनी: हं..... भांजे!
(नदी का तट, कर्ण सूर्य को अर्ध्य देता है और शस्त्रास्त्रों का अभ्यास करता हुआ सामने तलवार की नोक पे सूर्य को देखते हुए स्वयं से सवाल पूछ रहा है।)
कर्ण: अहम्.... मैं.... इस एक शब्द का यथार्थ ढूंढने में मैं कर्ण अब तक अशक्षम रहा। आख़िर कौन है कर्ण? हृदय में वेदना, घृणा, तिरस्कार, अपमान की अग्नि लिए आख़िर कर्ण है कौन? नित्य तुम्हारी स्तुति करता हूँ परंतु उत्तर से वंचित रहता हूँ। सब कुछ होते हुए भी अपने अस्तित्व की खोज में अपूर्ण हूँ। अधिरथ मेरे पिता हैं। राधा मेरी माता हैं। सुयोधन् मेरा शुभचिंतक है। परंतु क्या यह सिर्फ मेरा भ्रम नहीं है। अपने आत्मद्वंद्व में जकड़ा अपने अस्तित्व की प्यास में वर्षों तप्ता रहा। द्रोण का पक्षपात, परशुराम का श्राप, मुझे मेरे अस्तित्व कि जड़ो तक पहूँचने को विवश करता रहा। ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ ही क्यों? एक न एक दिन तुम्हें उत्तर देना होगा। परंतु अभी एक एक क्षण मेरा हृदय मेरे अस्तित्व को ढूंढने में उद्विग्न है। अर्धरात्रि को अचानक नींद खुलती है तो सामने तुम्हें पाता हूँ और एक तीक्ष्ण अग्निपुंज मस्तिष्क में उतर जाता है। अब तक मैंने जो तिरस्कार और यातनाऐं सहीं वह अब प्रतिहिंसा में परिवर्तित हो रहीं हैं। परंतु अपनी प्रतिहिंसा में मैं स्वयं ही प्रताड़ित हो रहा हूँ। यह कैसी विडंबना है? द्रोण मुझे क्षत्रिय नहीं मानते, परशुराम मुझे शुद्र नहीं मानते, समाज मुझे वैध नहीं मानता। अब क्या यह कर्ण लोगों के निर्धारण का एक कोरा पृष्ठ बन गया है? जिस पर चाहे जो लिख दे। नहीं... कर्ण कोई कोरा पृष्ठ नहीं बल्कि वह अग्निपुंज है जो अपने प्रतिरोधियों को दग्ध कर दे। तो आज से इस अग्निपुंज कर्ण के जीवन का दूसरा अध्याय शुरू होगा। अभी तक जिन्होंने कर्ण के जीवन का निर्धारण किया वह सब अब कर्ण से ही परिचालित होंगे। अब सत्य और असत्य की परीभाषा मेरे व्यवहार से परे है। अब जो वर्तमान घटित सत्य है, वही मुझे स्वीकार है। और वह सत्य है सुयोधन। भरी सभा में मुझे अपने साथ में स्थान देकर उसने मेरे हृदय में स्थान पा लिया है। अब मेरी नियती यही है। अब इस कर्ण का उत्सर्ग सुयोधन के पक्ष में ही निहित है। अब जो दृष्टिगोचर है वही कर्ण का यथार्थ है और वह यथार्थ सुयोधन है। अब तक मेरा प्रारब्ध चाहे जो भी था परंतु अब कर्ण के अस्तित्व का निर्माता कर्ण स्वयं होगा।
(युद्धिष्ठिर भिमार्जुन बात कर रहे हैं। कृष्ण एक ग्वाले की भांति बहुत ही साधारण से वस्त्रों में मंच के एक कोने में कुछ कार्य कर रहें हैं।)
अर्जुन: दुर्योधन का व्यवहार आप भली-भांति जानते हैं। बाल्यकाल से लेकर आजतक उसने जो कुछ किया वह आपको पूर्ण रूपेण ज्ञात है। परंतु अब यह षड्यंत्र करके उसने विश्वास और मर्यादा की सभी सीमाऐं लांघ दी हैं।
भीम: लाक्षाग्रह का निर्माण कर, उसने जिस तरह के कायरतापूर्ण विश्वासघात किया, उसके लिए उस को दण्ड मिलना ही चाहिए। बाल्यकाल से ही उसने जिस प्रकार हमारी निर्मम हत्या का षड्यंत्र रचा है, उसने मेरे मन में प्रतिशोध की ज्वाला और भड़का दी है। आज तक हम सब कुछ मर्यादित होकर सुनते रहे। पितामह और महाराज का ध्यान रखते हुए उसकी धृष्टता सहन करते रहे। परंतु अब और सहन करना कायरता होगी भ्राता श्री।
युधिष्ठिर: प्रतिशोध से वीरता क्षीण होती है तात। हमें कोई भी कार्य उत्तेजना में नहीं करना चाहिए। सिर्फ आवेश में आकर शस्त्र उठाना वीरता नहीं है। शस्त्र उठाए बिना संयमित होकर शत्रुओं के षड्यंत्र को विफल करना ही वीरता की निशानी है। मैं तुम्हें हतोत्साहित नहीं कर रहा हूं, बस सही समय आने तक प्रतीक्षा करने की बात समझा रहा हूं। मैं स्वयं भी दुर्योधन के कुकृत्यों की समीक्षा कर रहा हूं। अभी तक उसके दोषों को क्षमा करता रहा हूं परंतु अब उसने मुझे विस्मय में डाल दिया है।
भीम: संयमित होकर ही इतने वर्षों तक हम उसके दोषों को क्षमा करते आए हैं। परंतु उसके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया, अपितू दिन-प्रतिदिन वह और क्रूर और विनाशकारी होता आया है। धीरे-धीरे पूरे राज्य पर नियंत्रण भी उसका ही होता जा रहा है। और कई बार वह राज्य पर अपने एकाधिकार को जता भी चुका है। पितामह गुरुद्रोण और स्वयं महाराज धृतराष्ट्र भी उसकी उदण्डता के प्रति उदासीन हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो राज्य होते हुए भी हम निर्वासित होंगे।
अर्जुन: भ्राताश्री बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। अब राज्य मांगने से नहीं मिलेगा। अपनी सहनशीलता हमें त्यागनी होगी। अब आपको कोई कठोर निर्णय लेना ही होगा।
युधिष्ठिर: मैं स्वयं विचाराधीन हूं अर्जुन। सिर्फ उचित समय की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
भीम: अब और प्रतीक्षा क्यों भ्राता श्री। अगर आप आज्ञा दें तो उस नराधम दुर्योधन को भरी सभा में महाराज धृतराष्ट्र के समक्ष ही बांध लाऊँ। जाने कब से मेरी भुजाएं दुर्योधन के वक्ष विदीर्ण करने को आतुर हैं।
अर्जुन: वह तो समय रहते हमें उसके षड्यंत्र का पता चल गया, वरना इस विचारगोष्ठी के लिए हम जीवित ना रह पाते।
युधिष्ठिर: इसी विषय पर निष्कर्ष के लिये द्वारकाधीश आने वाले हैं।
अर्जुन: पांचाल नरेश ने स्वयंवर का आयोजन किया है। जिसमें विजयी योद्धा पंचाली का वरण करेगा।
युधिष्ठिर: हम्म... इधर इस उहापोह में स्वयंवर पर हमारा ध्यान ही नहीं गया। और द्वारकाधीश ने भी अज्ञातवास का निर्देश देखा है।
अर्जुन: सुना है दुर्योधन भी स्वयंवर में शामिल हो रहा है।
युधिष्ठिर: दुर्योधन??
भीम: दुर्योधन दुर्योधन... दुर्योधन.... ( उठ कर चला जाता है।)
युधिष्ठर: जिस विनाश को मैं इतने वर्षों से रोकने का प्रयत्न कर रहा हूं लगता है वह जल्द ही आने वाला है। भीम के क्रोध को अब और अधिक शांत रखना बहुत कठिन है।
अर्जुन: वह तो एक न एक दिन होना ही था भ्राताश्री। आखिर दुर्योधन को उसके कर्मों का दंड मिलना भी तो आवश्यक है।
युधिष्ठिर: वह तो होना ही है। परंतु अभी नहीं। आगे द्वारकाधीश जैसा निर्देश देंगे वैसे ही होगा। वर्तमान में हमें स्वयंवर पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कोई ऐसी युक्ति करनी होगी जिससे तुम स्वयंवर में भाग ले सको।
(कृष्ण आते हैं।)
अर्जुन: नमस्कार.... आइए हम आपकी ही चर्चा कर रहे थे।
कृष्ण: मेरी या पांचाली की अर्जुन? तुम्हारे मुख पर तो कोई और ही चिंता दिखाई दे रही है।
अर्जुन: आप तो सर्वज्ञ हैं द्वारकाधीश। क्या मेरी व्याकुलता आपसे छिपी है?
युधिष्ठिर: आइए पहले आसन ग्रहण कीजिए।
(कृष्ण युधिष्ठिर को नमस्कार करते हैं।)
कृष्ण: क्या सोच रहे हो अर्जुन? जिस क्षण की तुम वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे वह क्षण अब आ चुका है। संसार के सभी धनुर्धर लक्ष्य भेदने में असफल रहे हैं।
अर्जुन: यही तो मेरी व्याकुलता का कारण है केशव।
कृष्ण: ऐसे क्षण में व्याकुलता क्यों?
युधिष्ठिर: कल स्वयंवर में दुर्योधन भी शामिल हो रहा है, ऐसा पता चला है।
कृष्ण: ओह तो यह है व्याकुलता का कारण। पर यह कोई नई बात तो है नहीं? अब.... दुर्योधन की क्षमता क्या है यह आप लोग भली-भांति जानते हैं। स्वयंवर में गदायुद्ध की शर्त तो है नहीं, उसके लिए तो धनुर्विद्या की क्षमता का परिचय देना है, जो दुर्योधन के लिए असंभव है। और यह बात दुर्योधन भी भली भांति जानता होगा। इसलिए जहाँ तक मुझे लगता है दुरयोधन स्वयं तो इस प्रतिस्पर्धा से दूर ही रहेगा। आप लोग व्यर्थ चिंता कर रहे हैं।
अर्जुन: यह तो हम जानते हैं कि दुर्योधन स्वयं प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं लेगा। परंतु मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह अपने साथ उस शुद्र कर्ण को अवश्य लाएगा। क्योंकि बल के नाम पर अगर उसके पास कुछ है, तो वह है, कर्ण। और ऐसे समय में वो कर्ण का उपयोग अवश्य करेगा। और अगर कर्ण प्रतिस्पर्धा में शामिल हुआ तो वह अवश्य ही लक्ष्य भेदन कर देगा।
कृष्ण: हाँ यह सच है। अगर अदभुत कर्ण प्रतिस्पर्धा में भाग लेगा तो वह अवश्य ही विजयी होगा।
युधिष्ठिर: और ऐसी स्थिति में अर्जुन से उसके टकराव की संभावना को भी नकारा नही जा सकता।
कृष्ण: परंतु यह परिस्थितियां तो तब बनती यदि वह एक क्षत्रिय होता। आप.... आप सब तो जानते ही हैं कि वह शुद्र है। पांचाली का वरण करना तो दूर उसका तो इस प्रतिस्पर्धा में भाग लेना ही वर्जित है। दुर्योधन के स्वार्थपूर्ण सौजन्य ने उसे हस्तिनापुर की राज्यसभा में विराजमान कर रखा है, वरना उसका उचित स्थान कहाँ है ये आप जानते हैं।
अर्जुन: दुर्योधन की मित्रता के कारण शुद्र होकर भी जिस प्रकार राज्यसभा में वह अपना आसन पा चुका है तथा एक क्षत्रिय की तरह उसका व्यवहार करना। क्या तब भी इस बात को नकारा जा सकता है की वह स्वयंवर में पांचाली का वरण नहीं करेगा।
कृष्ण: स्वयंवर में पांचाली का वरण तो वह तब करेगा जब पांचाली भी उसका वरण करे। पर क्या पांचाली उस कर्ण का वरण करेगी? असंभव.... पांचाली एक वीर सत्यनिष्ठ क्षत्रिय कन्या है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि किसी भी परिस्थिति में वो अर्जुन के अलावा कर्ण का वरण नहीं करेगी, चाहे वो प्रतिस्पर्धा में विजयी ही क्यों न हो।
युधिष्ठिर: तो फिर स्वयंवर की घोषणानुसार लक्ष्य का भेदन कौन करेगा? और ऐसी अवस्था में, लक्ष्य अपूर्ण रहा तो स्वयंवर भी नहीं हो सकता। जैसी स्थिति आ रही है वो अत्यंत जटिल है। अभी दो ही वीर हैं जो लक्ष्य को भेदने में सक्षम हैं। एक अर्जुन और दूसरा कर्ण।
कृष्ण: हाँ, अवश्य ही अभी यह दो वीर हैं जो एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी हैं। पर पांचाली का वरण सिर्फ़ एक ही करेगा और वह है अर्जुन।
अर्जुन: परंतु अभी अभी लाक्षागृह की घटना के पश्चात हमारा स्वयंवर में भाग लेना कैसे संभव है? आपके निर्देशानुसार ही हम अज्ञातवास कर रहे हैं। क्या इस समय हमारा खुद को प्रकट करना उचित होगा?
कृष्ण: हाँ.... अब तुम्हारे प्रकटीकरण का समय आ गया है क्योंकि अब वास्तव में उसकी आवश्यकता आन पड़ी है। वर्तमान में केवल तुम स्वयंवर में शामिल होगे। शेष पाण्डव, धर्मराज, भीम, नकुल, सहदेव और माता कुंती अभी यहीं अज्ञात रूप से वास करेंगे। प्रतिस्पर्धा में विजयी होने के पश्चात, पांचाली तुम्हारा वरण कर ले तदुपरांत हम सब हस्तिनापुर चलेंगे।
युधिष्ठिर: आपका निर्णय समयानुकूल है। आप आज ही अर्जुन को लेकर स्वयंवर के लिए प्रस्थान करें।
कृष्ण: प्रस्थान तो करना है परंतु एकसाथ नहीं। अर्जुन का इस तरह प्रकटीकरण उचित नहीं। अभी यह ब्राह्मण वेश में ही स्वयंवर सभा में जाएंगे। वहाँ मैं भी पृथक रहकर ही निर्देश दूंगा।
युधिष्ठिर: परंतु स्वयंवर सभा में परिचय की आवश्यकता तो पड़ेगी?
कृष्ण: इसलिए अर्जुन ब्राह्मण वेश में ही सभा में प्रवेश करेंगे। और जब तक लक्ष्य भेदन न हो जाए अपनी वास्तविक पहचान गुप्त ही रखेंगे। लक्ष्य भेदन करने के साथ ही प्रश्नचिन्ह विकल्प भी समाप्त हो जाएगा।
युधिष्ठिर: पर दुर्योधन.... क्या दुर्योधन उसे स्वीकार करेगा?
कृष्ण: दुर्योधन के स्वीकार या अस्वीकार का प्रश्न ही नहीं होगा। सभा का निर्णय सर्वोपरी होगा और उससे भी सर्वोपरी होगी पांचाली के अंतरमन की आवाज़, जो की स्वयंवर सभा में परिणाम निर्धारित करेगी। योद्धाओं के निजी प्रतिद्वंद्व नहीं। आपकी चिंता निर्मूल नहीं है। परंतु आप स्वयं धर्मज्ञ हैं। आप स्वयं जानते हैं की प्रकृति जो भी निर्धारित करेगी वो सर्वहितकारी होगा। और उसी में सबके कर्मों का भी निर्धारण होगा। विश्वास रखिये धर्मराज की ही विजय होगी। (युधिष्ठिर को नमस्कार करते हुए, अर्जुन से) अब स्वयंवर सभा मे भेंट होगी।
दृश्य 1
(प्रतिस्पर्धा का दृश्य। प्रेक्षकों के सभागार में बैठने के समय पर ही पूरे सभागार में विभिन्न प्रकार के युद्ध कलाओं का प्रदर्शन चल रहा है। मंच पर सबसे आगे रेत का एक अखाड़ा है जिसमें दंगल खेला जा रहा है। प्रेक्षक पूरी तरह से सभागार में बैठ जाने पर अर्जुन एक बड़े पहलवान को अखाड़े में हराकर द्रोण को वंदन करता है फिर मंच के ऊपरी हिस्से में बैठे अन्य राजपुरुषों के बीच जाकर बैठता है।)
द्रोण: मैं राजगुरु आचार्य द्रोण हस्तिनापुर की इस राज रणशाला में आप सभी सभासदों, राज कुटुंबियों एवं समस्त आर्यावर्त से आए क्षत्रिय योद्धाओं का स्वागत करता हूं। जैसा कि आप सब को यह विदित है कि हस्तिनापुर के क्षत्रिय कुमारों की दीक्षा संपन्न हो चुकी है। और इसी उपलक्ष्य में इस प्रतिस्पर्धा का आयोजन किया गया है। अभी तक आर्यावर्त से आए अनेकों योद्धाओं ने जिसमें रती अतिरती तथा महारथी शामिल थे, अपनी वीरता का प्रदर्शन किया और मल्लयुद्ध गदायुद्ध खड़गयुद्ध एवं अनेक प्रकार की कलाओं एवं रण कौशल का प्रदर्शन कर महाराज धृतराष्ट्र द्वारा सम्मानित हुए। आज इस रण उत्सव का समापन का अवसर है तथा आज ही धनुर्विद्या का सबसे कठिन लक्ष्य है। जिसे उत्तीर्ण करने वाले धनुर्धारी को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जाएगा।
(अर्जुन की ओर देख कर) उठो और लक्ष्य का संधान करो
(अर्जुन उठकर लक्ष्य को भेजता है। सभा आश्चर्य और वाह वाही से गूंज उठती है अर्जुन द्रोण को प्रणाम करता है। द्रोण अर्जुन को उठाता है।)
मुझे तुम से यही अपेक्षा थी अर्जुन और इस अभेद लक्ष्य को भेदकर तुमने द्रोण की गुरुता को गर्वोक्त कर दिया है। संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने की, अपनी योग्यता को आज फिर से प्रमाणित किया। मैं राजगुरु आचार्य द्रोण धर्मराज को साक्षी मानकर पांडुपुत्र गांडीवधारी अर्जुन को द्वापर का सर्वश्रेष्ठ महाप्रज्ञ घोषित करता हूं।
(कर्ण अपनी टोली के साथ प्रवेश करता है।)
कर्ण: क्षमा करें गुरुदेव परंतु प्रतिस्पर्धा अभी समाप्त नहीं हुई है।
द्रोण: अर्जुन के लक्ष्य भेदते ही प्रतिस्पर्धा समाप्त हो चुकी है। परंतु तुम इसका निर्धारण कर अचानक कैसे हस्तक्षेप करने चले आए?
कर्ण: नहीं गुरुदेव प्रतिस्पर्धा के नियमानुसार अर्जुन ने लक्ष्य भेदकर अपनी योग्यता सिद्ध की है परंतु सर्वश्रेष्ठता नहीं।
द्रोण: तुम कहना क्या चाहते हो?
(कर्ण अखाड़े में उतरता है और गिनकर पांडवों जैसे ही पाँच पहलवानो को एक एक कर हरा देता है। यह देखकर बाक़ी पहलवान घबराकर पीछे हट जाते हैं। इसके तुरंत बाद कर्ण मंच पर ही रखे धनुष को उठाता है और शब्द भेदन तथा वर्षा का दृश्य अपने बाणों से दिखाता है।)
कर्ण: मुझे पराजित किए बिना भला अर्जुन सर्वश्रेष्ठ कैसे हो सकता है? (अर्जुन से) मैं तुझे चुनौती देता हूँ अर्जुन, द्वंद्व युद्ध। विजय या मरण, हिम्मत है तो आजा।
अर्जुन: मुझे स्वीकार है।
द्रोण: रुक जाओ। प्रतिस्पर्धा में भाग लेने चले आए परंतु प्रतिस्पर्धा के नियमों से नितांत अपरिचित हो। इस प्रकार राज्यसभा में बिना अनुमति के अभद्रता से प्रवेश करना दंडनीय है यह नहीं जानते तुम?
कर्ण: क्षमा करें गुरुदेव। मैं तो सिर्फ घोषणा सुनकर प्रतिस्पर्धा में भाग लेने आया था जैसे और योद्धा थे।
द्रोण: और योद्धाओं में और तुम में अंतर है यह मत भूलो, यह प्रतिस्पर्धा क्षत्रियोंके लिए है और जहां तक मुझे ज्ञात है तुम शायद सारथी अधिरथ के पुत्र कर्ण हो ना?
कर्ण: जी हां गुरुदेव।
द्रोण: तो क्या सोच कर चले आए?
कर्ण: मैं तो केवल वीरता की परीक्षा देने आया हूं गुरुदेव। जैसे की नगर में घोषणा हुई थी, कि जो चाहे धनुर्धारी अर्जुन को चुनौती देकर उसे परास्त करे और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का गौरव प्राप्त करे। मेरा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं था।
द्रोण: परंतु यह घोषणा सुनकर चुनौती देने का अधिकार तुम्हें नहीं है कर्ण।
(दुर्योधन अचानक बीच में पड़ता है)
दुर्योधन: यह कैसा व्यवहार है गुरुदेव?
भीष्म: अपनी मर्यादा में रहो दुर्योधन।
दुर्योधन: क्षमा करें पितामह परंतु मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि वह प्रतिस्पर्धा में भाग क्यों नहीं ले सकता?
द्रोण: क्योंकि वह एक सारथी पुत्र है। नीच कुल का है और एक शूद्र की क्षत्रियों को चुनौती निषिद्ध है।
दुर्योधन: क्यों निषिद्ध है। क्योंकि वह राज परिवार से नहीं है, तो ठीक है मैं अदभुत कर्ण को अभी अंगराज घोषित करता हूं।
भीष्म: दुर्योधन क्या तुम जानते भी हो यह कौन है?
दुर्योधन: यह जानना महत्वपूर्ण नहीं है पितामह। यह जो भी वीर है, योग्य है और अब राजा है। और इतना परिचय पर्याप्त है।
द्रोण: तुम्हारे राज्य दे देने से यह योग्य नहीं हो जाता।
दुर्योधन: तो फिर कैसे होगा?
द्रोण: यह प्रतिस्पर्धा सिर्फ क्षत्रियों के लिए है और इसके लिए एक ही शर्त है। क्षत्रिय होना।
दुर्योधन: क्षत्रिय क्या है गुरुदेव? यह वीर है और जो वीर है वही क्षत्रिय है।
द्रोण: क्षत्रिय बनाया नहीं जाता दुर्योधन। हुआ जाता है। जैसे एक ब्राह्मण वीर होकर भी क्षत्रिय नहीं हो सकता , एक क्षत्रिय पांडित्य से पूर्ण होकर भी ब्राह्मण नहीं हो सकता। उसी प्रकार एक शुद्र वीरता से, राज्य से युक्त होकर भी क्षत्रिय नहीं हो सकता।
दुर्योधन: क्यों नहीं हो सकता? जब प्रतिस्पर्धा की बात हो रही है तो यहां क्षत्रिय और शूद्र का बंधन क्यों? वीरता क्या जन्म आधारित होती है? नहीं... वीरों की केवल एक ही जाती है वीरता और यहां वीरता की परीक्षा हो रही है या फिर....
द्रोण: अनावश्यक प्रतिवाद मत करो दुर्योधन शायद तुम्हें ज्ञात नहीं की वह मल साफ करने वाले एक सारथी की संतान है, घृणित है।
दुर्योधन: इसमें घृणा का विषय क्या है गुरुदेव। अगर वह मल साफ न करता तो किसी को तो यह कार्य करना ही पड़ता। तो क्या उसे भी घृणित माना जाता? नहीं गुरुदेव...वीरता ऐसी रूढ़िवादिता से अक्षण होती है। और वह तो एक महावीर है।
द्रोण: महावीर होगा परंतु क्षत्रिय नहीं।
दुर्योधन: यहां वीरता की प्रतिस्पर्धा हो रही है या क्षत्रियता की? जब आपने सर्वश्रेष्ठता के लिए वीरता की शर्त रखी है तो फिर यह भेद क्यों?
द्रोण: दुर्योधन।
दुर्योधन: सुयोधन, गुरुदेव। जब स्वयं अर्जुन को चुनौती स्वीकार है तो फिर आपको आपत्ति क्यों?
द्रोण: तुम स्वयं अर्जुन को परास्त नहीं कर सके तो उसके के लिए दूसरों का सहारा लेना छोड़ दो।
दुर्योधन: यहां विजय या पराजय की बात नहीं हो रही है। प्रश्न यहाँ प्रतिस्पर्धा में शामिल होने का है, परिणाम चाहे जो भी होता परंतु आपने उसे पहले ही निष्काषित कर दिया, मैं जानता हूं आपका षड्यंत्र। आपको भय था कि आपकी घोषणा मिथ्या न हो जाए और सर्वश्रेष्ठ शिष्य के गुरु होने का गौरव भंग ना हो जाए।
द्रोण: दुर्योधन.......
दुर्योधन: आप सिर्फ़ राजगुरु हैं, महाराज नहीं। मैं निर्णय महाराज से मांग रहा हूँ।
द्रोण: राज्य सभा की शोभा बढ़ाने वाला मैं कोई पोषित ब्राह्मण नहीं हूँ। बल्कि महाराज का निर्णय जिससे परिचालित होता है वह क्षत्रिय वृत्ति से युक्त राजगुरु हूँ मैं। राजगुरु धन, वैभव, विलास के अभिलाषी नहीं होते, अपितु इन सबसे पृथक रहकर राजा का मार्गदर्शन करते हैं। क्षत्रिय शौर्य से, वैश्य धन से तथा शुद्र कर्म से राजा की सेवा करें पर परंतु राजगुरु राजा के दाम भाग में, राजा से सम्मानित आसान पर, शिक्षा का अधिकार अपने हाथों में लेकर विराजमान होता है। जिसकी सेवा स्वयं राजा करते हैं, वह राजगुरु हूँ मैं। और राजा का कोई भी कार्य यदि धर्म के विरुद्ध हो तो राजगुरु का यह पूर्ण अधिकार है कि वह तत्काल राजा की आलोचना करे। इसलिये अपनी मूर्खता का परिचय यहाँ मत दो।
भीष्म: क्षमा करें गुरुदेव, आपका कथन सर्वथा उचित और धर्मसंगत है। (दुर्योधन से) अपने गुरु से ऐसे व्यवहार से परहेज़ करो दुर्योधन।
धृतराष्ट्र: सुयोधन.. अपने गुरुजनों से ऐसा व्यवहार अशोभनीय है, तुम्हें ऐसे अनावश्यक प्रतिवाद से बचना चाहिए।
दुर्योधन: मेरा प्रतिवाद अशोभनीय है तो क्या गुरुदेव का कार्य शोभनीय है। जो उन्होंने उस वीर को अपमानित करके किया।
द्रोण: तुम व्यक्तिगत द्वेष में ऐसा आचरण कर रहे हो। आश्रम में जो कुछ भी हुआ वह मुझसे छिपा नहीं है।
दुर्योधन: ठीक है। अगर मैं व्यक्तिगत द्वेष में ऐसा आचरण कर रहा हूं तो फिर आपने किस द्वेष के कारण उस वीर को प्रतिस्पर्धा से वंचित रखा।
द्रोण: क्योंकि वह एक शूद्र है, नीच है जबकि अर्जुन राजपुरुष है और एक शूद्र की राजपुरुष को चुनौती कभी मान्य नहीं हो सकती।
दुर्योधन:क्यों नहीं हो सकती? वीरता मन और कर्म से होती है में नहीं परंतु आपने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए एक योद्धा का ही अपमान किया। आपको भय था कि अर्जुन उससे पराजित ना हो जाए
द्रोण: यह स्पष्टत: विदित हो चुका है कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ महाविज्ञ है।
दुर्योधन: यह असत्य घोषणा मैं नहीं मानता। अगर आज वह कर्ण नहीं आता तो मैं स्वीकार कर भी लेता, परंतु उसकी चुनौती को अस्वीकार कर तथा सभा से निष्काषित कर आपने यह सिद्ध कर दिया है कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ महाविज्ञता के दूसरे पायदान पर है।
द्रोण: यह निश्चित करने का अधिकार तुम्हारा नहीं है।
दुर्योधन: आप भी नहीं कर सकते गुरुदेव।
द्रोण: यह घोषणा हो चुकी है और सभा में सभी इससे सहमत हैं।
दुर्योधन:क्या सिर्फ़ सहमति के आधार पर किसी को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जा सकता है?
द्रोण: यह भी एक कारण है। योग्यता के अलावा जनमत भी अर्जुन के पक्ष में है जिसे तुम नकार नहीं सकते।
दुर्योधन: चाहें कितना भी तर्क क्यों न दें परंतु आप अपने इस कार्य को उचित नहीं ठहरा सकते। आज जिस जनमत के समर्थन से आपने जो अनुचित कार्य किया वही जनमत एक दिन मेरे कार्य को उचित ठहराने पर विवश होंगे और आपका यह भ्रम दूर होगा और तब तक अर्जुन का सर्वश्रेष्ठ होना संदहस्पद होगा। आज नहीं तो कल आपको उस नीच कर्ण को वीरयता देनी होगी और जब तक अर्जुन उसकी चुनौती स्वीकार ना कर ले तब तक सर्वश्रेष्ठ महावीज्ञ प्रमाणित नहीं होगा।
दृश्य 2
(दुर्योधन दु:शासन बातचीत कर रहे हैं। दुर्योधन एक शिकार किये हुए जानवर की खाल उधेड़ रहा है और दु:शासन कुछ राज कन्याओं के साथ क्रीड़ा में लगा है।)
दु:शासन: प्रतिशोध से मेरा मन खिन्न हो रहा है। क्या सोच रहे हो तुम?
दुर्योधन: आज सभा में जो कुछ हुआ वही विचार कर रहा हूं। गुरु द्रोण का पक्षपात, पूरी सभा में एक का भी समर्थन हमारे साथ नहीं होना। सभी जिस प्रकार पांडवों के पक्ष में मौन होकर सब समर्थन दे रहे थे उसने तो भविष्य के लिए मुझे चिंतित कर रखा है। अब तो मुझे अपना सिंहासन भी जाता दीख रहा है।
दु:शासन: हाँ..... आज द्रोण जिस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे और अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ बता रहे थे, उसके बाद तो उन पर विश्वास करना मूर्खता ही होगी। परंतु तुमने उस सारथी पुत्र को अंगराज क्यों बना दिया। भावना के आवेग में तुमने बहुत बड़ी भूल कर दी।
दुर्योधन: मैं सबकुछ स्वीकार कर सकता हूं परंतु पांडवों को सर्वश्रेष्ठ नहीं। जब अर्जुन ने लक्ष्य भेद दिया तो मेरी आंखों के आगे अंधेरा हो गया। कुछ नहीं सूझ रहा था। तभी अचानक वह सारथी पुत्र कर्ण वहाँ आ गया और मुझे उस में एक नई आशा की किरण दिखने लगी। मुझे विश्वास था कि अर्जुन को शायद वह परास्त कर दे परंतु द्रोण ने उसे राजवंश का ना होने से आयोग्य बताया। अंगराज बनाकर मैंने अपना अंतिम दाव अर्जुन की पराजय पर लगाया परंतु द्रोण ने उसे भी व्यर्थ कर डाला।
दु:शासन: अब तो घोषणानुसार राज्य भी उसे देना होगा। राज भी गया और अर्जुन सर्वश्रेष्ठ महाविज्ञ भी घोषित हुआ। और भरी सभा में अपमानित भी हम हुए।
दुर्योधन: यही अपमान तो मुझे सहन नहीं हो रहा है। पितामह भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य सब के सब पांडवों के पक्षधर हैं । कभी:कभी तो लगता है कि युवराज मैं नहीं अपितु युधिष्ठिर हैं।
दु:शासन: बार:बार सभासदों के बीच पांडवों का महिमा वंदन करके हमें तुच्छ साबित किया जाता है। शिक्षा में भी हमारे साथ द्रोण ने पक्षपात किया, हर क्षण भीमार्जुन की प्रशंसा....
दुर्योधन: अभी तक मैं सोचता था कि भविष्य में पितामह तथा द्रोण हमारे पक्ष में होंगे परंतु यह सिर्फ मेरी मेरा भ्रम था। यह लोग सिर्फ दिखावे मात्र के लिए हमारे सभासद है वास्तव में यह पांडवों के हितैषी हैं। शत्रु से अधिक घातक..... बार:बार मेरा अपमान किया जाता है, जैसे मैं कोई बालक हूं। पांडवों को श्रेष्ठ साबित किया जाता है और हम चाह कर भी अपने अपमान का प्रतिकार नहीं कर पाते और उसका एक ही कारण है। और वह है बल। और जहां पर बल होगा प्रतिष्ठा भी वहीं होगी और अभी पांडव बलशाली हैं।
दु:शासन: हां सबसे अधिक घातक वो अर्जुन है। किसी तरह उसे रास्ते से हटा सके तो ही तुम सम्राट बन सकते हो परंतु अर्जुन के रहते यह असंभव है।
दुर्योधन: इसे संभव करना ही होगा और सम्राट भी दुर्योधन ही होगा। अपने जीते जी इनका षड्यंत्र मैं कभी सफल नहीं होने दूंगा। साम दाम दंड भेद सबका प्रयोग कर अर्जुन को रास्ते से हटाना होगा, परंतु इस समय तो मुझे अपने आगे गहन अंधकार ही दिख रहा है।
(शकुनि का प्रवेश)
शकुनि: अंधकार.... गहन अंधकार के बाद ही तो प्रकाश होता है भांजे (मंदहास)
दुर्योधन: मामाश्री.... आप!
शकुनि: जहां मेरा प्रिय सुयोधन चिंतित हो वहां भला मैं न होऊं।
दुर्योधन: शायद आपको ज्ञात नहीं मामाश्री आज जिस प्रकार सभा में द्रोण ने मुझे अपमानित किया और मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई वह मैं भूल नहीं पा रहा। द्रोण का, भीष्म का और बाकी सभासदों का यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार ने मुझे प्रतिशोध से भर दिया है। परंतु अर्जुन के सामर्थ्य ने मुझे मौन रहने पर विवश कर रखा है। गदायुद्ध में भीम को टक्कर देने के बावजूद अर्जुन को पराजित करने की योग्यता मुझमें नहीं है। द्रोण और भीष्म सिर्फ़ कहने के लिए मेरे हैं परंतु वह भी पांडवों के ही सच्चे हितैषी हैं। यही चिंता मुझे सता रही है भविष्य में युद्ध हुआ तो अर्जुन का सामना मैं कैसे करूंगा। उस समय तो द्रोण और भीष्म भी तटस्थ होंगे। मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।
शकुनि: भांजे... उनकी यह तटस्थता ही तुम्हारा सशक्त पक्ष बनेगी। रही बात रास्ते की तो वो तुम्हारे सामने है।
दु:शासन: कौन सा रास्ता?
शकुनि: आज जाने अनजाने में ही तुमने वह कार्य किया है जिसने तुम्हारे भाग्य के द्वार खोल दिए हैं। अब तुम्हारे हस्तिनापुर युवराज से हस्तिनापुर नरेश बनने में कोई बाधा नहीं है।
दुर्योधन: परंतु ऐसा क्या किया मैंने?
शकुनि: कर्ण को अंगराज्य देकर तुमने अर्जुन का सशक्त विकल्प ढूंढ लिया है भांजे....
दुर्योधन: परंतु वह सारथी पुत्र मेरी मदद क्यों करेगा? उसे तो मैं भली भांति जानता तक नहीं।
शकुनि: करेगा.... सब कुछ करेगा। और वह भी सिर्फ सुयोधन के लिए करेगा। उस के बल से पूर्णत: तुम परिचित नहीं हो भांजे, साक्षात ज्वालामुखी का स्वरूप है वह, जिसमें पांडवों का विनाश निहित है। सिर्फ सम्मान की कमी थी उसे और तुमने उसे अंगराज घोषित कर वह भी प्रदान कर दिया। इस एक दया के उपलक्ष्य में तुम उसके जीवन रथ के चालक बन चुके हो। कर्ण में बल है, तेज है और तुम में बुद्धि है, राज वैभव है। तुम दोनों के बल और सामर्थ्य का समावेश पांडवों के विनाश के लिए पर्याप्त होगा, और आज राज्यसभा में सब के समक्ष ही इस विनाश की नींव भी पढ़ चुकी है। कर्ण रूपी ब्रह्मास्त्र तो तुम्हें मिल चुका है, अब उसका संधान करो सुयोधन।
दुर्योधन: अभी तक समाधान मेरे समक्ष था और मैं चिंतित था! परंतु आपने वह समाधान दिखला कर मेरी बाहों में मानो नया बल भर दिया है। हा हा हा..... कर्ण..... अब कर्ण की उपयोगिता क्या होगी यह सुयोधन तय करेगा। बल उसका होगा परंतु सयोधन से निर्देशित होगा। मामाश्री आज आपने डूबते हुए सुयोधन के अस्तित्व को कर्ण का सहारा दे दिया।
शकुनि: मेरे होते हुए मेरा सुयोधन भला डूब सकता है क्या भांजे.... अब देर मत करो कर्ण को अंगराज तो घोषित कर ही चुके हो अब उसे सभा में अपने बगल का आसन देकर उसके भाग्य का निर्माता बन जाओ। महाराज धृतराष्ट्र तो केवल नाम मात्र के राजा हैं। अब सिंहासन पर दृष्टिपात करो। अब हस्तिनापुर की राजलक्ष्मी, हस्तिनापुर के भावी नरेश चक्रवर्ती सम्राट महाराजाधिराज सुयोधन का स्वागत कर रही है।
दुर्योधन: मामा श्री यह उपाधि आज से ही क्यों?
शकुनि: यह तो बस शुभारंभ है भविष्य का। तुम्हारे सिंहासन के नीव कर्ण पर अवस्थित है। तुम्हारी राजसत्ता युक्त बुद्धि और कर्ण के प्रतिशोध युक्त बल का समावेश अनिवार्य है और यही हस्तिनापुर के भविष्य का निर्धारक होगा।
दुर्योधन: होगा.... अवश्य होगा मामाश्री। यह समावेश पांडवों के विनाश का अवश्य होगा।
शकुनि: (मंदहास करते हुए) पांडवों के विनाश का.... पांडवों के विनाश का (मुख भंगिमा बदलते हुए, मुड़कर) नहीं... पांडवों के विनाश का नहीं, अपितु हस्तिनापुर के सर्वनाश का। भूला नहीं हूं अपने पिता की पराजय भीष्म का वो अहंकार युक्त आचरण, अपनी बहन की इच्छाओं का हनन, अपने पिता का उनकी पुत्री के लिए शोक संतप्त होना। गंधार नरेश का लज्जा से झुका शीश। परंतु यह शकुनि कुछ भी करने में अक्षम था। अहंकार था भीष्म को अपने कुल की मर्यादा पर, प्रतिष्ठा पर, अपने अहंकार में गंधार नरेश की मर्यादा को भरी सभा में जिस तरह से ललकारा वह असहनीय थी मेरे लिए। उसी दिन हस्तिनापुर की मर्यादा ध्वस्त करने का बीज मैंने अंतर में उभर चुका था। वर्षों से अपना राज वैभव त्यागकर हस्तिनापुर की सभा में पराधीन की भांति मौन धारण कर, इसी समय की प्रतीक्षा कर रहा था। अब वह समय निकट आ रहा है, जिस प्रकार भीष्म ने मेरे पिता के समक्ष भरी सभा में मेरे कुल की मर्यादा का हनन किया, उसी प्रकार मैं गंधार:नरेश शकुनि एक दिन हस्तिनापुर की सभा में, हस्तिनापुर के ही वंशज द्वारा भीष्म के समक्ष नष्ट करूंगा हस्तिनापुर की मर्यादा। अपने पिता के प्रतिशोध की शपथ पूर्ण करूंगा और जिस प्रकार मेरे पिता शीश झुका कर मौन रहने को विवश थे उसी प्रकार भीष्म भी विवश होंगे। अहंकारी भीष्म तुम्हारे वंश के विनाश कि नीव पड़ चुकी है, वह भी तुम्हारे जीवन काल में ही.... इच्छा मृत्यु प्राप्त है ना तुम्हें! जीवित रहोगे तुम अपने वंश का सर्वनाश अपनी आंखों से देखने के लिए और सब देख कर भी मौन रहने को विवश होगे। तुम्हारी यही अवस्था देखने के लिए मैं कब से व्याकुल था। कुछ समय और प्रतीक्षा करो... मेरा द्वारा हस्तीनापुर का महानाश अभी कुछ दिन और शेष है।
दुर्योधन: मामा श्री.... मामा श्री... (झकझोरता है)
शकुनी: हं..... भांजे!
दृश्य 3
(नदी का तट, कर्ण सूर्य को अर्ध्य देता है और शस्त्रास्त्रों का अभ्यास करता हुआ सामने तलवार की नोक पे सूर्य को देखते हुए स्वयं से सवाल पूछ रहा है।)
कर्ण: अहम्.... मैं.... इस एक शब्द का यथार्थ ढूंढने में मैं कर्ण अब तक अशक्षम रहा। आख़िर कौन है कर्ण? हृदय में वेदना, घृणा, तिरस्कार, अपमान की अग्नि लिए आख़िर कर्ण है कौन? नित्य तुम्हारी स्तुति करता हूँ परंतु उत्तर से वंचित रहता हूँ। सब कुछ होते हुए भी अपने अस्तित्व की खोज में अपूर्ण हूँ। अधिरथ मेरे पिता हैं। राधा मेरी माता हैं। सुयोधन् मेरा शुभचिंतक है। परंतु क्या यह सिर्फ मेरा भ्रम नहीं है। अपने आत्मद्वंद्व में जकड़ा अपने अस्तित्व की प्यास में वर्षों तप्ता रहा। द्रोण का पक्षपात, परशुराम का श्राप, मुझे मेरे अस्तित्व कि जड़ो तक पहूँचने को विवश करता रहा। ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ ही क्यों? एक न एक दिन तुम्हें उत्तर देना होगा। परंतु अभी एक एक क्षण मेरा हृदय मेरे अस्तित्व को ढूंढने में उद्विग्न है। अर्धरात्रि को अचानक नींद खुलती है तो सामने तुम्हें पाता हूँ और एक तीक्ष्ण अग्निपुंज मस्तिष्क में उतर जाता है। अब तक मैंने जो तिरस्कार और यातनाऐं सहीं वह अब प्रतिहिंसा में परिवर्तित हो रहीं हैं। परंतु अपनी प्रतिहिंसा में मैं स्वयं ही प्रताड़ित हो रहा हूँ। यह कैसी विडंबना है? द्रोण मुझे क्षत्रिय नहीं मानते, परशुराम मुझे शुद्र नहीं मानते, समाज मुझे वैध नहीं मानता। अब क्या यह कर्ण लोगों के निर्धारण का एक कोरा पृष्ठ बन गया है? जिस पर चाहे जो लिख दे। नहीं... कर्ण कोई कोरा पृष्ठ नहीं बल्कि वह अग्निपुंज है जो अपने प्रतिरोधियों को दग्ध कर दे। तो आज से इस अग्निपुंज कर्ण के जीवन का दूसरा अध्याय शुरू होगा। अभी तक जिन्होंने कर्ण के जीवन का निर्धारण किया वह सब अब कर्ण से ही परिचालित होंगे। अब सत्य और असत्य की परीभाषा मेरे व्यवहार से परे है। अब जो वर्तमान घटित सत्य है, वही मुझे स्वीकार है। और वह सत्य है सुयोधन। भरी सभा में मुझे अपने साथ में स्थान देकर उसने मेरे हृदय में स्थान पा लिया है। अब मेरी नियती यही है। अब इस कर्ण का उत्सर्ग सुयोधन के पक्ष में ही निहित है। अब जो दृष्टिगोचर है वही कर्ण का यथार्थ है और वह यथार्थ सुयोधन है। अब तक मेरा प्रारब्ध चाहे जो भी था परंतु अब कर्ण के अस्तित्व का निर्माता कर्ण स्वयं होगा।
दृश्य 4
(युद्धिष्ठिर भिमार्जुन बात कर रहे हैं। कृष्ण एक ग्वाले की भांति बहुत ही साधारण से वस्त्रों में मंच के एक कोने में कुछ कार्य कर रहें हैं।)
अर्जुन: दुर्योधन का व्यवहार आप भली-भांति जानते हैं। बाल्यकाल से लेकर आजतक उसने जो कुछ किया वह आपको पूर्ण रूपेण ज्ञात है। परंतु अब यह षड्यंत्र करके उसने विश्वास और मर्यादा की सभी सीमाऐं लांघ दी हैं।
भीम: लाक्षाग्रह का निर्माण कर, उसने जिस तरह के कायरतापूर्ण विश्वासघात किया, उसके लिए उस को दण्ड मिलना ही चाहिए। बाल्यकाल से ही उसने जिस प्रकार हमारी निर्मम हत्या का षड्यंत्र रचा है, उसने मेरे मन में प्रतिशोध की ज्वाला और भड़का दी है। आज तक हम सब कुछ मर्यादित होकर सुनते रहे। पितामह और महाराज का ध्यान रखते हुए उसकी धृष्टता सहन करते रहे। परंतु अब और सहन करना कायरता होगी भ्राता श्री।
युधिष्ठिर: प्रतिशोध से वीरता क्षीण होती है तात। हमें कोई भी कार्य उत्तेजना में नहीं करना चाहिए। सिर्फ आवेश में आकर शस्त्र उठाना वीरता नहीं है। शस्त्र उठाए बिना संयमित होकर शत्रुओं के षड्यंत्र को विफल करना ही वीरता की निशानी है। मैं तुम्हें हतोत्साहित नहीं कर रहा हूं, बस सही समय आने तक प्रतीक्षा करने की बात समझा रहा हूं। मैं स्वयं भी दुर्योधन के कुकृत्यों की समीक्षा कर रहा हूं। अभी तक उसके दोषों को क्षमा करता रहा हूं परंतु अब उसने मुझे विस्मय में डाल दिया है।
भीम: संयमित होकर ही इतने वर्षों तक हम उसके दोषों को क्षमा करते आए हैं। परंतु उसके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया, अपितू दिन-प्रतिदिन वह और क्रूर और विनाशकारी होता आया है। धीरे-धीरे पूरे राज्य पर नियंत्रण भी उसका ही होता जा रहा है। और कई बार वह राज्य पर अपने एकाधिकार को जता भी चुका है। पितामह गुरुद्रोण और स्वयं महाराज धृतराष्ट्र भी उसकी उदण्डता के प्रति उदासीन हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो राज्य होते हुए भी हम निर्वासित होंगे।
अर्जुन: भ्राताश्री बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। अब राज्य मांगने से नहीं मिलेगा। अपनी सहनशीलता हमें त्यागनी होगी। अब आपको कोई कठोर निर्णय लेना ही होगा।
युधिष्ठिर: मैं स्वयं विचाराधीन हूं अर्जुन। सिर्फ उचित समय की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
भीम: अब और प्रतीक्षा क्यों भ्राता श्री। अगर आप आज्ञा दें तो उस नराधम दुर्योधन को भरी सभा में महाराज धृतराष्ट्र के समक्ष ही बांध लाऊँ। जाने कब से मेरी भुजाएं दुर्योधन के वक्ष विदीर्ण करने को आतुर हैं।
अर्जुन: वह तो समय रहते हमें उसके षड्यंत्र का पता चल गया, वरना इस विचारगोष्ठी के लिए हम जीवित ना रह पाते।
युधिष्ठिर: इसी विषय पर निष्कर्ष के लिये द्वारकाधीश आने वाले हैं।
अर्जुन: पांचाल नरेश ने स्वयंवर का आयोजन किया है। जिसमें विजयी योद्धा पंचाली का वरण करेगा।
युधिष्ठिर: हम्म... इधर इस उहापोह में स्वयंवर पर हमारा ध्यान ही नहीं गया। और द्वारकाधीश ने भी अज्ञातवास का निर्देश देखा है।
अर्जुन: सुना है दुर्योधन भी स्वयंवर में शामिल हो रहा है।
युधिष्ठिर: दुर्योधन??
भीम: दुर्योधन दुर्योधन... दुर्योधन.... ( उठ कर चला जाता है।)
युधिष्ठर: जिस विनाश को मैं इतने वर्षों से रोकने का प्रयत्न कर रहा हूं लगता है वह जल्द ही आने वाला है। भीम के क्रोध को अब और अधिक शांत रखना बहुत कठिन है।
अर्जुन: वह तो एक न एक दिन होना ही था भ्राताश्री। आखिर दुर्योधन को उसके कर्मों का दंड मिलना भी तो आवश्यक है।
युधिष्ठिर: वह तो होना ही है। परंतु अभी नहीं। आगे द्वारकाधीश जैसा निर्देश देंगे वैसे ही होगा। वर्तमान में हमें स्वयंवर पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कोई ऐसी युक्ति करनी होगी जिससे तुम स्वयंवर में भाग ले सको।
(कृष्ण आते हैं।)
अर्जुन: नमस्कार.... आइए हम आपकी ही चर्चा कर रहे थे।
कृष्ण: मेरी या पांचाली की अर्जुन? तुम्हारे मुख पर तो कोई और ही चिंता दिखाई दे रही है।
अर्जुन: आप तो सर्वज्ञ हैं द्वारकाधीश। क्या मेरी व्याकुलता आपसे छिपी है?
युधिष्ठिर: आइए पहले आसन ग्रहण कीजिए।
(कृष्ण युधिष्ठिर को नमस्कार करते हैं।)
कृष्ण: क्या सोच रहे हो अर्जुन? जिस क्षण की तुम वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे वह क्षण अब आ चुका है। संसार के सभी धनुर्धर लक्ष्य भेदने में असफल रहे हैं।
अर्जुन: यही तो मेरी व्याकुलता का कारण है केशव।
कृष्ण: ऐसे क्षण में व्याकुलता क्यों?
युधिष्ठिर: कल स्वयंवर में दुर्योधन भी शामिल हो रहा है, ऐसा पता चला है।
कृष्ण: ओह तो यह है व्याकुलता का कारण। पर यह कोई नई बात तो है नहीं? अब.... दुर्योधन की क्षमता क्या है यह आप लोग भली-भांति जानते हैं। स्वयंवर में गदायुद्ध की शर्त तो है नहीं, उसके लिए तो धनुर्विद्या की क्षमता का परिचय देना है, जो दुर्योधन के लिए असंभव है। और यह बात दुर्योधन भी भली भांति जानता होगा। इसलिए जहाँ तक मुझे लगता है दुरयोधन स्वयं तो इस प्रतिस्पर्धा से दूर ही रहेगा। आप लोग व्यर्थ चिंता कर रहे हैं।
अर्जुन: यह तो हम जानते हैं कि दुर्योधन स्वयं प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं लेगा। परंतु मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह अपने साथ उस शुद्र कर्ण को अवश्य लाएगा। क्योंकि बल के नाम पर अगर उसके पास कुछ है, तो वह है, कर्ण। और ऐसे समय में वो कर्ण का उपयोग अवश्य करेगा। और अगर कर्ण प्रतिस्पर्धा में शामिल हुआ तो वह अवश्य ही लक्ष्य भेदन कर देगा।
कृष्ण: हाँ यह सच है। अगर अदभुत कर्ण प्रतिस्पर्धा में भाग लेगा तो वह अवश्य ही विजयी होगा।
युधिष्ठिर: और ऐसी स्थिति में अर्जुन से उसके टकराव की संभावना को भी नकारा नही जा सकता।
कृष्ण: परंतु यह परिस्थितियां तो तब बनती यदि वह एक क्षत्रिय होता। आप.... आप सब तो जानते ही हैं कि वह शुद्र है। पांचाली का वरण करना तो दूर उसका तो इस प्रतिस्पर्धा में भाग लेना ही वर्जित है। दुर्योधन के स्वार्थपूर्ण सौजन्य ने उसे हस्तिनापुर की राज्यसभा में विराजमान कर रखा है, वरना उसका उचित स्थान कहाँ है ये आप जानते हैं।
अर्जुन: दुर्योधन की मित्रता के कारण शुद्र होकर भी जिस प्रकार राज्यसभा में वह अपना आसन पा चुका है तथा एक क्षत्रिय की तरह उसका व्यवहार करना। क्या तब भी इस बात को नकारा जा सकता है की वह स्वयंवर में पांचाली का वरण नहीं करेगा।
कृष्ण: स्वयंवर में पांचाली का वरण तो वह तब करेगा जब पांचाली भी उसका वरण करे। पर क्या पांचाली उस कर्ण का वरण करेगी? असंभव.... पांचाली एक वीर सत्यनिष्ठ क्षत्रिय कन्या है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि किसी भी परिस्थिति में वो अर्जुन के अलावा कर्ण का वरण नहीं करेगी, चाहे वो प्रतिस्पर्धा में विजयी ही क्यों न हो।
युधिष्ठिर: तो फिर स्वयंवर की घोषणानुसार लक्ष्य का भेदन कौन करेगा? और ऐसी अवस्था में, लक्ष्य अपूर्ण रहा तो स्वयंवर भी नहीं हो सकता। जैसी स्थिति आ रही है वो अत्यंत जटिल है। अभी दो ही वीर हैं जो लक्ष्य को भेदने में सक्षम हैं। एक अर्जुन और दूसरा कर्ण।
कृष्ण: हाँ, अवश्य ही अभी यह दो वीर हैं जो एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी हैं। पर पांचाली का वरण सिर्फ़ एक ही करेगा और वह है अर्जुन।
अर्जुन: परंतु अभी अभी लाक्षागृह की घटना के पश्चात हमारा स्वयंवर में भाग लेना कैसे संभव है? आपके निर्देशानुसार ही हम अज्ञातवास कर रहे हैं। क्या इस समय हमारा खुद को प्रकट करना उचित होगा?
कृष्ण: हाँ.... अब तुम्हारे प्रकटीकरण का समय आ गया है क्योंकि अब वास्तव में उसकी आवश्यकता आन पड़ी है। वर्तमान में केवल तुम स्वयंवर में शामिल होगे। शेष पाण्डव, धर्मराज, भीम, नकुल, सहदेव और माता कुंती अभी यहीं अज्ञात रूप से वास करेंगे। प्रतिस्पर्धा में विजयी होने के पश्चात, पांचाली तुम्हारा वरण कर ले तदुपरांत हम सब हस्तिनापुर चलेंगे।
युधिष्ठिर: आपका निर्णय समयानुकूल है। आप आज ही अर्जुन को लेकर स्वयंवर के लिए प्रस्थान करें।
कृष्ण: प्रस्थान तो करना है परंतु एकसाथ नहीं। अर्जुन का इस तरह प्रकटीकरण उचित नहीं। अभी यह ब्राह्मण वेश में ही स्वयंवर सभा में जाएंगे। वहाँ मैं भी पृथक रहकर ही निर्देश दूंगा।
युधिष्ठिर: परंतु स्वयंवर सभा में परिचय की आवश्यकता तो पड़ेगी?
कृष्ण: इसलिए अर्जुन ब्राह्मण वेश में ही सभा में प्रवेश करेंगे। और जब तक लक्ष्य भेदन न हो जाए अपनी वास्तविक पहचान गुप्त ही रखेंगे। लक्ष्य भेदन करने के साथ ही प्रश्नचिन्ह विकल्प भी समाप्त हो जाएगा।
युधिष्ठिर: पर दुर्योधन.... क्या दुर्योधन उसे स्वीकार करेगा?
कृष्ण: दुर्योधन के स्वीकार या अस्वीकार का प्रश्न ही नहीं होगा। सभा का निर्णय सर्वोपरी होगा और उससे भी सर्वोपरी होगी पांचाली के अंतरमन की आवाज़, जो की स्वयंवर सभा में परिणाम निर्धारित करेगी। योद्धाओं के निजी प्रतिद्वंद्व नहीं। आपकी चिंता निर्मूल नहीं है। परंतु आप स्वयं धर्मज्ञ हैं। आप स्वयं जानते हैं की प्रकृति जो भी निर्धारित करेगी वो सर्वहितकारी होगा। और उसी में सबके कर्मों का भी निर्धारण होगा। विश्वास रखिये धर्मराज की ही विजय होगी। (युधिष्ठिर को नमस्कार करते हुए, अर्जुन से) अब स्वयंवर सभा मे भेंट होगी।
(युधिष्ठिर और अर्जुन नमस्कार करते हैं। कृष्ण बाहर चले जाते हैं।)
(द्रुपद की सभा लगी है। कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, कर्णपुत्र सुदामन, कृष्ण, पांचाली, ब्राह्मण वेश में अर्जुन, द्रुपद, धृष्टधुम्न, महामंत्री तथा अन्य सभासद बैठे हैं।)
महामंत्री: पांचाल राज्य की इस सभा में महाराज द्रुपद का महामंत्री महाराज की ओर से आर्यावर्त के अलग-अलग भागों से आए सभी वीरों का स्वागत करता हूं। महाराज की घोषणा सुनकर आप सभी ने अपने आतिथ्य का सुअवसर हमें प्रदान किया, उसके लिए पांचाल नरेश आपके कृतज्ञ हैं परंतु हमारा उद्देश्य यहाँ वीरों का अखाड़ा बनाना नहीं हैं बल्कि सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का चयन करना है जिसका राजकुमारी पांचाली वरण कर सके। परंतु अभी तक कोई भी वीर इस लक्ष्य के भेदन में सफ़ल नहीं रहे। ऐसी कठिन परिस्थिति में महाराज से अनुरोध करता हूँ कि वह स्वयं अपना मंतव्य प्रकट करें।
द्रूपद: मैं पंचाल का सेवक आप सभी वीरों का अभिनंदन करता हूँ। जैसा कि आप सब को यह विदित है कि राजकुमारी पांचाली के स्वयंवर के लिए वीरता व युद्ध-कौशल की शर्त रखी गई है। जिसमें विजयी वीर का राजकुमारी वरण करेंगी। परंतु हमें अभी तक ऐसा एक भी वीर दिखाई नही दिया जो इस लक्ष्य को भेदकर राजकुमारी को पाने की क्षमता रखता हो। अपनी वीरता की डींग भरने वाले एक भी क्षत्रिय राजा इस शर्त को पूरा करने में सफ़ल न हो सके। द्वापर की इस सर्वश्रेष्ठ प्रतिस्पर्धा में अपने पराक्रम से विजयश्री को प्राप्त करने वाला एक भी वीर इस सभा में नहीं है। आज मानो वसुंधरा वीरों से रहित हो गयी है। लगता है क्षत्रिय रक्त शीतल हो गया है। पूरी सभा में मुझे केवल कापुरुष ही कापुरुष नज़र आ रहे हैं।
दुर्योधन: बहुत हो चुका महाराज। आपने हमें प्रतिस्पर्धा में शामिल होने के लिए आमंत्रण दिया है या हमारा उपहास करने के लिए।
धृष्टधुम्न: उपहास नहीं वरण सत्य है। और अगर आपको ऐसा प्रतीत होता है कि आपका उपहास किया गया है तो अपना क्षत्रित्व साबित कीजिये। क्योंकि जहां तक मुझे ज्ञात है कुछ ब्राह्मणों को छोड़ दिया जाए तो उनके अलावा आज लगभग सारे क्षत्रिय अपना रण कौशल आजमा चुके हैं। आप अभी तक जाने क्या सोच रहे हैं। आप भी अपनी अभिलाषा पूरी कीजिए, महाबली।
दुर्योधन: तंज मत करो धृष्टद्युम्न, तुम्हारे इस उपहास का उत्तर भी तुम्हें दूंगा।
धृष्टद्युम्न: क्यों क्या आपको अपने महाबली होने में संदेह है? प्रतिस्पर्धा में सभी योद्धाओं ने अपना प्रदर्शन किया, सिर्फ आप ही अभी तक प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं। आप शायद यह भूल रहे हैं कि इस प्रतिस्पर्धा का आयोजन दर्शकों के लिए नहीं, अपितु सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का चयन करने के उद्देश्य से किया गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वीर क्षत्रिय शिरोमणि महाबली युवराज दुर्योधन को प्रतिस्पर्धा से पहले ही पराजय का आभास हो रहा है।
दुर्योधन: तुम अपनी हद पार कर रहे हो धृष्टद्युम्न। शायद भूल रहे हो कि वीरता की चुनौती किसे दे रहे हो। एक ही वार से पर्वतों को चूर करने वाली दुर्योधन की गदा के आघात से अनभिज्ञ हो अभी।
धृष्टद्युम्न: तुम भूल रहे हो दुर्योधन यह हस्तिनापुर के चक्षुविहीन राजा की सभा नहीं है। पांचाल नरेश द्रुपद की सभा है। और रही बात वीरता को चुनौती देने की तो हां.... दे रहा हूं.... उसे स्वीकार करो और लक्ष्य का संधान करो।
दुर्योधन: ( कर्ण की तरफ मुड़ कर) उठो अंगराज और अपने मित्र के उपहास का प्रत्युत्तर दो। इस लक्ष्य का संधान कर संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का प्रमाण दो। विजयी भव।
( कर्ण उठकर आगे बढ़ता है तथा धनुष पर बाण चड़ाकर प्रत्यंचा खींचने वाला होता है तभी पांचाली का हस्तक्षेप)
पांचाली: रुक जाओ.... आख़िर तुमने ऐसा साहस भी कैसे किया? (सभा से) क्या इस सभा में एक भी क्षत्रिय नहीं है? क्या सिर्फ कापुरुष से ही भरी पड़ी है यह सभा? क्या एक भी क्षत्रिय में सामर्थ्य शेष नहीं है जो यह शुद्र अपनी वीरता का परिचय देकर पांचाल नरेश की पुत्री को पाने की अभिलाषा रखता है। अगर ये पृथ्वी क्षत्रिय विहीन ही हो चुकी है तो मैं आजन्म अविवाहित ही रह सकती हूँ परंतु एक शुद्र से विवाह की कल्पना भी नहीं कर सकती। आज इतने क्षत्रियों के होते हुए भी इस सभा की कायरता से इस शुद्र का मनोबल इतना बढ़ गया कि यह एक क्षत्रिय कन्या से विवाह के स्वप्न देख बैठा। धिक्कार है ऐसे क्षत्रियों पर।
(कर्ण अपमान व रोष से भरकर अपने आसान की ओर बढ़ जाता है। कुछ देर नि:शब्दता फिर कृष्ण अर्जुन को संकेत करते हैं।)
कृष्ण: उठिये ब्राह्मण....
(अर्जुन उठ कर लक्ष्य का संधान कर देता है। कृष्ण पांचाली को संकेत करते हैं। वाध् यंत्र बजने लगते हैं और पांचाली अर्जुन के गले में वर माला पहना देती है।)
दुर्योधन: यह कैसा अन्याय है? जब स्वयंवर के लिए वीरता की शर्त थी तो जाती का प्रश्न कहाँ से आया?
कृष्ण: जाती का प्रश्न तो है दुर्योधन... एक क्षत्रिय होकर भी तुम यह आलोचना कैसे कर सकते हो?
दुर्योधन: कर सकता हूं। जब महाराज ने विवाह के लिए रण कौशल की शर्त रखी है तो फिर रण कुशलता को ठुकराकर जाती का प्रश्न क्यों किया जा रहा है। क्या यह उचित है कि जाति के आधार पर एक योद्धा को जो की अंगराज है, प्रतिस्पर्धा से वंचित कर उसका अपमान किया जाए?
कर्ण: रहने दो राजन..
कृष्ण: क्षत्रिय के लिए जो उचित और शास्त्र सम्मत है उसके लिए किसी औपचारिक घोषणा की आवश्यकता नहीं है। एक क्षत्रिय होने के नाते तुम भी यह भली भांति जानते होंगे कि एक क्षत्रिय कन्या एक शुद्र का वरण नहीं कर सकती। करना तो दूर ऐसा सोचना भी अपराध है।
दुर्योधन: ओह... तो एक क्षत्रिय कन्या का शुद्र से विवाह शाश्त्र सम्मत नहीं। तो क्या एक वेदपाठी ब्राह्मण से उसका विवाह शाश्त्र सम्मत है? यह कैसा पक्षपात है?
कृष्ण: इसमें पक्षपातपूर्णता कुछ भी नहीं बल्कि सब शाश्त्र सम्मत है। शास्त्रानुसार एक ब्राह्मण क्षत्रिय कन्या से विवाह कर सकता है अगर वो पहले एक ब्राह्मण कन्या से विवाह कर ले। तत्पश्चात उसका एक क्षत्रिय कन्या से विवाह करना पूर्णतः धर्मसंगत है। इसी तरह अगर एक क्षत्रिय एक वैश्य कन्या से विवाह करना चाहे तो पहले उसे एक क्षत्रिय कन्या से विवाह करना पड़ेगा। तत्पश्चात वैश्य कन्या व क्रमशः शूद्र कन्या से विवाह धर्मानुसार ही माना जाएगा। इसलिए ब्राह्मण वीर का पांचाली से विवाह सर्वथा शाश्त्र सम्मत है।
दुर्योधन: नहीं कृष्ण, तुम्हारी यह खोखली तर्कहीन दलीलें मुझे संतुष्ट नहीं कर सकती। तुम चाहे कितना भी पांडित्य दर्शाओ परंतु आज तुमने एक वीर का अधिकार छीना है। अगर वीरता प्राथमिकता है तो मैं अब भी कहता हूँ कि कर्ण को चुनौती देगा पूछो। स्वीकार हो तो अभी सभा के समक्ष निर्णय हो जाएगा की कार्य से श्रेष्ठ कौन है? देखते हैं कि कौन जीवित रहता है और कौन काम आ जाता है।
अर्जुन: (अपना वेश फेंककर) एक विजयी योद्धा के समक्ष इस तुच्छ सारथीपुत्र के किस अधिकार की बात कर रहा है दुर्योधन। यह तो मेरी चुनौती का भी अधिकारी नहीं है। इसका तो इस सभा में आना भी वर्जित होना चाहिए।
(सब चकित। सुदामन अर्जुन को पहचान कर तलवार लेकर उसकी तरफ़ दौड़ता है। अर्जुन तत्काल बाण चलाता है और बाहर निकल जाता है।)
सुदामन: कपटी अर्जुन....
(सुदामन काम आ जाता है। कर्ण अर्जुन की दिशा में बढ़ता है। दु:शासन व अन्य वीर उसे उसे रोकने की असफ़ल कोशिश करते हैं। तभी दुर्योधन तलवार अपने शीश पर रखकर उसे रोक देता है। कर्ण सुदामन को लेकर विलाप करता है।)
कर्ण: सुदामन उठो। सुना नहीं... उठो सुदामन... बेटा... सुदामन।
(दुर्योधन कर्ण को सांत्वना देने के लिए बढ़ता है पर कर्ण क्रोध से उसकी तरफ़ देखकर उसे रोक देता है। कुछ देर पश्चात, कर्ण सुदामन को गोद में उठाता है और अर्जुन की दिशा में हाथ उठाकर अपमान व पुत्रशोक से मौन में शपथ ग्रहण करता है।)
(एक विशेष कक्ष। भीष्म, धृतराष्ट्र और कर्ण बैठे हैं। दुर्योधन भीष्म के सामने खड़ा है। बाकी लोग सिर झुकाए चुप बैठे हैं।)
दुर्योधन: मैं कुछ समझा नहीं?
भीष्म: आज राज्यसभा में तुमने जो कुछ किया उसके लिये तुम्हारे अंतःकरण में कोई पश्चाताप नहीं है?
दुर्योधन: पश्चाताप? पश्चाताप क्यों पितामह?
भीष्म: हस्तिनापुर की मर्यादा को भरी सभा में निर्वस्त्र करके भी तुम्हें पछतावा नहीं हुआ?
दुर्योधन: आप यह कैसा प्रश्न कर रहे हैं पितामह? मैंने वही किया जो मुझे करना चाहिए था और जो मेरा अधिकार है। उसके लिए पश्चाताप क्यों?
भीष्म: अधिकार? भरी सभा में हस्तिनापुर की कुलवधु को निर्वस्त्र करने का अधिकार?
दुर्योधन: क्षमा करें पितामह, मैंने हस्तिनापुर की कुलवधू को निर्वस्त्र नहीं किया। सिर्फ एक स्त्री जो मेरी दासी थी उसके साथ थोड़ी क्रीडा की। और इसका मुझे अधिकार मिल चुका था।
भीष्म: इस कुकृत्य का अधिकार किसने दिया तुम्हें!
दुर्योधन: आपके धर्मराज ने।
भीष्म: धर्मराज ने तुम्हें यह अधिकार दिया कि तुम एक असहाय स्त्री के साथ ऐसा नीचतापूर्ण व्यवहार करो?
दुर्योधन: युधिष्ठिर के अधिकार देने का प्रश्न तो तब आएगा ना जब वह खुद स्वामित्व रखता हो।
भीष्म: यह मत भूलो कि पांचाली उनकी पत्नी है।
दुर्योधन: है नहीं पितामह, थी। घूत-क्रीडा में उनके हारने के साथ ही उस पर मेरा अधिकार है और उसके साथ किसी भी तरह का व्यवहार करने के लिए मुझे किसी की भी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
भीष्म: घूत क्रीडा को तुमने छल से जीता, निश्चल धर्मराज को तुमने शकुनि के षड्यंत्र से पराजित किया।
दुर्योधन: निश्चल धर्मराज? क्या युधिष्ठिर कोई अबोध बालक है पितामह? क्या वह घूत के नियमों से परिचित नहीं थे? वह सब कुछ जानता था और जानकर भी जब आपके धर्मराज ने दांव लगाया और हार गया तो क्या इसमें मेरा दोष है पितामह?
भीष्म: सर्वस्व जीत लेने के बाद भी तुम्हारी कौन सी महत्वकांक्षा अधूरी रह गई जो तुमने पांचाली का वस्त्र हरण कर कर अपने ही वंश को कलंकित किया?
दुर्योधन: पितामह मैंने जो भी किया है वह घूत क्रीड़ा के नियमानुसार ही किया है और वह सब क्रीड़ा ही का एक अंग था।
भीष्म: हस्तिनापुर की कुलवधू को भरी सभा में नग्न करना तुम्हारे लिए क्रीड़ा है। पिता, गुरु, पितामह तथा अपने कुटुंबियों जो वही उस सभा में शीश झुकाए बैठे रहे उनका स्मरण नहीं आया तुम्हें? ऐसा कुकर्म करने के बाद भी लज्जाहीन हो। अपने कृत्यों को उचित ठहरा रहे हो।
कर्ण: क्षमा करें पितामह पर उचित अनुचित का विचार करने का समय नहीं रहा।
भीष्म: अभी मैंने तुम्हें हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी है कर्ण।
कर्ण: क्षमा करें, पितामह।
भीष्म: आगे स्मरण रहे। (दुर्योधन से) हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के पुत्र और युवराज होने के नाते तुम्हारा अपने वंश तथा उसके गौरव के प्रति कोई दायित्व है या नहीं?
दुर्योधन: वंश के गौरव के प्रति आपका भी तो दायित्व है पितामह, तो फिर आपने सभा में कुछ प्रतिवाद क्यों नहीं किया?
भीष्म: क्योंकि मैं विवश था।
दुर्योधन: हाँ आपने ठीक कहा पितामह आप विवश थे। क्योंकि आप भी जानते थे कि नियमानुसार जीते गए हर व्यक्ति और हर वस्तु पर विजेता का पूर्ण अधिकार होता है। और यह बात आपके धर्मराज को भी भली भांति ज्ञात थी। परंतु यह सत्य जानते हुए भी उसने अपने राज्य, अपने भाइयों और अंत में अपनी धर्मपत्नी को दाव पर लगा दिया और अंततः सब कुछ हार गया। संयोग था कि मैं विजयी रहा क्योंकि अगर वह लोग विजयी होते या मेरी कोई वस्तु या व्यक्ति उनके अधीन होती, तो क्या पांडव उसे छोड़ देते? नहीं पितामह.... वह ऐसा कदापि ना करते। मैंने जो कुछ किया है, वह अपने अधिकार में रहकर किया है।
भीष्म: कुटिल तो तुम बाल्यकाल से थे, परंतु आज जो कलंक तुमने हस्तिनापुर के भाल पर लगाया है वह अक्षम्य है। अपनी निजी ईर्ष्या में तुमने अपने ही वंश के गौरव को धूल में मिला दिया है दुर्योधन। परंतु तुम्हारे इस कुकृत्य का दंड चाह कर भी मैं तुम्हें नहीं दे सकता।
दुर्योधन: अपने वंश के गौरव को मैंने धूल में मिलाया या युधिष्ठिर ने पितामह? पांचाली को दाव पर क्या मैंने लगाया था। अपने राज्य को पाने की लालसा में उसने स्वयं ही अपनी पत्नी को दाव पर लगाया। क्या उसका परिणाम वो नहीं जानता था?
भीष्म: नहीं क्योंकि धर्मराज तुम्हारे कपट को नहीं जानते थे।
दुर्योधन: धर्मराज धर्मराज, कैसा धर्मराज। जो घूत क्रीड़ा करे और सब कुछ हार जाने के बाद अपने अनुजों और धर्म पत्नी को दाव पर लगा दे। वह कैसा धर्मराज जिसे इतना आभास नहीं हुआ कि वो दाव पर किसे लगा रहा है।
भीष्म: तुम में और धर्मराज में यही अंतर है। वह तुम्हारी तरह नहीं सोचते?
दुर्योधन: सब कुछ स्पष्ट है फिर भी आप मुझे ही दोष दे रहे हैं। पांडवों के पक्ष में आपका झुकाव तो सदैव रहा है, नियमानुसार महाराज धृतराष्ट्र का पुत्र होने के नाते पूरे राज्य पर मेरा अधिकार होना चाहिए था पर आप लोगों के परामर्श से उस राज्य के भी टुकड़े कर उन पांडवों को दे दिया गया।
भीष्म: नियम अनुसार ही पूरे राज्य पर पांडवों का अधिकार है, तुम्हारा नहीं। महाराज पाण्डु की मृत्यु के उपरांत, पांडवों के अल्पायु को ध्यान में रखते हुए एक कार्यवाहक राजा की आवश्यकता थी इसलिए महाराज धृतराष्ट्र को सिंहासन पर बैठाया गया।
दुर्योधन: पर शास्त्रों के अनुसार तो यह स्पष्ट रूप से वर्जित है। राजा सिर्फ़ ज्येष्ठ पुत्र को बनाया जा सकता है तो महाराज पाण्डु को सम्राट कैसे बनाया गया?
भीष्म: शास्त्रों में यह भी लिखा हुआ है कि कोई भी अपंग, विकलांग या मानसिक रुप से असमर्थ व्यक्ती सम्राट नहीं बन सकता। क्योंकि राजा सिर्फ़ सिंघासन की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि राज्य की रक्षा के लिए रण में सेना का नेतृत्व भी करता है। महाराज धृतराष्ट्र जन्मांध थे, इसलिए महाराज पाण्डु को सिंघासन सौंपा गया और उनकी मृत्यु के उपरांत सिंघासन पर पाण्डुपुत्रों का अधिकार है।
दुर्योधन: हाह....तथाकथित पाण्डु पुत्र।
भीष्म: तथाकथित पाण्डुपुत्र? कहना क्या चाहते हो?
दुर्योधन: संदेह नहीं वरण सत्य है पितामह। पाण्डव वास्तव में पाण्डु पुत्र ही हैं? नहीं हैं पितामह। तो फिर उनका यह अधिकार कहाँ से आया?
भीष्म: वो पाण्डुपुत्र भी हैं, और उनका अधिकार भी है। फिर भी अगर तुम्हें इसमें संदेह है तो फिर याद रखो महाराज धृतराष्ट्र के विचित्र वीर्यपुत्र होने पर भी प्रश्न चिह्न लग जाएगा।
दुर्योधन: वर्तमान में महाराज धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र होने नाते राज्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वहण मैं आवश्य करूँगा पितामह। किसी भी परिस्थिति में अब दोबारा मैं राज्य के टुकड़े नहीं होने दूंगा। चाहे फिर इसे आप मेरा अहंकार ही क्यों न कहें।
भीष्म: पाण्डवों का सामर्थ्य जानकर भी ऐसा कह रहे हो?
कर्ण: उनका सामर्थ्य आज सभा में दिखाई दे रहा था पितामह।
भीष्म: वचनबद्ध होने की विवशता को उनकी निर्बलता समझने की भूल कर रहे हो कर्ण।
कर्ण: युवराज सुयोधन के लिए आप निश्चिंत हो जाइए पितामह। आप आज्ञा करें तो मैं सारथीपुत्र कर्ण हस्तिनापुर का राजदंड धारण कर समस्त आर्यावर्त पर दिग्विजय कर युवराज सुयोधन के चरणों में अर्पित कर दूंगा। संसार की समस्त शक्ति मिलकर भी अगर इस कार्य में बाधा बने तो मैं कर्ण उसे भी दग्ध कर दूंगा। आप बस एक बार आज्ञा करें।
भीष्म: दिग्विजय के लिए केवल बल ही चाहिए कर्ण, धर्म भी आवश्यक शर्त है। एक सच्चा योद्धा वही है जो उत्साह से लड़े आवेश में नहीं। और आज तुमने और दुर्योधन ने पांचाली के साथ सभा में जो किया है वही तुम्हारी मृत्यु के लिए पर्याप्त कारण है। निजी द्वेष और प्रतिशोध में आकर तुमने पांचाली के लिए जो अपशब्द कहे उसके लिए मैं स्वयं तुम्हें मृत्यु दंड देने की इच्छा और सामर्थ्य रखता हूँ, परंतु।
कर्ण: आपको क्रोध शोभा नहीं देता पितामह। मैं जानता हूँ। इस अवस्था में भी आपकी क्षत्रिय वृति आपको विवश कर रहा है परंतु राज्य के निर्णय लेने की अब आपकी अवस्था नहीं रही। अब आप विश्राम करें। सबकुछ युवराज सुयोधन पर छोड़ दें।
भीष्म: कर्ण.... (चीख़कर)। क्या तुम भूल गए हो कि किस से बात कर रहे हो। अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण कर सभा में विवश क्या हो गया, तुम यह समझ बैठे की तुम्हारी उद्दण्डता इतनी बढ़ गयी की मुझसे ऐसा व्यवहार करने की धृष्टता करने लगे। अगर चाहता तो उसी सभा में जिसमें तुमने हस्तिनापुर की मर्यादा को अपशब्द कहे वहीं तुम्हारा वध कर देता। परंतु दुःख है कि इस कृत्य के लिए मैं तुम्हारा और इस पापाचारी का वध नहीं कर सकता। तुम सबको इसका दण्ड तो भोगना होगा ही। आज तुम्हारे कुकृत्य ने भाविष्य में महाविनाश का बीज डाल दिया है। अब बस रणभेरी बजने की प्रतीक्षा करो। जल्द ही भीम की प्रतिज्ञा पूर्ण होगी। (दोनों हाथ फैलाकर) जाओ पुत्र विश्राम करो, इस भीष्म की विवशता तुम्हारे साथ है।
(दोनों हाथ जोड़कर चले जाते हैं।)
दृश्य 5
(द्रुपद की सभा लगी है। कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, कर्णपुत्र सुदामन, कृष्ण, पांचाली, ब्राह्मण वेश में अर्जुन, द्रुपद, धृष्टधुम्न, महामंत्री तथा अन्य सभासद बैठे हैं।)
महामंत्री: पांचाल राज्य की इस सभा में महाराज द्रुपद का महामंत्री महाराज की ओर से आर्यावर्त के अलग-अलग भागों से आए सभी वीरों का स्वागत करता हूं। महाराज की घोषणा सुनकर आप सभी ने अपने आतिथ्य का सुअवसर हमें प्रदान किया, उसके लिए पांचाल नरेश आपके कृतज्ञ हैं परंतु हमारा उद्देश्य यहाँ वीरों का अखाड़ा बनाना नहीं हैं बल्कि सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का चयन करना है जिसका राजकुमारी पांचाली वरण कर सके। परंतु अभी तक कोई भी वीर इस लक्ष्य के भेदन में सफ़ल नहीं रहे। ऐसी कठिन परिस्थिति में महाराज से अनुरोध करता हूँ कि वह स्वयं अपना मंतव्य प्रकट करें।
द्रूपद: मैं पंचाल का सेवक आप सभी वीरों का अभिनंदन करता हूँ। जैसा कि आप सब को यह विदित है कि राजकुमारी पांचाली के स्वयंवर के लिए वीरता व युद्ध-कौशल की शर्त रखी गई है। जिसमें विजयी वीर का राजकुमारी वरण करेंगी। परंतु हमें अभी तक ऐसा एक भी वीर दिखाई नही दिया जो इस लक्ष्य को भेदकर राजकुमारी को पाने की क्षमता रखता हो। अपनी वीरता की डींग भरने वाले एक भी क्षत्रिय राजा इस शर्त को पूरा करने में सफ़ल न हो सके। द्वापर की इस सर्वश्रेष्ठ प्रतिस्पर्धा में अपने पराक्रम से विजयश्री को प्राप्त करने वाला एक भी वीर इस सभा में नहीं है। आज मानो वसुंधरा वीरों से रहित हो गयी है। लगता है क्षत्रिय रक्त शीतल हो गया है। पूरी सभा में मुझे केवल कापुरुष ही कापुरुष नज़र आ रहे हैं।
दुर्योधन: बहुत हो चुका महाराज। आपने हमें प्रतिस्पर्धा में शामिल होने के लिए आमंत्रण दिया है या हमारा उपहास करने के लिए।
धृष्टधुम्न: उपहास नहीं वरण सत्य है। और अगर आपको ऐसा प्रतीत होता है कि आपका उपहास किया गया है तो अपना क्षत्रित्व साबित कीजिये। क्योंकि जहां तक मुझे ज्ञात है कुछ ब्राह्मणों को छोड़ दिया जाए तो उनके अलावा आज लगभग सारे क्षत्रिय अपना रण कौशल आजमा चुके हैं। आप अभी तक जाने क्या सोच रहे हैं। आप भी अपनी अभिलाषा पूरी कीजिए, महाबली।
दुर्योधन: तंज मत करो धृष्टद्युम्न, तुम्हारे इस उपहास का उत्तर भी तुम्हें दूंगा।
धृष्टद्युम्न: क्यों क्या आपको अपने महाबली होने में संदेह है? प्रतिस्पर्धा में सभी योद्धाओं ने अपना प्रदर्शन किया, सिर्फ आप ही अभी तक प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं। आप शायद यह भूल रहे हैं कि इस प्रतिस्पर्धा का आयोजन दर्शकों के लिए नहीं, अपितु सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का चयन करने के उद्देश्य से किया गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वीर क्षत्रिय शिरोमणि महाबली युवराज दुर्योधन को प्रतिस्पर्धा से पहले ही पराजय का आभास हो रहा है।
दुर्योधन: तुम अपनी हद पार कर रहे हो धृष्टद्युम्न। शायद भूल रहे हो कि वीरता की चुनौती किसे दे रहे हो। एक ही वार से पर्वतों को चूर करने वाली दुर्योधन की गदा के आघात से अनभिज्ञ हो अभी।
धृष्टद्युम्न: तुम भूल रहे हो दुर्योधन यह हस्तिनापुर के चक्षुविहीन राजा की सभा नहीं है। पांचाल नरेश द्रुपद की सभा है। और रही बात वीरता को चुनौती देने की तो हां.... दे रहा हूं.... उसे स्वीकार करो और लक्ष्य का संधान करो।
दुर्योधन: ( कर्ण की तरफ मुड़ कर) उठो अंगराज और अपने मित्र के उपहास का प्रत्युत्तर दो। इस लक्ष्य का संधान कर संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का प्रमाण दो। विजयी भव।
( कर्ण उठकर आगे बढ़ता है तथा धनुष पर बाण चड़ाकर प्रत्यंचा खींचने वाला होता है तभी पांचाली का हस्तक्षेप)
पांचाली: रुक जाओ.... आख़िर तुमने ऐसा साहस भी कैसे किया? (सभा से) क्या इस सभा में एक भी क्षत्रिय नहीं है? क्या सिर्फ कापुरुष से ही भरी पड़ी है यह सभा? क्या एक भी क्षत्रिय में सामर्थ्य शेष नहीं है जो यह शुद्र अपनी वीरता का परिचय देकर पांचाल नरेश की पुत्री को पाने की अभिलाषा रखता है। अगर ये पृथ्वी क्षत्रिय विहीन ही हो चुकी है तो मैं आजन्म अविवाहित ही रह सकती हूँ परंतु एक शुद्र से विवाह की कल्पना भी नहीं कर सकती। आज इतने क्षत्रियों के होते हुए भी इस सभा की कायरता से इस शुद्र का मनोबल इतना बढ़ गया कि यह एक क्षत्रिय कन्या से विवाह के स्वप्न देख बैठा। धिक्कार है ऐसे क्षत्रियों पर।
(कर्ण अपमान व रोष से भरकर अपने आसान की ओर बढ़ जाता है। कुछ देर नि:शब्दता फिर कृष्ण अर्जुन को संकेत करते हैं।)
कृष्ण: उठिये ब्राह्मण....
(अर्जुन उठ कर लक्ष्य का संधान कर देता है। कृष्ण पांचाली को संकेत करते हैं। वाध् यंत्र बजने लगते हैं और पांचाली अर्जुन के गले में वर माला पहना देती है।)
दुर्योधन: यह कैसा अन्याय है? जब स्वयंवर के लिए वीरता की शर्त थी तो जाती का प्रश्न कहाँ से आया?
कृष्ण: जाती का प्रश्न तो है दुर्योधन... एक क्षत्रिय होकर भी तुम यह आलोचना कैसे कर सकते हो?
दुर्योधन: कर सकता हूं। जब महाराज ने विवाह के लिए रण कौशल की शर्त रखी है तो फिर रण कुशलता को ठुकराकर जाती का प्रश्न क्यों किया जा रहा है। क्या यह उचित है कि जाति के आधार पर एक योद्धा को जो की अंगराज है, प्रतिस्पर्धा से वंचित कर उसका अपमान किया जाए?
कर्ण: रहने दो राजन..
कृष्ण: क्षत्रिय के लिए जो उचित और शास्त्र सम्मत है उसके लिए किसी औपचारिक घोषणा की आवश्यकता नहीं है। एक क्षत्रिय होने के नाते तुम भी यह भली भांति जानते होंगे कि एक क्षत्रिय कन्या एक शुद्र का वरण नहीं कर सकती। करना तो दूर ऐसा सोचना भी अपराध है।
दुर्योधन: ओह... तो एक क्षत्रिय कन्या का शुद्र से विवाह शाश्त्र सम्मत नहीं। तो क्या एक वेदपाठी ब्राह्मण से उसका विवाह शाश्त्र सम्मत है? यह कैसा पक्षपात है?
कृष्ण: इसमें पक्षपातपूर्णता कुछ भी नहीं बल्कि सब शाश्त्र सम्मत है। शास्त्रानुसार एक ब्राह्मण क्षत्रिय कन्या से विवाह कर सकता है अगर वो पहले एक ब्राह्मण कन्या से विवाह कर ले। तत्पश्चात उसका एक क्षत्रिय कन्या से विवाह करना पूर्णतः धर्मसंगत है। इसी तरह अगर एक क्षत्रिय एक वैश्य कन्या से विवाह करना चाहे तो पहले उसे एक क्षत्रिय कन्या से विवाह करना पड़ेगा। तत्पश्चात वैश्य कन्या व क्रमशः शूद्र कन्या से विवाह धर्मानुसार ही माना जाएगा। इसलिए ब्राह्मण वीर का पांचाली से विवाह सर्वथा शाश्त्र सम्मत है।
दुर्योधन: नहीं कृष्ण, तुम्हारी यह खोखली तर्कहीन दलीलें मुझे संतुष्ट नहीं कर सकती। तुम चाहे कितना भी पांडित्य दर्शाओ परंतु आज तुमने एक वीर का अधिकार छीना है। अगर वीरता प्राथमिकता है तो मैं अब भी कहता हूँ कि कर्ण को चुनौती देगा पूछो। स्वीकार हो तो अभी सभा के समक्ष निर्णय हो जाएगा की कार्य से श्रेष्ठ कौन है? देखते हैं कि कौन जीवित रहता है और कौन काम आ जाता है।
अर्जुन: (अपना वेश फेंककर) एक विजयी योद्धा के समक्ष इस तुच्छ सारथीपुत्र के किस अधिकार की बात कर रहा है दुर्योधन। यह तो मेरी चुनौती का भी अधिकारी नहीं है। इसका तो इस सभा में आना भी वर्जित होना चाहिए।
(सब चकित। सुदामन अर्जुन को पहचान कर तलवार लेकर उसकी तरफ़ दौड़ता है। अर्जुन तत्काल बाण चलाता है और बाहर निकल जाता है।)
सुदामन: कपटी अर्जुन....
(सुदामन काम आ जाता है। कर्ण अर्जुन की दिशा में बढ़ता है। दु:शासन व अन्य वीर उसे उसे रोकने की असफ़ल कोशिश करते हैं। तभी दुर्योधन तलवार अपने शीश पर रखकर उसे रोक देता है। कर्ण सुदामन को लेकर विलाप करता है।)
कर्ण: सुदामन उठो। सुना नहीं... उठो सुदामन... बेटा... सुदामन।
(दुर्योधन कर्ण को सांत्वना देने के लिए बढ़ता है पर कर्ण क्रोध से उसकी तरफ़ देखकर उसे रोक देता है। कुछ देर पश्चात, कर्ण सुदामन को गोद में उठाता है और अर्जुन की दिशा में हाथ उठाकर अपमान व पुत्रशोक से मौन में शपथ ग्रहण करता है।)
दृश्य 6
(एक विशेष कक्ष। भीष्म, धृतराष्ट्र और कर्ण बैठे हैं। दुर्योधन भीष्म के सामने खड़ा है। बाकी लोग सिर झुकाए चुप बैठे हैं।)
दुर्योधन: मैं कुछ समझा नहीं?
भीष्म: आज राज्यसभा में तुमने जो कुछ किया उसके लिये तुम्हारे अंतःकरण में कोई पश्चाताप नहीं है?
दुर्योधन: पश्चाताप? पश्चाताप क्यों पितामह?
भीष्म: हस्तिनापुर की मर्यादा को भरी सभा में निर्वस्त्र करके भी तुम्हें पछतावा नहीं हुआ?
दुर्योधन: आप यह कैसा प्रश्न कर रहे हैं पितामह? मैंने वही किया जो मुझे करना चाहिए था और जो मेरा अधिकार है। उसके लिए पश्चाताप क्यों?
भीष्म: अधिकार? भरी सभा में हस्तिनापुर की कुलवधु को निर्वस्त्र करने का अधिकार?
दुर्योधन: क्षमा करें पितामह, मैंने हस्तिनापुर की कुलवधू को निर्वस्त्र नहीं किया। सिर्फ एक स्त्री जो मेरी दासी थी उसके साथ थोड़ी क्रीडा की। और इसका मुझे अधिकार मिल चुका था।
भीष्म: इस कुकृत्य का अधिकार किसने दिया तुम्हें!
दुर्योधन: आपके धर्मराज ने।
भीष्म: धर्मराज ने तुम्हें यह अधिकार दिया कि तुम एक असहाय स्त्री के साथ ऐसा नीचतापूर्ण व्यवहार करो?
दुर्योधन: युधिष्ठिर के अधिकार देने का प्रश्न तो तब आएगा ना जब वह खुद स्वामित्व रखता हो।
भीष्म: यह मत भूलो कि पांचाली उनकी पत्नी है।
दुर्योधन: है नहीं पितामह, थी। घूत-क्रीडा में उनके हारने के साथ ही उस पर मेरा अधिकार है और उसके साथ किसी भी तरह का व्यवहार करने के लिए मुझे किसी की भी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
भीष्म: घूत क्रीडा को तुमने छल से जीता, निश्चल धर्मराज को तुमने शकुनि के षड्यंत्र से पराजित किया।
दुर्योधन: निश्चल धर्मराज? क्या युधिष्ठिर कोई अबोध बालक है पितामह? क्या वह घूत के नियमों से परिचित नहीं थे? वह सब कुछ जानता था और जानकर भी जब आपके धर्मराज ने दांव लगाया और हार गया तो क्या इसमें मेरा दोष है पितामह?
भीष्म: सर्वस्व जीत लेने के बाद भी तुम्हारी कौन सी महत्वकांक्षा अधूरी रह गई जो तुमने पांचाली का वस्त्र हरण कर कर अपने ही वंश को कलंकित किया?
दुर्योधन: पितामह मैंने जो भी किया है वह घूत क्रीड़ा के नियमानुसार ही किया है और वह सब क्रीड़ा ही का एक अंग था।
भीष्म: हस्तिनापुर की कुलवधू को भरी सभा में नग्न करना तुम्हारे लिए क्रीड़ा है। पिता, गुरु, पितामह तथा अपने कुटुंबियों जो वही उस सभा में शीश झुकाए बैठे रहे उनका स्मरण नहीं आया तुम्हें? ऐसा कुकर्म करने के बाद भी लज्जाहीन हो। अपने कृत्यों को उचित ठहरा रहे हो।
कर्ण: क्षमा करें पितामह पर उचित अनुचित का विचार करने का समय नहीं रहा।
भीष्म: अभी मैंने तुम्हें हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी है कर्ण।
कर्ण: क्षमा करें, पितामह।
भीष्म: आगे स्मरण रहे। (दुर्योधन से) हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के पुत्र और युवराज होने के नाते तुम्हारा अपने वंश तथा उसके गौरव के प्रति कोई दायित्व है या नहीं?
दुर्योधन: वंश के गौरव के प्रति आपका भी तो दायित्व है पितामह, तो फिर आपने सभा में कुछ प्रतिवाद क्यों नहीं किया?
भीष्म: क्योंकि मैं विवश था।
दुर्योधन: हाँ आपने ठीक कहा पितामह आप विवश थे। क्योंकि आप भी जानते थे कि नियमानुसार जीते गए हर व्यक्ति और हर वस्तु पर विजेता का पूर्ण अधिकार होता है। और यह बात आपके धर्मराज को भी भली भांति ज्ञात थी। परंतु यह सत्य जानते हुए भी उसने अपने राज्य, अपने भाइयों और अंत में अपनी धर्मपत्नी को दाव पर लगा दिया और अंततः सब कुछ हार गया। संयोग था कि मैं विजयी रहा क्योंकि अगर वह लोग विजयी होते या मेरी कोई वस्तु या व्यक्ति उनके अधीन होती, तो क्या पांडव उसे छोड़ देते? नहीं पितामह.... वह ऐसा कदापि ना करते। मैंने जो कुछ किया है, वह अपने अधिकार में रहकर किया है।
भीष्म: कुटिल तो तुम बाल्यकाल से थे, परंतु आज जो कलंक तुमने हस्तिनापुर के भाल पर लगाया है वह अक्षम्य है। अपनी निजी ईर्ष्या में तुमने अपने ही वंश के गौरव को धूल में मिला दिया है दुर्योधन। परंतु तुम्हारे इस कुकृत्य का दंड चाह कर भी मैं तुम्हें नहीं दे सकता।
दुर्योधन: अपने वंश के गौरव को मैंने धूल में मिलाया या युधिष्ठिर ने पितामह? पांचाली को दाव पर क्या मैंने लगाया था। अपने राज्य को पाने की लालसा में उसने स्वयं ही अपनी पत्नी को दाव पर लगाया। क्या उसका परिणाम वो नहीं जानता था?
भीष्म: नहीं क्योंकि धर्मराज तुम्हारे कपट को नहीं जानते थे।
दुर्योधन: धर्मराज धर्मराज, कैसा धर्मराज। जो घूत क्रीड़ा करे और सब कुछ हार जाने के बाद अपने अनुजों और धर्म पत्नी को दाव पर लगा दे। वह कैसा धर्मराज जिसे इतना आभास नहीं हुआ कि वो दाव पर किसे लगा रहा है।
भीष्म: तुम में और धर्मराज में यही अंतर है। वह तुम्हारी तरह नहीं सोचते?
दुर्योधन: सब कुछ स्पष्ट है फिर भी आप मुझे ही दोष दे रहे हैं। पांडवों के पक्ष में आपका झुकाव तो सदैव रहा है, नियमानुसार महाराज धृतराष्ट्र का पुत्र होने के नाते पूरे राज्य पर मेरा अधिकार होना चाहिए था पर आप लोगों के परामर्श से उस राज्य के भी टुकड़े कर उन पांडवों को दे दिया गया।
भीष्म: नियम अनुसार ही पूरे राज्य पर पांडवों का अधिकार है, तुम्हारा नहीं। महाराज पाण्डु की मृत्यु के उपरांत, पांडवों के अल्पायु को ध्यान में रखते हुए एक कार्यवाहक राजा की आवश्यकता थी इसलिए महाराज धृतराष्ट्र को सिंहासन पर बैठाया गया।
दुर्योधन: पर शास्त्रों के अनुसार तो यह स्पष्ट रूप से वर्जित है। राजा सिर्फ़ ज्येष्ठ पुत्र को बनाया जा सकता है तो महाराज पाण्डु को सम्राट कैसे बनाया गया?
भीष्म: शास्त्रों में यह भी लिखा हुआ है कि कोई भी अपंग, विकलांग या मानसिक रुप से असमर्थ व्यक्ती सम्राट नहीं बन सकता। क्योंकि राजा सिर्फ़ सिंघासन की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि राज्य की रक्षा के लिए रण में सेना का नेतृत्व भी करता है। महाराज धृतराष्ट्र जन्मांध थे, इसलिए महाराज पाण्डु को सिंघासन सौंपा गया और उनकी मृत्यु के उपरांत सिंघासन पर पाण्डुपुत्रों का अधिकार है।
दुर्योधन: हाह....तथाकथित पाण्डु पुत्र।
भीष्म: तथाकथित पाण्डुपुत्र? कहना क्या चाहते हो?
दुर्योधन: संदेह नहीं वरण सत्य है पितामह। पाण्डव वास्तव में पाण्डु पुत्र ही हैं? नहीं हैं पितामह। तो फिर उनका यह अधिकार कहाँ से आया?
भीष्म: वो पाण्डुपुत्र भी हैं, और उनका अधिकार भी है। फिर भी अगर तुम्हें इसमें संदेह है तो फिर याद रखो महाराज धृतराष्ट्र के विचित्र वीर्यपुत्र होने पर भी प्रश्न चिह्न लग जाएगा।
दुर्योधन: वर्तमान में महाराज धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र होने नाते राज्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वहण मैं आवश्य करूँगा पितामह। किसी भी परिस्थिति में अब दोबारा मैं राज्य के टुकड़े नहीं होने दूंगा। चाहे फिर इसे आप मेरा अहंकार ही क्यों न कहें।
भीष्म: पाण्डवों का सामर्थ्य जानकर भी ऐसा कह रहे हो?
कर्ण: उनका सामर्थ्य आज सभा में दिखाई दे रहा था पितामह।
भीष्म: वचनबद्ध होने की विवशता को उनकी निर्बलता समझने की भूल कर रहे हो कर्ण।
कर्ण: युवराज सुयोधन के लिए आप निश्चिंत हो जाइए पितामह। आप आज्ञा करें तो मैं सारथीपुत्र कर्ण हस्तिनापुर का राजदंड धारण कर समस्त आर्यावर्त पर दिग्विजय कर युवराज सुयोधन के चरणों में अर्पित कर दूंगा। संसार की समस्त शक्ति मिलकर भी अगर इस कार्य में बाधा बने तो मैं कर्ण उसे भी दग्ध कर दूंगा। आप बस एक बार आज्ञा करें।
भीष्म: दिग्विजय के लिए केवल बल ही चाहिए कर्ण, धर्म भी आवश्यक शर्त है। एक सच्चा योद्धा वही है जो उत्साह से लड़े आवेश में नहीं। और आज तुमने और दुर्योधन ने पांचाली के साथ सभा में जो किया है वही तुम्हारी मृत्यु के लिए पर्याप्त कारण है। निजी द्वेष और प्रतिशोध में आकर तुमने पांचाली के लिए जो अपशब्द कहे उसके लिए मैं स्वयं तुम्हें मृत्यु दंड देने की इच्छा और सामर्थ्य रखता हूँ, परंतु।
कर्ण: आपको क्रोध शोभा नहीं देता पितामह। मैं जानता हूँ। इस अवस्था में भी आपकी क्षत्रिय वृति आपको विवश कर रहा है परंतु राज्य के निर्णय लेने की अब आपकी अवस्था नहीं रही। अब आप विश्राम करें। सबकुछ युवराज सुयोधन पर छोड़ दें।
भीष्म: कर्ण.... (चीख़कर)। क्या तुम भूल गए हो कि किस से बात कर रहे हो। अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण कर सभा में विवश क्या हो गया, तुम यह समझ बैठे की तुम्हारी उद्दण्डता इतनी बढ़ गयी की मुझसे ऐसा व्यवहार करने की धृष्टता करने लगे। अगर चाहता तो उसी सभा में जिसमें तुमने हस्तिनापुर की मर्यादा को अपशब्द कहे वहीं तुम्हारा वध कर देता। परंतु दुःख है कि इस कृत्य के लिए मैं तुम्हारा और इस पापाचारी का वध नहीं कर सकता। तुम सबको इसका दण्ड तो भोगना होगा ही। आज तुम्हारे कुकृत्य ने भाविष्य में महाविनाश का बीज डाल दिया है। अब बस रणभेरी बजने की प्रतीक्षा करो। जल्द ही भीम की प्रतिज्ञा पूर्ण होगी। (दोनों हाथ फैलाकर) जाओ पुत्र विश्राम करो, इस भीष्म की विवशता तुम्हारे साथ है।
(दोनों हाथ जोड़कर चले जाते हैं।)
अंक दो
दृश्य 7
(राज्यसभा में सभासद बैठे हुए हैं। द्वारपाल की आवाज आ रही है।)
द्वारपाल: हस्तिनापुर के चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीपति धृतराष्ट्र के अग्रज सुपुत्र युवराज सुयोधन पधार रहे हैं।
(दुर्योधन का प्रवेश। द्रोण, भीष्म, धृतराष्ट्र को छोड़ अधिकतर लोग खड़े हो जाते हैं। दुर्योधन पितामह, द्रोण और धृतराष्ट्र को प्रणाम करता है।)
द्वारपाल: वासुकिनंदन, द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण पधार रहे हैं।
(कृष्ण के आते ही दुर्योधन को छोड़कर सब खड़े हो जाते है। कृष्ण भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र का अभीवादन करते हैं। प्रतिउत्तर में वह भी अभिवादन करते हैं। दुर्योधन सिर हिलाता है।)
धृतराष्ट्र: आइये द्वारिकाधीश, आपका स्वागत है। आसन ग्रहण करें।
कृष्ण: इस आतिथ्य के लिए मैं आपका कृतज्ञ हूँ महाराज, परंतु आज द्वारिकाधीश नहीं सिर्फ़ पाण्डवों का एक संदेशवाहक आपके सामने खड़ा है।
पितामह: कम से कम आसन तो ग्रहण करें केशव, फिर अपना औचित्य प्रकट करें। हम आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे।
कृष्ण: आपके इस मृदू आतिथ्य के लिए कटिश: धन्यवाद महात्मन। परंतु अभी मेरे लिए अपने दायित्व के निर्वहण में विलंभ करना अनुचित होगा।
धृतराष्ट्र: आप जैसा उचित समझे नि:संकोच प्रकट करें।
कृष्ण: जी हाँ इसीलिए मैं स्वयं सभा में पाण्डवों के दूत के रूप में आया हूँ। जैसा की आप सबको विदित होगा की शर्त के अनुसार पाण्डव अपने बारह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के कठनि अज्ञातवास को पुरा कर हस्तिनापुर लौट आये हैं। उनके कुल वनवास की तथा अज्ञातवास की अवधी अखण्ड रूप से पूर्ण हो चुकी है। अब शर्त के अनुसार पाण्डवों का आधा राज्य उन्हें वापस मिलना चाहिए। अतः मैं महाराज से अनुरोध करता हूँ की पाण्डवों को उनका आधा राज्य सौंप कर अपनी घोषणा पूर्ण करें।
दुर्योधन: यह नहीं हो सकता।
कृष्ण: अभी मैं महाराज धृतराष्ट्र से बात कर रहा हूँ।
दुर्योधन: परंतु यहाँ पर और भी सभासद मौजूद हैं। युवराज सुयोधन भी जो इस राज्य का कार्यवाहक और युवराज भी है।
कृष्ण: सिर्फ़ युवराज।
दुर्योधन: आप क्या समझते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं, और जो प्रस्ताव आप लेकर आए हैं वह दुर्योधन की सम्मति के बिना असंभव है।
कृष्ण: अब असंभव का क्या कारण हो सकता है।
दुर्योधन: बहुत से कारण हो सकते हैं।
कृष्ण: शायद तुम भूल रहे हो की राज्य वापस करने की शर्त क्या है?
दुर्योधन: मैं नहीं आप भूल रहे हैं कृष्ण।
कृष्ण: मैं भी तो सुनु आख़िर शर्त है क्या?
दुर्योधन: वही है जो आपने अभी अभी कहा।
कृष्ण: तो फिर आपत्ती क्या है? शर्त के अनुसार उन्हें बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पुरा करना था और वह अब पुरा हो चूका है।
दुर्योधन: किसने कहा कि वनवास पुरा हो चूका है। आपके उस तथाकथित धर्मराज ने?
कृष्ण: हां धर्मराज ने, और न सिर्फ़ धर्मराज बल्कि यहाँ सभा में उपस्थित सबको यह विदित है।
दुर्योधन: धर्मराज की उपाधि धारण कर युद्ध से भयभीत उस कायर ने तुम्हें कहा और तुम चले आए?
पितामह: अनर्गल प्रलाप से परहेज करो दुर्योधन।
दुर्योधन: आप कुछ नहीं जानते पितामह।
कृष्ण: आख़िर तुम कहना क्या चाहते हो?
दुर्योधन: वही जो मुझे ज्ञात है। शर्त के अनुसार उन्होने बारह वर्ष का वनवास तो पुरा किया है। परंतु अज्ञातवास नहीं, वह अब भी अपूर्ण है। खंडित है। और इसीलिए शर्त के अनुसार ही उन्हें पूनः वनवास काटना पड़ेगा।
कृष्ण: मूर्खतापूर्ण बाते मत करो दुर्योधन।
दुर्योधन: वह आप कर रहे है।
कृष्ण: शर्त पूरी हो चुकी है। अब पाण्डवों के साथ न्याय होना चाहिए।
दुर्योधन: मैं नहीं मानता।
कृष्ण: तुम्हारे मानने न मानने से क्या होता है।
दुर्योधन: सब कुछ होता है।
कृष्ण: मैं महाराज धृतराष्ट्र से न्याय मांगता हूँ।
दुर्योधन: आप भूल रहे हैं। आप किसके सामने खड़े हैं।
कृष्ण: मैं महाराज धृतराष्ट्र की सभा में हूँ।
दुर्योधन: महाराज धृतराष्ट्र की सभा में हस्तिनापुर का कार्यवाहक, राज्य के निर्णय लेने में स्वतंत्र धृतराष्ट्र पुत्र सुयोधन भी उपस्थित है।
कृष्ण: परंतु मेरे लिए नहीं,मैं महाराज से पाण्डवों के लिए न्याय मांगता हूँ।
दुर्योधन: जाइये कृष्ण, समय नष्ट न कीजिए, वनवास की तैयारी करीये।
धृतराष्ट्र: रुको सुयोधन, कृष्ण को अपनी बात पूरी करने दो। आप कहिये कृष्ण।
कृष्ण: महाराज मुझे जो कुछ कहना था मैंने कह दिया। आप मेरे यहाँ आने का प्रयोजन जान चुके हैं। अब आप ही उचित निर्णय दें।
धृतराष्ट्र: निर्णय तो होगा परंतु सुयोधन के पक्ष पर भी विचार करना न्यासंगत होगा।
द्रोण: यह क्या महाराज, आप सब कुछ जान चुके हैं फिर निर्णय देने में असमर्थ क्यों हैं? जब शर्त पूरी हो चुकी है तो पाण्डवों को आधा राज्य देने में विलंभ क्यों?
दुर्योधन: अभी शर्त पूर नहीं हुई गुरूदेव। आपको शायद ज्ञात न हो परंतु पाण्डवों का अज्ञातवास खंडीत हो चुका है इसीलिए शर्त अनुसार उन्हें राज्य से वंचित होना पड़ेगा।
कृष्ण: अगर महाराज अपना निर्णय प्रकट करना नहीं चाहते या उन्हें कोइ भ्रम है तो उनका विचार मैं उनसे ही जानना चाहूँगा।
दुर्योधन: क्या धूर्तता है।
कृष्ण: वाणी पर नियंत्रण रखो दुर्योधन।
दुर्योधन: आप अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें कृष्ण, दूत की मर्यादा का ध्यान रखें। हमारी सभा में दूतों से ऐसे ही बात की जाती है।
कृष्ण: ठीक है। अगर महाराज मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं देना चाहते या उन्हें कोई संदेह है, तो मेरा एक और प्रस्ताव है। आधे राज्य के बजाए अगर पांच ग्राम भी पाण्डवों को दे दिये जाऐ तो पाण्डव संतुष्ट हो सकते हैं।
दुर्योधन: आप बाज़ार में नहीं हस्तिनापुर की राज्य सभा में खड़े हैं। ऐसी मोल-तोल आपको शोभा नहीं देती कृष्ण।
कृष्ण: मैं महाराज से न्याय मांगता हूँ।
दुर्योधन: न्याय साक्ष्य पर मिलता है कृष्ण, मोल-तोल से नहीं।
कृष्ण: महाराज से मेरा अनुरोध है कि इस पर विचार प्रकट करें और जो भी शास्त्रसम्मत हो वह निर्णय दें।
दुर्योधन: अपना शास्त्रसम्मत विचार अपने पास रखो। अगर राज्य चाहिए तो युद्ध करो और आधा क्या पुरा राज्य ले लो।
कृष्ण: “धर्मो रक्षति रक्षित:” जो धर्म की रक्षा करते हैँ। धर्म उनकी रक्षा करता है। धर्म से ही सृष्टि चालित है। अपने अंधकूप अहंकार से बाहर निकलो दुर्योधन, फिर से विचार करो।
दुर्योधन: युद्ध से भयभीत होने वाले ही धर्म और शास्त्र की बातें करते हैं कृष्ण। जिसके पास शक्ति है वह जो भी करता है वही न्याय है वही धर्म है। एक कुत्ते को छोड़िए क्या वह जहाँ जायेगा वहाँ आपका अधिकार होगा? नहीं... परंतु, वहीं एक घोड़े को छोड़ कर देखिए और गर्व से कहिये वह जहाँ जायेगा वह मेरा होगा और सबको मेरी अधीनता स्वीकार करनी होगी। और यही सिधांत अश्वमेध यज्ञ है। अभी चक्रवर्ती मैं हूँ और मेरा हर एक कार्य धर्मसंगत है।
कृष्ण: “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत”
“अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृज्याम्यहम्”
“परात्रानाय साधुनामं विनाशाय च दुष्कृताम”
“धर्मसंस्थापनार्थाय संभवानी युगे युगे”
तुम्हारा यह अहं तुम्हारे सिंहासन की नींव ध्वस्त करेगा दुर्योधन। समय रहते न्याय को स्वीकार कर लो वरना......
दुर्योधन: वरना क्या... तो तुम स्वयं को सबको दण्ड देने वाला समझते हो? हाह..... एक कायर को तुमने धर्मराज घोषित कर दिया और बदले में उस भीरू ने तुम्हें नारायण मान लिया। वाह..... धर्म,न्याय,मर्यादा, निती.... कैसी वाकचाटूकारिता है? जिसने एक मायावी को ईश्वर की संघ्या दिला दी। परंतु वह कायर भी क्या करते? धर्म और न्याय की आड़ में अपनी भीरूता छुपाने का रास्ता ढूंढ लिया।
कृष्ण: दुर्योधन। पाण्डवों का सामर्थ्य क्या है, ये तुम अच्छी तरह जानते हो। तुम तो स्वयं भीम को आज़मा चुके। फिर भी ऐसी निरर्थक बातें कर रहे हो। पाण्डवों ने अनावश्यक मानवसंहार से बचने के लिए न्याय का प्रस्ताव देकर मुझे भेजा। परंतु तुम अपने दंभ से ही अपने सर्वनाश की ओर जा रहे हो तो भला मैं क्या कर सकता हूँ। अब भी समय है। अपने अहंकार को त्याग धर्मसम्मत सोचो, इसी में तुम्हारा कल्याण है।
दुर्योधन: किसे धमकी दे रहे हैं कृष्ण? अब अपने कल्याण का मार्ग मुझे तुमसे सीखने की आवश्यक्ता नहीं। अभी तक आपका सम्मान करके मैं मर्यादा का पालन कर रहा हूँ, परंतु तुम एक दूत की मर्यादा लाँघ रहे हो। शास्त्र की शिक्षा मुझे दे रहे हो? और जिस संहार कि धमकी दे रहे हो उसे सुयोधन अपने पैरो तले रखता है।
कृष्ण: दुर्योधन अब भी समय है रुक जाओ, महानाश को आमंत्रित मत करो।
दुर्योधन: क्यों? मेरी गलितयाँ गिन रहे हो क्या? मैं शिशुपाल नहीं हूँ कृष्ण?
कृष्ण: "परस्वहरणे युंक्तं परणराअभिमर्षकम् त्यज महादुरात्मनं यशं प्रवृतं यथा:"
सभा की मर्यादा का ध्यान कर तुम्हारी नीचता को क्षमा कर रहा हुँ, मुझे विवश मत करो दुर्योधन।
दुर्योधन: क्षमा.. क्षमा... क्षमा.. क्षमा शोमती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो दंतहीन, विषरित विनय सरल हो.. कृष्ण क्षमा करने के लिए बलवान होना आवश्यक है।
द्रोण: महाराज आप चुप क्यों हैं। अब आपके निर्णय पर ही सब कुछ निर्धारित है।
कृष्ण: हाँ महाराज मैं आपका और राज्यसभा का निर्णय जानना चाहता हूँ।
दुर्योधन: सुयोधन का निर्णय ही राज्यसभा का निर्णय है। और यह तुम जितनी जल्दी समझ जाओ अच्छा होगा।
पितामह: दुर्योधन कम से कम औपचारीक शिष्टता का तो पालन करो। इस सभा में तुम्हारे वरीष्ट भी मौजूद हैं।
दुर्योधन: क्षमा करें पितामह परंतु मेरे यह शब्द द्वारिकाधीश कृष्ण के लिए नहीं अपितु एक समान्य दूत कृष्ण के लिए थे। क्यों कृष्ण ?
कृष्ण: महाराज मैं अब तक आपके निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मुझे आज्ञा दें।
धृतराष्ट्र:मैं असमंजस में हूँ कृष्ण। पाण्डवों से मुझे सहानुभूति है, परंतु सुयोधन के पक्ष को भी पुर्णतः नकार नहीं सकता।
दुर्योधन: उत्तर मिल गया कृष्ण? या अब भी संदेह है?
कृष्ण: ठीक है। परंतु अब आनेवाले महानाश के दोषी तुम स्वयं ही होगे। अब जो संहार होगा वह दोष तुम्हारा होगा।
दुर्योधन: यह बार बार जो युद्ध की धमकी मुझे दे रहे हो तो अच्छी तरह समझ जाओ, पाण्डवों को पांच ग्राम तो क्या सुइं की नोक मात्र भी भूमी नहीं मिलेगी दुर्योधन के जीते जी और इसके लिए अगर महानाश आता है तो आ जाए। एक बात और ध्यान रखो दूत की भी एक मर्यादा होती है। कहीं ऐसा न हो की इस कृत्य के लिए इसी सभा में तुम्हें दंडित होना पड़े। आख़िर तुम हो ही क्या एक तुच्छ दूत के सिवा। तुम्हारा अस्तित्व ही क्या है सुयोधन की सभा में।
कृष्ण: अग़र पहले समझे नहीं तो दोबारा बता देता हूँ दुर्योधन। जब भी धरती पर स्थापित धर्म की हानि होती है, पाप पुण्य पर हावी होता है, धर्म का ह्रास होता है, तब मैं ही धरा पर अवतरित होता हूं। हर युग में सज्जनों की रक्षा के लिए इस धरा पर आता हूं। दुष्टों का विनाश कर धर्म की स्थापना मैं ही करता हूं बारंबार।
" प्रकृतिम स्वमवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः |
भूतग्रामीममं कृत्स्नमवशम प्रकृतेवर्शात || "
मैं प्रकृति को अपने वश में करके समस्त जीवों को उनके कर्मफल अनुसार बारंबार रचता हूं।
" अजो अपी सन्नव्यायात्मा भूतनामीक्षरोभपी सन |
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया || "
मैं अजन्मा कभी ना नष्ट होने वाली आत्मा हूं। इस सकल सृष्टि का स्वामी भी मैं ही हूं, सभी जीव अजीव प्रकृति मेरे ही नियंत्रण में है। मैं 'योग-माया' संकल्प से इस सृष्टि में प्रकट होता हूं। मेरा रूप देखना चाहते हो? क्या क्या देख सकते हो? वेदों को पुनः स्थापित करने वाला मत्स्य मैं ही हूं। हिरण्यकक्ष संघारक, पृथ्वी को अपने दंत पर धारण करने वाला वरहा भी मैं ही हूं। मंदर पर्वत को अपने कवच पर धारण करने वाला कुंभ मैं ही हूं। जिसका सर सिंह का है और धड़ पुरूष का वह भक्त रक्षक नरसिंह भी मैं ही हूं। तीन पग में तीन लोक समाहित करने वाला वामन भी मैं ही हूं। परशु धारण करने वाला शत्रुओं का विनाशक परशुराम मैं ही हूं। मर्यादा को स्थापित करने वाला वह राम भी मैं ही हूं। और यह सब जिसमें समाहित हैं मैं वो नीतिज्ञ कृष्ण हूं। अभी तक मैं तेरा सब अनर्गल प्रलाप सहन कर रहा था इस आशा में कि तुझे सद्बुद्धि आएगी। आधे राज के बदले सिर्फ पांच ग्राम ही मांगे पर यह सभा साक्षी है कि तूने अपने अहंकार पूर्ण व्यवहार से न सिर्फ पांडवों के साथ अन्याय किया, अपितु मेरा भी उपहास किया। अब यह सभा मुझे दोष ना दे। महाराज धृतराष्ट्र, गुरु द्रोण और पितामह भीष्म साक्षी हैं। भविष्य के महानाश का उत्तरदायी तू होगा। मैं द्वारिकाधीश कृष्ण, महाराज धृतराष्ट्र के समक्ष इस राज्यसभा में पांडवों के पक्ष से युद्ध की घोषणा करता हूं। महारथियों की रक्तरंजित कुरुक्षेत्र की धरती वर्षों तक इस युद्धागनी के प्रलय की साक्षी रहेगी। हां..... अब युद्ध अपरिहार्य है। चलता हूं।
(कर्ण आता है। कृष्ण जाते-जाते एक क्षण रुक कर देखते हैं फिर चले जाते हैं।)
(दुर्योधन सहमा खड़ा है। कर्ण रोषयुक्त अहम से, सांत्वना पूर्ण उसके कंधे पर हाथ रखता है।)
दुर्योधन: कर्ण...
कर्ण: कृष्ण अगर अनादि है तो कर्ण भी अनंत है। और अनंतकाल तक ये कर्ण तुम्हारे साथ है राजन।
दृश्य 8
(कर्ण आंखों पर पट्टी बांध कर कुछ सैनिकों के साथ अभ्यास कर रहा है। कुछ देर बाद रोषयुक्त होकर वो एक सैनिक को पटक देता है तथा उसे बाहुकण्ठक दाव में फसा लेता है। सैनिक तड़पने लगता है। तभी कर्ण को होश आने का आभास होता है और वो सैनिक को उठाकर सभी से हाथ जोड़कर क्षमा मांगता है। कर्ण जाकर बरतन से जलपान करता है तभी पीछे से कृष्ण का प्रवेश।)
कर्ण: स्वागत है द्वारिकाधीश! इस सुतपुत्र के घर में आपका स्वागत है।
कृष्ण: (मुसकुराते हुए) स्वयं को सुतपुत्र कहकर मुझे क्या साबित करना चाहते हो कर्ण?
कर्ण: द्वारिकाधीश कृष्ण को भला मैं क्या साबित कर सकता हूँ। मेरी तो ऐसी धृष्टता भी अक्षमय होगी।
कृष्ण: धृष्टता और वो भी दानवीर कर्ण की? तुम्हारे अभिनंदन का यह स्वरूप वाकई हास्यास्पद है कुंतीपुत्र।
कर्ण: नहीं कृष्ण, सारथीपुत्र। अब शायद कुंतीपुत्र का सम्बोधन अधिक हास्यास्पद होगा।
कृष्ण: यह हास्यास्पद नहीं अपितु वास्तविकता है कर्ण। और अब जब की सबको यह विदित हो चूका है तो इस वास्तविकता को नकारना सत्यता के साथ बेईमानी होगी।
कर्ण: वास्तविकता, सत्यता। यह वास्तविकता ठीक युद्ध से पहले ही क्यूँ विदित हो रही है। जिस अतीत के साथ मैं अभी तक जिया उसी अतीत के साथ अब जीना बेईमानी क्यूँ होगी?
(कर्ण सेवक को आसन के साथ बुलाता है। कृष्ण आसन छोड़ जानकर नीचे ज़मीन पर बैठ जाते हैं।)
कृष्ण: क्यों की जो सत्य है वह पहले भी था और अब भी है और भविष्य में भी रहेगा। सिर्फ़ उसके प्रकटीकरण का समय प्रकृति निर्धारित करती है।
(कर्ण जानबूझकर ऊपर अपने सिंघासन पर बैठ जाता है।)
कर्ण: नीतिज्ञ कृष्ण की तरह मैं सर्वज्ञानी तो नहीं पर बहुत प्रयत्न के उपरांत भी मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ की अभी ठीक युद्ध से पहले ही यह सत्य यूँ उदघाटित क्यों हो रहा है, अभी ही मुझे कुंतीपुत्र क्यूँ स्वीकारा जा रहा है। जब वास्तव मे मुझे उस नाम की, उस माँ की, उस ममता की, उस सामाजिक प्रतिष्ठा की आवश्यकता थी उस समय क्यूँ नहीं। नहीं द्वारिकाधीश आपका यह महासत्य अब सत्य हो तो भी यह पूर्णता हास्यास्पद है।
कृष्ण: समय और कर्म के सूक्ष्म स्वरूप को तुम पूर्णतः समझ नहीं पाए अंगराज। प्रकृति के शाश्वत विधान को पूर्णतः समझ नहीं सके। जो समय त्वरित गति से गतिमान होता है। प्रत्येक क्षण में कर्म के भाव बदलते रहते हैं। एक क्षण में जो कार्य अनुिचत जान पड़ता है अगले ही क्षण सही व न्यायसंगत प्रतीत होता है। सृष्टि की हर वह घटना अप्र्तज्ञ रूप से एक दूसरे के पूरक होती है जो बाद में अपने पूर्वनिर्धारित होने की पुष्टि अपने कर्मों से करती हैं। स्वयं वह प्रकृति भी इस घटनाचक्र का एक हिस्सा है। आज जो परिस्तिथि है वह भी पूर्वनिर्धारित तथा भविष्य के मानवजीवन और उसके भाव से जुड़ी होती है। वस्तुतः हर एक घटना चाहे वह किसी व्यक्ति विशेष के लिए दुःखद ही क्यूँ न हो उसका भाव किसी दूसरी घटना के सकारात्मक पूरक की भाँती जुड़ी होती है। इसीलिए व्यक्तिगत घटनाओं से क्षुब्ध होकर अपने दायित्व का निर्वाहण न करना अकर्मण्यता की निशानी है।
कर्ण: आपकी प्रकृति का यह कर्मविधान निश्चित ही शाश्वत है। परंतु व्यवहारिक नहीं। आपका यह कर्मविधान मेरे उस लज्जित, तिरस्कृत, मातृविहीन बचपन की दुरावस्था अपमान के वह क्षण लौटा नहीं सकते। जहाँ तक अकर्मण्यता का सवाल है। तो वह मेरे लिए निरर्थक है। मेरे दायित्व के सामने कोई अंधेरे नहीं हैं। वह अटल है।
कृष्ण: बेशक अपने दायित्व से तुम पीछे नहीं हटोगे। परंतु सिर्फ युद्ध करने को ही तुम दायित्व नहीं कह सकते। सिर्फ़ युद्ध करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सत्य के साथ कटिबद्ध होना भी महत्वपूर्ण है।
कर्ण: परंतु इस सत्य का निर्धारण कोन करेगा कृष्ण? अभी आपने कहा की सत्य का पक्ष समय के साथ बदलता रहता है। एक क्षण में जो कार्य गलत लगता है, दूसरे क्षण वह कार्य सही और न्यायसंगत लगता है। दरअसल हम स्वयं ही उसका निर्धारण करते हैं। अभी हम जिस अवस्था मे हैं। उस में आप पांडवो के साथ खड़ा होना सही मानते हैं। जबकी मैं अपने आश्रयदाता सुयोधन के पक्ष युद्ध करना अपना कर्तव्य मानता हूँ।
कृष्ण: दुर्योधन के लिए युद्ध करने के तुमहारे व्यक्तिगत कारण हो सकते है, परंतु आज जो कुछ भी सभा में हुआ वो तुम्हें भी विदित है। उसे जानकर भी क्या तुम्हें लगता है की जिस पक्ष में तुम हो वो न्यायसंगत है?
कर्ण: सही और गलत का निर्धारण करने का मेरा अधिकार कहां है। परंतु कभी कभी सही और गलत का फ़र्क़ समझते हुए भी अनचाहे रास्तों पर चलना मनुष्य की विवशता हो जाती है। और यह सिर्फ़ आज पहली बार राज्यसभा मे नहीं हुआ, अपितु पहले भी राज्यसभा ऐसे महान कुकृत्यों की साक्षी रह चुकि है। अगर आज की घटना अनुिचत है तो फिर उसे क्या कहेंगे जब उसी सभा मे मुझे नीच कहकर प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया गया था। उसे क्या कहेंगे जब स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर द्रौपदी को जूए के दांव पर लगा रहे थे, जब द्रौपदी का चीरहरण समस्त गुरुजनों के समक्ष हो रहा था। इतने अन्याय पर भी मैं चुप रहने को विवश था और मैं ही नहीं बल्कि पितामह भीष्म भी चुप रहे। और ऐसा सिर्फ़ इसलिए की अपने व्यवहारिक दायित्व को पूर्ण कर सकें और मैंने भी यही किया।
कृष्ण: न्याय और अन्याय में विभेद करने में पूर्णत: सक्षम हो, फिर भी इतने सभासदों के बीच एक निर्बल स्त्री निर्वस्त्र की जा रह थी, लज्जा से सिमटी पड़ी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक परकटे पक्षी की तरह याचना कर, आस मे तुम्हारी तरफ़ मुड़ी, तब तुमने कोनसे व्यवहारिक दायित्व का परिचय दिया कर्ण? दानवीर कर्ण एक अबला स्त्री को सम्मान न दे सका?
कर्ण: यह अपराध मैं स्वीकार करता हूँ। अभी तक मैंने जो भी कार्य किये हैं उन्हें मैं सही व न्यायसंगत ठहरा सकता हूँ। लेकिन अपने इस एक कुकृत्य को मेरी आत्मा ने हमेशा धिक्कारा है। एक निर्बल असहाय स्त्री के वस्त्र हरण पर व्यंग किया, हालाँकी यह मायने नहीं रखता की ऐसा क्यों किया। परंतु भरी सभा मे एक स्त्री को अपशद कहने के लिये मैं निश्चित ही दंड का पात्र हूँ। अभी तक के मेरे जो भी संचित पुण्यकार्य हैं, वह भी इस घोर कुकृत्य को नष्ट नहीं कर सकते। निश्चित ही मुझे इसका दंड भोगना होगा और मैं उसके लिए प्रस्तुत हूँ।
कृष्ण: दानवीर कर्ण दंड के लिए प्रस्तुत है। वाह.... परंतु तुम्हारी प्रस्तुति की प्रकृती बड़ी भिन्न है। एक तरफ दंड के लिए प्रस्तुत हो परंतु प्रतिरोध को मन से हटा भी नहीं पा रहे हो।
कर्ण: जिसे आप प्रतिरोध कह रहे है वो किसी और के लिए नहीं अपितु मेरे स्वयं के प्रति है। और इसी प्रतिरोध में मेरा दंड भी निहीत है और जो मेरे अंत का करण होगा।
कृष्ण: न्याय संगत क्या है यह जान कर भी चुक जाना गलत है। युधिष्ठिर के पक्ष में न सही पर कम से कम दुर्योधन से पृथक हो कर भी तुम अपने दायित्व का निर्वहण कर सकते हो।
कर्ण: स्वयं मित्रवत्सलता का आदर्श स्थापित करने वाले श्री कृष्ण मुझे मित्रद्रोह की शिक्षा दे रहे हैं। नीतिज्ञ कृष्ण से यह अपेक्षा मुझे कतई न थी।
कृष्ण: मित्र को पाप कर्म से बचाना भी मित्रवत्सलता ही है कर्ण।
कर्ण: जो दुर्योधन मुझे अपनी दाहीनी भुजा मानता है उसी के साथ विश्वासघात करूँ? मैं अच्छी तरह जानता हूँ दुर्योधन क्या है और धर्मराज क्या हैं। मगर ये जानते हुए भी मैं उसके पक्ष में युद्ध करने को विवश हूँ। भले ही मुझे इस कर्म का दंड मिले परंतु मित्रद्रोह का पाप मैं अपने सर पे नहीं ले सकता। जिस मित्र ने मुझे आत्मगौरव प्रदान किया आज उसी मित्र के लिए अपने हृद्य से सत्य का त्याग करता हूँ।
कृष्ण: जिस मित्रता ने तुम्हें आत्मगौरव प्रदान किया क्या वो निश्चल थी ? क्या वो निस्वार्थ थी? आज जिसके लिये तुम सत्य को अस्वीकार कर रहे हो क्या वो मित्र तुम्हें अकारण ही अपना मित्र स्वीकारता है? क्या इसमें उसका स्वार्थ निहीत नहीं है? इतना ध्यान रखो कर्ण की बुद्धिमान अपना मत स्वयं सत्य असत्य को समझ कर देते हैं। दुसरों पर आरूढ़ हो कर नहीं। परंतु तुम दुर्योधन के प्रति अपनी अंधश्रद्धा में इतने समर्पित हो चुके हो की उिचत दिशा का ज्ञान होते हुए भी अनुिचत निर्णय ले रहे हो।
कर्ण: मेरे जन्म लेते ही मेरी माँ ने मुझे त्याग दिया। क्या इसमें मेरा दोष था की मैंने अपनी माँ के गर्भ से एक अवैध संतान के रूप में जन्म लिया। द्रोण ने मुझे शिक्षा देने से इनकार किया, क्योंकि वो मुझे क्षत्रिय नहीं मानते थे। क्या इसमें मेरा दोष था की मैं एक क्षत्रिय होके भी नीच कहलाता रहा? गुरु परशुराम ने मुझे शिक्षा दी परंतु साथ ही यह शाप भी दिया की जब भी मुझे उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी उस समय मैं वो विद्या भूल जाऊंगा। क्योंकि वो मुझे क्षत्रिय समझते थे। भूलवश एक गौ मेरे तीर के रास्ते में आ के मर गयी तो मुझे गौ वध का शाप मिला। द्रौपदी के स्वयम्वर में मुझे अपमानित किया गया क्योंकि मैं किसी राजघराने से नहीं था। मेरे आँखों के सामने मेरे पुत्र की हत्या कर दी गयी। यहाँ तक की मेरी जननी ने मुझे अपना पुत्र नहीं स्वीकारा। इन तमाम संघर्ष के उपरांत भी मुझे जो भी मिला वह दुर्योधन की दया स्वरूप मिला। सर्वार्थवश ही सही लेकिन जब सारे संसार ने मेरा उपहास उड़ाया, तब दुर्योधन ने मुझे बराबर का दर्जा देकर अपने सिंहासन के बगल में बैठाया। तो अब क्या यह गलत है कि मैं दुर्योधन के प्रति वफ़ादारी दिखाऊ?
कृष्ण: कर्ण मेरा जन्म कारागार में हुआ। जन्म से पहले मृत्यु मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। जिस रात मेरा जन्म हुआ उसी रात मुझे अपने माता पिता से अलग होना पड़ा। मेरा सारा बचपन रथों की धमक, घोड़ो की हिनहिनाहट और तीर-कमानो के साये में गुज़रा। मेरे मामा ने मुझे सबसे बड़ा शत्रु समझा, जिस समय तुम अपनी वीरता के लिए प्रशंसा पाते थे उस समय तक मेरे पास शिक्षा भी नहीं थी। तुम्हें अपनी पसंद की जीवनसाथी से विवाह का अवसर मिला परंतु मुझे वह भी नहीं मीली जो मेरी आत्मा में बसती है। मुझे न चाहते हुए भी बहुत से विवाह राजनैतिक व् नैतिक कारणों से करने पड़े, जिन्हें मैंने राक्षसोंसे छुड़ाया था। जरासंध के प्रकोप से मेरे कुटुम्भ को सहपरीवार अज्ञातवास में छुपना पड़ा। पूरी दुनिया ने मुझे कायर कहा। युद्ध में दुर्योधन विजयी हुआ तो विजय का श्रेय तुम्हें मिलेगा और यदी धर्मराज ने युद्ध जीत लिया तो विजय का श्रेय अर्जुन को मिलेगा। यह कृष्ण तो सिर्फ़ एक सारथी है। कर्ण उचित अनुिचत का निर्धारण तो हम स्वयं अपनी आत्मा की आवाज़ से करते हैं। यदी हमारे साथ कुछ गलत होता है तो इसका यह मतलब कदापी नहीं की हम दुसरों के साथ गलत करें। दुर्योधन दोषी है तो युधिष्ठिर भी दोषमुक्त नहीं है। परंतु आज भी मुझे पूर्ण विशवास है की अगर धर्मराज को इस सत्य का पता चला तो सम्राट तुम होगे।
कर्ण: नहीं कृष्ण मैं यह कदापी नहीं चाहता कि भुल से भी धर्मराज को यह सत्य पता चले। यदि धर्मराज यह जान गये की मैं उनका अग्रज हूँ तो वह सम्राट बनना कभी नहीं स्वीकारेंगे। और न ही युद्ध करेंगे और युद्ध शुरु होने से पहले ही समाप्त हो जायेगा। अगर मेरी मृत्यु के बाद भी धर्मराज को सत्य पता चला तो वह इस ग्लानी से और शोक संतप्त होंगे। धर्म की स्थापना के लिए यह युद्ध होना आवश्यक है। और यह आप भी भली भांती जानते हैं। इस युध्द पीमयग में सिर्फ़ महारथियों और योद्धाओं की आहुति ही नहीं होगी बल्कि उन सब का भाग भी निहीत होगा। द्वापर के इस युद्ध में सिर्फ़ विनाश ही नहीं अपितु आने वाली पीढियो के भाग्य भी निर्धारित होंगे। अंततः धर्म की स्थापना होगी। मगर यह सारे पात्र अमर होंगे।
कृष्ण: अगर समय रहते हम इस युद्ध को रोक सकें तो बहुत बड़ा नरसंहार से बचा जा सकता है। इसके लिए हमे सिर्फ़ एक सत्य को उदघाटित करने की आवश्यकता है। कम से कम एक अनावश्यक मानवसंहार को टाल सकते है। नैतिक दृष्टिकोण से भी अग्रज तुम हो श्रेष्ठ हो क्षत्रिय हो, तो तुम्हारा सम्राट बनना भी उचित है।
कर्ण: नहीं कृष्ण, अब इस युद्ध को न रोकें। युद्ध अब अपरिहार्य है। अब एक गहन शांती के लिए रक्तपात आवश्यक है। और इस महायुद्ध की नींव भी पड़ चुकी है। और सौभाग्य से वह नींव स्वयं श्रीकृष्ण के द्वारा पड़ी है। आप तो स्वयं सर्वज्ञ हैं। इस युद्ध के द्वारा ही हम सबके दायित्व का निर्वहण हो सकता है। और आपको मेरी सौगंध है। यह सत्य धर्मराज से उदघाटित न होने दें। कम से कम मेरी मृत्यु तक, नहीं तो मैं अपने कर्तव्य से चुक जाऊंगा।
कृष्ण: तुम्हें क्या कहूँ कर्ण। हम दोनों को अपने दायित्व का निर्वहण करना होगा। मानव मूल्यों को स्थापित करने के लिए वसुदेव और वसुसेन को एक दुसरे के विरुद्ध युद्ध करना होगा। विजय का आशीर्वाद दे नहीं सकता। परंतु विजय न सही अपने उत्सर्ग द्वारा दानवीर कर्ण इतिहास में विद्धमान रहेगा। अनंतकाल तक।
(कृष्ण जाने लगते है। कर्ण पीछे से )
कर्ण: विजय तो मेरी हो चुकी है द्वारिकाधीश। स्वयं श्रीकृष्ण मेरी चौखट पर याचक बनकर खड़े हैं। जाइये मेरे शत्रु कृष्ण। अब रणभूमी में भेंट होगी। वसुदेव वसुसेन के सामने होंगे।
दृश्य 9
(कर्ण का शिविर। मंद बरसात हो रही है। बहुत से सैनिक युद्ध की तैयारियों में लगें हैं। कर्ण युगांधर से कुछ बात कर रहा है।)
युगांधर: 5 अक्षोहिणी हस्थीदल, 5 लाख पदस्थ सिपाही, और इतने ही अश्वसाध। 20 20 हज़ार बाण, दो खड़ग, तोमर व एक गदा आपके रथ में होगी। तथा वायुजित को भी भालों व छोटे शस्त्रों से परिपूर्ण कर दिया गया है।
कर्ण: और सूची-बाण??
युगांधर: वही 20 हज़ार अंगराज।
कर्ण: एक लाख, एक लाख सूची-बाण
युगांधर: एक लाख सूची-बाण? अंगराज??
कर्ण: हम कल के कल ही यह युद्ध समाप्त करने जा रहे हैं युगांधर। तुम जा सकते हो, और शोण से कहना मुझसे आकर मिले।
युगांधर: जी महाराज।
(युगांधर जाता है। कुछ देर बाद माता कुंती का प्रवेश)
कर्ण: कौन... कौन है वहाँ?? यह क्या, हस्तिनापुर की कुलवधु इस समय यहाँ...
कुंती: क्या दानवीर कर्ण के घर में मेरा आना वर्जित है।
कर्ण: नहीं साधारण जन के लिए तो नहीं परंतु....
कुंती: (बात काटकर) परंतु क्या कर कर्ण?? क्या मैं जनसाधारण से भी तुच्छ हूँ?
कर्ण: नहीं, आप हस्तिनापुर की कुलवधु हैं । आपका इस समय इस सूत के शिविर में आना स्वभाविक भी तो नहीं है।
कुंती: हाँ... स्वाभाविक तो नहीं। आश्चर्य का विषय है परंतु व्यंग का नहीं
कर्ण: अनजाने में कोई अवज्ञा हुई हो तो क्षमाप्रार्थी हूं। क्या है कि अभी भी राजव्यवहार ठीक से समझ नहीं पाया हूँ। सूत के घर कुछ लेंगी तो नहीं कम से कम आसन ग्रहण कीजिए।
कुंती: मैं आसन ग्रहण करने और औपचारिकता निभाने नहीं आई, ना ही तुम्हारे समक्ष कोई राज वधु खड़ी है। आज एक माँ अपने पुत्र के समक्ष ममता की भीख मांगने आई है।
कर्ण: माँ आपमे पुत्र से.... नहीं। अब नहीं। राजमाता आप भूल कर रही हैं। यह सूत सेनापति अधिरथ पुत्र कर्ण का शिविर है।(मन्दहास करते हुए) देखें...आप इस वर्षा में भूलवश मेरे शिविर में चले आइं हैं। आप....
कुंती: तुम अच्छी तरह समझ रहे हो कि मैं इस वक्त मैं भूलवश यहाँ नहीं आई हूं, बल्कि जान कर ही तुमसे मिलने आई हूं।
कर्ण: मुझसे मिलने? मगर क्यों? (थोड़ा आक्रोशित होकर)
कुंती: क्यों... अकारण नहीं आ सकती?
कर्ण: अकारण क्या होता है राजमाता? क्या आपको ऐसा लगता है कि आपका यह उत्तर मुझे संतुष्ट कर पाएगा?
कुंती: मेरे उत्तर से संतुष्ट नहीं हो तो क्या तुम्हें मेरे आने का कारण विदीत नहीं है?
कर्ण: उससे फ़र्क क्या पड़ता है? आप स्पष्ट शब्दों में कहें।
कुंती: हां सही कह रहे हो, कठोरता से प्रतिकार करने के लिए तुम्हें स्पष्टता की आवश्यकता तो होगी
कर्ण: आपके साथ कठोरता.... नहीं राजमाता। हस्तिनापुर की कुलवधु के समक्ष कठोरता का मैं साहस भी कैसे कर सकता हूं।
कुंती: चलो कम से कम तुमने मुझे माता तो कहा।
कर्ण: मैंने आपको राजमाता कहा है माता नहीं। माता और राजमाता में बहुत अंतर है।
कुंती: ऐसे संबोधन तो एक मां को शूल के भाँती ही लगेंगे।
कर्ण: आपने जो कुछ भी किया इसी संबोधन के लिए ही तो किया।
कुंती: यही तो तुम समझ नहीं सके।
कर्ण: अगर आप मेरा उपहास ही करना चाहती हैं तो मैं प्रस्तुत हूं, मगर जीवन में इतना कुछ सहने के बाद भी जब मुझसे कहा जाता है कि मैं कुछ समझा नहीं, तब यह मेरे लिए असहनीय हो जाता है। कृष्ण आए उन्होंने भी यही कहा, कि मैं समझ नहीं पाया। जीवन के इस पड़ाव में मुझे जीवन दर्शन के अनुभव से एक क्षण में अनभिज्ञ बता दिया जाता है। इससे बड़ा उपहास भला किसी का क्या हो सकता है।
कुंती: तुम ठीक कह रहे हो परंतु ऐसी स्थिति सिर्फ तुम्हारी नहीं है औरों की भी है।
कर्ण: बेशक औरों की हो सकती हैं परंतु राजमाता कुंती की नहीं।
कुंती: क्या राजवधु हो जाने से जीवन सामाजिक बंधनों से छूट जाता है?
कर्ण: कौन से सामाजिक बंधन की बात कर रही हैं आप? और यह आवश्यक बंधन क्यों?
कुंती: सिर्फ़ हमारे मानने ना मानने से सामाजिक बंधन और उसकी अनिवार्यता खत्म तो नहीं हो जाती।
कर्ण: क्यों अनिवार्य है बंधन? व्यक्ति के लिये सामाजिक नियम बने हैं या समाज के लिए व्यक्ति?
कुंती: व्यक्ति के लिए ही समाज है परंतु कभी-कभी वह समाज ही हम पर हावी हो जाता है और ना चाहते हुए भी कठोर निर्णय लेना हमारी विवशता हो जाती है।
कर्ण: इतना कठोर निर्णय की अपनी ही संतान अवैध हो जाए? स्त्रीत्व समाप्त हो जाए? मातृत्व सुख जाए?
कुंती: यह क्या कह रहे हो पुत्र?
कर्ण: (क्रंदन युक्त आवेश में) पुत्र...... नहीं... अब नहीं। यह शब्द चुभ रहें है अब। बाल्यकाल से अब तक जिस एक शब्द को सुनने के लिए बेचैन रहा, आज वही शब्द बाण की तरह हृदय में धंस रहें हैं। करोड़ों ब्रह्मास्त्रों की पीड़ा भी इस शब्द से कम पीड़ा देगी। नहीं अब नहीं।
कुंती: एक बार पूछोगे नहीं क्यों आई?
कर्ण: जानता हूं मगर आज ही क्यों? जबकि युद्ध शुरू हो चुका है। कल सारे योद्धा एक बार फिर आमने सामने होंगे, तब आप क्यों आयीं। कृष्ण भी आए थे और शायद उन्होंने ही आपको भी भेजा है। जबकी मैं अपना निर्णय उन्हें युद्ध शुरू होने से पूर्व ही दे चुका हूं।
कुंती: कृष्ण ने मुझे नहीं भेजा। तुम शायद सत्य नहीं जानते इसलिए इस नरसंहार को रोकने के लिए मैं तुम्हारे पास आई हूं।
कर्ण: जानता हूं मैं आप का सत्य।
कुंती: जानने के बाद भी तुम किसके लिए अपने अनुज पर शस्त्र उठाओगे?
कर्ण: अनुज नहीं प्रतिद्वंदी। वह प्रतिद्वंदी जिसने मेरे पुत्र की निर्मम हत्या की है।
कुंती: वो सब अनजाने में हुआ था पुत्र। जिसका उसे अभी तक पता नहीं है।
कर्ण: यह कहने से मेरा पुत्र वापस आ जाएगा क्या?
कुंती: तो क्या अपने भाइयों को मारकर वापस आ जाएगा?
कर्ण: नहीं..... नहीं आ सकता परंतु प्रतिशोध तो पूरा हो सकता है। मगर आज ही आप यह स्वीकार करने क्यों आई हैं या फिर अपने पुत्रों के लिए डर रही हैं?
कुंती: हाँ...डर रही हूँ, इस महानाश से डर रही हूँ। तुम पांडवों का वध करो या वह तुम्हारा गोद तो मेरी ही सुनी होगी। तुम्हारे व्यक्तिगत द्वेश क्रोध में चिता तो मेरी ही ममता की जलेगी। विजय तुम्हारी हो या धर्मराज की, पराजय तो एक माँ की होगी ना। आज एक माँ दानवीर कर्ण के द्वार पर आयी है। कुछ माँगूँगी तो दे सकोगे।
कर्ण: राजमाता को भला मैं क्या दे सकता हूं?
कुंती: जो दे सकोगे वही मांगूंगी। मुझे मेरा मातृत्व दे दो पुत्र।
कर्ण: मेरी मृत्यु मांग लीजिए खुशी से दे दूंगा परंतु.....
कुंती: नहीं कर्ण ऐसा ना कहो पुत्र, पहले भी मैं करोड़ो बार मर चुकी हूं परंतु आज मुझे मृत्यु से भी बदतर कष्ट मिल रहा है।
कर्ण: मुझे जन्मते मृत्यु को समर्पित क्यों नहीं किया आपने। कम से कम ऐसा लज्जाजनक जीवन तो न जीता। एक अवैध संतान तो न कहलाता। हर रात करवटें बदलते यही सोचता हूं कि आखिर यह निरर्थक जीवन मुझे ही क्यों मिला। बार-बार मस्तिष्क में एक ही प्रश्न कौंधता रहता है कि आखिर मेरी उत्पत्ति क्यों हुई? क्या एक कर्ण के ना होने से सृष्टि ना चलती? मेरे पिता भी मुझसे मिले परंतु उनका उत्तर भी मुझे संतुष्ट नहीं कर पाया। अपितु उसने मेरी उद्विग्नता और बढ़ा दी।
कुंती: इस पुरुष प्रधान समाज में सारे दोस्त लांछन स्त्रियों पर ही लगाया जाते हैं। प्रकृति के विधान ने मुझे जब चाहे जैसे चाहे नचाया। विवाह के पूर्व मुझे दुर्वासा ऋषि की सेवा का अवसर मिला, मैंने पूरी निष्ठा से उनकी सेवा की और वरदान स्वरुप उन्होंने मुझे एक मंत्र दिया और साथ ही मंत्र के अस्वीकार करने पर श्राप का भय भी दिखाया। जब मैंने इस मंत्र से सूर्य का आह्वान किया तो वरदान स्वरुप सूर्य के प्रकाश पुंज से तुम मेरे गर्भ में आए परंतु लोकलाज के चलते ना चाहते हुए भी, अपने मातृत्व को कुचलते हुए अपने ही पुत्र को जल में प्रवाहित करने को विवश हो गई। क्या करती मैं कैसी रही होगी मेरे विवशता सोचा है?
कर्ण: यह कैसी विवशता है और अगर यह विवशता है तो क्या पांडव अवैध नहीं थे व्यास, धृतराष्ट्र, पांडु, विदुर, राजनीति अवैध नहीं थे? उन्हें समाज ने कैसे स्वीकारा? उस समय यह विवशता कहां चली गई?
कुंती: क्योंकि वह विवाह उपरांत था इसलिए पुत्र
कर्ण: एक बात पूछूं ?
कुंती: क्या पुत्र?
कर्ण: क्या आप भी मुझे अवैध मानती हैं?
कुंती: क्या कह रहे हो पुत्र, क्या एक मां अपने पुत्र को अवैध मान सकती है? जिसे अपनी कोख में 9 माह तक अपने रक्त से सींचा उसे अवैध मान सकती है क्या? अपने आंचल की खुशबू को मसल सकती है क्या? कैसी होगी मेरी विवशता जब एक नवजात शिशु को स्तनपान कराने की जगह उसे मृत्यु को समर्पित कर दिया। अरे मैं तो इतनी अभागन थी की अपने शिशु को पूरी दृष्टि से देख भी ना सकी। वर्षों तक मेरे बिस्तर पर बड़ी करवटें बदलती मेरी कुचली हुई ममता मरती रही। परंतु मैं तुम्हारी दोषी हूँ पुत्र। मुझे क्षमा कर दो...
कर्ण: माँ..... यह क्या अपने पुत्र से क्षमा याचना कर रही हैं। नहीं माँ.... मैं अभी तक सिर्फ अपने ऊपर हुए अत्याचारों यातनाओं घृणाओं उपेक्षाओं से दुखी होता था परंतु आज तुम्हारी यह वेदना मेरे लिए असहनीय है। तुम्हें इस अवस्था में मैं नहीं देख सकता मां।
कुंती: आज मुझे मातृत्व का अधिकार देकर तुमने मुझे पूर्ण कर दिया पुत्र।
कर्ण: मां.... वर्षों तक प्यासा रहा हूं, ममता से वंचित। अब मैं अपने बाल्यकाल को अनुभव करना चाहता हूं। अपनी मां की ममतामयी वत्सलता पाना चाहता हूं। अपनी माँ की गोद में खेलना चाहता हूं। अपने शीश पर माँ के स्पर्श को अनुभव करना चाहता हूं। आज यह कर्ण पुनः अपने बाल्यकाल को जीना चाहता है।
(कर्ण बालक बन जाता है, कुंती स्तनपान कराती है।)
कर्ण: अब भोर होने ही वाली है मां, आप अपने शिविर में जाइए। मुझे भी कल युद्ध में जाना है। कल अर्जुन और कर्ण में से किसी एक की मृत्यु निश्चित है, परंतु हर परिस्थिति में आपको अपने पाँच पुत्रों से ही संतुष्ट होना पड़ेगा। यह हमारी अंतिम भेंट है। जाइये मां.... अब अधिक विलम्ब मत कीजिए, वरना कल इस सेनापति की प्रत्यंचा के पकौड़े नरम पड़ जाएगी
(प्रणाम करता है।)
दृश्य 10
कृष्ण: क्या सोच रहे हो पार्थ? युद्ध क्षण में तुम्हारी यह उद्विग्नता कैसी?
अर्जुन: क्या करूं कृष्ण हृदय इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि हमारा यह धर्म युद्ध क्या असल में धर्मयुद्ध ही है?
कृष्ण: युद्ध क्षेत्र में ऐसी बात नहीं सोचते तात। तुम्हारा यह संदेश निर्मूल है।
अर्जुन: आखिर इस युद्ध का परिणाम क्या होगा वासुदेव?
कृष्ण: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"
युद्ध में खड़े होकर परिणाम का विचार नहीं करते पार्थ, केवल कर्मरत हो जाते हैं।
अर्जुन: परंतु युद्ध तो परिणाम के लिए ही हो करते हैं।
कृष्ण: परिणाम के लिए ही करते हैं परंतु कर्म के समय सिर्फ कर्म करते हैं। अभी तुम कर्मभूमि में खड़े हो और सामने तुम्हारा शत्रु प्रबल है।
अर्जुन: अपने गुरु का शीश काटकर, आत्मा को विदीर्ण कर, अपने ही कुटुंबियों को मारकर अगर हम युद्ध भी जीत गए तो ऐसी विजय का क्या लाभ। स्वजनों के रक्तरंजित सिहांसन पर जब धर्मराज आरूढ़ होंगे तो क्या उनकी आत्मा इस कटु सत्य को स्वीकार करेगी?
कृष्ण: अर्जुन अगर तुम यह समझते हो कि यह युद्ध केवल राजसत्ता के लिए हो रहा है तो भूल कर रहे हो। यह युद्धरूपी महायज्ञ धर्म स्थापना का है। मानव जीवन के नीतिगत आदर्शों की स्थापना का.... यह सत्य है कि हमारे धर्म युद्ध में कुछ अधर्म युक्त आचरण हुए परंतु इसके अलावा हमारे पास दूसरा विकल्प नहीं था। यह धर्म की विजय के लिए है। अब संकोच को त्याग कर गांडीव संभालो तात।
(शोरगुल की आवाज। कर्ण बाणों की वर्षा कर रहा है।)
कृष्ण: वह देखो सामने तुम्हारा शत्रु प्रलय का पर्याय बन रहा है। उसका प्रत्युत्तर दो।
(शोरगुल, रथों की गड़गड़ाहट)
कृष्ण: यह क्या.... कर्ण का रथ तो क्षीण हो चुका है। यही वह स्वर्णिम क्षण है। प्रहार करो तात।
अर्जुन: यह क्या कह रहे हैं कृष्ण एक निहत्थे योद्धा पर प्रहार करना युद्ध के सिद्धांतों के विपरीत है।
कृष्ण: सही समय पर सटीक वार करना, यही युद्धनीती है पार्थ। प्रकृति के कालचक्र में फंसा वो अदभुत कर्ण, अब सिर्फ तुम्हारे बाणों का अधिकारी रह गया है। विजय अब तुम्हारे समक्ष है।
अर्जुन: नहीं कृष्ण ऐसी विजय मुझे नहीं चाहिए। स्वयं धर्मराज को भी यह स्वीकार्य नहीं होगा। वह अभी निहत्था है आकस्मिक प्रहार से अनभिज्ञ है। अभी इस समय मेरा प्रहार करना अमर्यादित होगा।
कृष्ण: परंतु नीतिपरक होगा। अभी कालचक्र के जिस छोर पर हम खड़े हैं, तुम्हारा प्रहार करना समयानुचित है। द्रौपदी के वस्त्र हरण और अभिमन्यु के हत्या के समय क्या उसने यह मर्यादा का ख्याल किया था। नहीं.....नहीं पार्थ उसने सिर्फ विजयश्री की तरफ देखा था। आज उसके प्रायश्चित का समय है। कर्ण ही दुर्योधन का मूलस्तंभ है, और ऐसे पापाचारी मूलस्तंभ को पाप कर्म के द्वारा नष्ट करना भी धर्म ही है। प्रहार करो अर्जुन देख क्या रहे हो? प्रहार करो....
(बाण छूटता है। कर्ण गिरता है। अर्जुन शस्त्र वहीं पर फेंक कर चला जाता है।)
कर्ण: आह.... यह क्या किया कृष्ण? विजय के लिए इतना आतुर हो गए की युद्ध की मर्यादा भी भूल गए?
कृष्ण: यह कार्य मर्यादित ना होते हुए भी नीतिगत है। परंतु तुम जिस मर्यादा की बात कर रहे हो क्या तुमने उसका पालन किया? यह मर्यादा उस समय क्यों नहीं दिखा पाए जब सात-सात महारथी मिलकर, जिसमें तुम स्वयं भी शामिल थे, एक बालक की हत्या कर रहे थे। द्रोपदी के वस्त्र-हरण पर कटाक्ष करके तुमने कौनसी मर्यादा दिखाई? जो पशु व्यवहार तुमने किया, आज वही तुम्हारे साथ हुआ है, तो दोष किसका है? तुम सब कुछ जानते हुए भी स्वयं ही अपने पतन के रास्ते पर निकल पड़े।
कर्ण: जिसे आप पतन कह रहे हैं वही मेरा उत्सर्ग है। परंतु मेरी कमियां निकाल कर भी आप अपने दोष छिपा नहीं पाएंगे। आप चाहे कितना भी तर्क दें। परंतु अपने इस कार्य को न्यायोचित नहीं ठहरा सकते।
कृष्ण: वह तुम्हारी परिभाषा है कर्ण। अभी हम रण में प्रतिद्वंदी हैं और तुम्हारा वध समयानुकूल है।
कर्ण: नहीं.... आप भी जानते हैं यह अनुचित है। अरे... मैं तो उत्सर्ग के लिए आया ही था रणभूमि में परंतु आपने मुझे पशु की तरह कायर मृत्यु दी। अर्जुन मेरा प्रतिद्वंदी होने पर भी शस्त्र उठाने से हिचकीचा गया, परंतु आपने उस धनुर्धारी की भी को भी कलंकित कर दिया। एक बात बताइए.... जब धर्म की स्थापना के लिए यह युद्ध हो रहा है तो क्या अधर्म युक्त आचरण की नींव पर धर्म की स्थापना हो सकती है? कम से कम एक पक्ष को तो पूर्णरूपेण मर्यादित रहने देते आप....
कृष्ण: इस सृष्टि में कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं हो सकता। स्वयं धर्मराज भी नहीं.... तो फिर युद्ध क्षण में यह प्रतिवाद क्यों? सत्य की विजय निश्चित है और आज पांडव विजयी हुए।
कर्ण: इसे आप विजय कहते हैं... एक स्त्री के पीछे छिप कर पितामह की हत्या, धर्मराज के अर्ध सत्य से द्रोण की हत्या, और आज निहत्थे कर्ण की कायर हत्या करके आप विजयी बनते हैं। आप डरते थे पांडवों के विनाश से। द्रोण और पितामह जैसे महायोद्धाओं के अंत के बाद भी आपको पांडवों का विनाश इस कर्ण में दिखता था। आपको यह भय था कि मैं पांडवों को निर्मूल ना कर दूं। आह...अअअ... परंतु, आपका यह भय मुझे अच्छा लगा। बेशक आपका पक्ष विजयी होगा, परंतु अपने कवच कुंडल का दान करके भी कर्ण- कर्ण ही रहा। स्वयं नारायण को पराजय का भ्रम हुआ।
कृष्ण: यह आवश्यक था कर्ण। इसके सिवाय दूसरा रास्ता न था। यह युद्ध जितने दिन ज्यादा चलेगा और घातक होगा। युद्ध जल्दी समाप्त करने के लिए तुम्हारा संहार होना अति आवश्यक था।
कर्ण: कृष्ण अपने जीवन में सब कुछ देख लिया, अपमान, लांछन, घृणा, उपेक्षा, राजवैभव, पत्नी-पुत्र सब कुछ। परंतु आज आप ने एक भाई के हाथों एक भाई की पराजय करवा दी। वह तो अनभिज्ञ था परंतु आप। देखिये आपके प्रकृति का विधान हमें किस अवस्था में ले आया। पर... पर.. प्रकृति का विधान बदलता रहेगा, कालचक्र फिर से घूमेगा सब कुछ बदल जाएगा, परंतु कर्ण एक ही है और एक ही रहेगा
" एको अहम द्वितीयो न अस्ति, न भूतो न भविष्यति"
समाप्त
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